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अस्तित्व की छटपटाहट

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:2018-09-02 18:07:02.0

अस्तित्व की छटपटाहट

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जम्मू-कश्मीर में इन दिनों आए दिन या तो राज्य पुलिस के किसी अधिकारी या जवान की हत्या कर दी जाती है या फिर उनके परिजनों का अपहरण कर लिया जाता है। सेना और अर्द्धसैनिक बल के जवानों का परिवार तो दूसरे राज्यों में सुरक्षित रहता है किन्तु स्थानीय पुलिस के अधिकारी और जवानों का परिवार वहीं रहता है इसलिए आतंकी आसानी से उन्हें अगवा कर लेते हैं। आतंकी स्थानीय पुलिस पर इस बात का दबाव डालने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं कि वे उनके बारे में सेना और अर्द्धसैनिक बल को सूचनाएं देना बंद कर दें। उल्लेखनीय है कि 2016 से अब तक जितने भी पाक प्रशिक्षित खतरनाक आतंकी कश्मीर में सक्रिय थे उन सभी का खात्मा किया तो सेना एवं अर्द्धसैनिक बल ने किन्तु इसके लिए असल श्रेय के हकदार राज्य पुलिस के सिपाही और सब-इंस्पेक्टर रैंक के लोग हैं जिन्होंने आतंकियों के ठिकानों एवं उनके स्थानीय लोगों से सम्पर्प कर सूचना एकत्र की। सारे खूंखार आतंकियों के मारे जाने के बाद अब कश्मीर में लगभग 250 आतंकी सक्रिय हैं जिन्हें पाकिस्तान में प्रशिक्षण भले न मिला हो किन्तु वे इस बात से घबराए हैं कि राज्य में जो काम केंद्र का खुफिया ब्यूरो नहीं कर पाता वह काम राज्य की सामान्य पुलिस कर रही है और एक-एक आतंकी को सेना निशाना बना रही है। अपहरण की घटनाएं ज्यादातर दक्षिण कश्मीर में ही हो रही हैं। पूरे कश्मीर में कुल 1.5 लाख पुलिसकर्मी हैं। इनमें 27 हजार स्पेशल पुलिस ऑफिसर हैं। 20 हजार पुलिसकर्मी दक्षिण कश्मीर में तैनात हैं जिनके परिजनों का आतंकी अपहरण कर लेते हैं या फिर उन्हें मार देते हैं। किन्तु पुलिस के जवान जिस सक्रियता का परिचय दे रहे हैं उससे बिल्कुल पंजाब में आतंकवाद के अंतिम दिनों का स्मरण होता है जब तत्कालीन पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल के नेतृत्व में पुलिस ने आतंकियों के पैर उखाड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया तो आतंकियों ने पुलिस अधिकारियों एवं उनके परिवारों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। उस वक्त एक रणनीति के तहत राज्य पुलिस ने `गुमनाम मॉडल' लागू किया। उसके अनुसार स्थानीय पुलिस को अपने शहर एवं कस्बों से दूर सादी वर्दी में भेज दिया गया और उनके परिवार वालों को भी उनके साथ ही रहने की सलाह दी गई। इससे जो पुलिसकर्मी खालिस्तानी आतंकियों के निशाने पर थे वे बच गए और पुलिसकर्मियों को अपना काम करने में परेशानी भी नहीं आई। दक्षिण कश्मीर में जहां आतंकी पुलिसकर्मियों एवं उनके परिवार को निशाना बना रहे हैं वहां भी गुमनाम मॉडल लागू किया जा सकता है।

कश्मीर में हुर्रियत कांफ्रेंस सहित जितने भी आतंकियों के मददगार थे सबकी दुकानें लगभग बंद हो चुकी हैं। आर्थिक अपराधों से घिरे ये मददगार इनफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट (ईडी) के अधिकारियों के घेरे में हैं जबकि एनआईए यानि नेशनल इन्वेस्टीगेटिंग एजेंसी इन मददगारों को उनके ठिकानों से पकड़-पकड़ कर नई दिल्ली ला रही है। आतंकियों के सहायता केंद्र के सारे ऑपरेटर ईडी और एनआईए की सक्रियता से अपनी पूंछ में लगी आग बुझाने में लगे हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं और उनके रिश्तेदारों पर केंद्र सरकार की एजेंसियां कभी भी हाथ डालने का साहस नहीं करती थीं इसीलिए इस संगठन के नेता हमेशा निर्भीक होकर देश के कानून को ठेंगा दिखाते हुए आर्थिक एवं सामाजिक अपराध करने में किसी भी तरह का संकोच नहीं करते थे। जब से इनकी धरपकड़ तेज हुई है तब से कश्मीर में आर्थिक एवं आपराधिक कानून का असर दिखने लगा है।

अंतर्राष्ट्रीय सीमा एवं लाइन ऑफ कंट्रोल पर भी सेना एवं अर्द्धसैनिक बल को खुली छूट मिलने से कश्मीर के आतंकी ठेकेदार पाकिस्तान से आतंकियों का आयात निर्बाध रूप से नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि इन दिनों कश्मीर में नए-नए बने आतंकी फड़फड़ा रहे हैं और पुलिस व उनके परिवारजनों को शिकार बना रहे हैं।

वैसे तो खूंखार आतंकियों के सफाये के लिए सेना और पुलिस काफी लंबे समय से राज्य में सक्रिय हैं किन्तु राज्य में राज्यपाल शासन की घोषणा के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आतंकवाद के सफाये के लिए जो नीति बनाई उसे `4डी' के नाम से जाना जाता है। पहला डी है डिफेंड यानि सुरक्षाबलों के कैंप, सरकारी प्रतिष्ठानों के पुख्ता सुरक्षा इंतजाम करना। दूसरा डी है डिस्ट्राय यानि सुरक्षाबलों द्वारा आतंकी ठिकानों एवं उनके गोला-बारूद को नष्ट करना। तीसरा डी है डिफीट यानि सुरक्षा एजेंसियां अलगाववादी विचारधारा को पनपने से रोकते हुए देशविरोधी ताकतों को नेस्तनाबूद करने का काम करेंगी। चौथा डी है डिनाय यानि युवकों को पत्थरबाजी और आतंकी गुटों में शामिल होने से रोकना। इस 4डी नीति को कश्मीर में सुरक्षाबल राज्य सरकार एवं पुलिस प्रशासन से मिलकर लागू कर रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय का मानना है कि राज्य में इस नीति का असर पड़ना शुरू हो गया है।

लब्बोलुआब यह है कि राज्य में आतंकियों को आतंकवाद के समर्थकों से सहयोग न मिल पाने से और पुलिस द्वारा उनके बारे में सुरक्षाबलों को सूचना देने से आतंकियों की घबराहट बढ़ना स्वाभाविक है। इसीलिए पुलिस के अधिकारियों और जवानों के परिजनों को बंधक बना रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि राज्य में आतंकियों का तानाबाना तबाह हो चुका है और अब वे अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं।

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