Home » संपादकीय » क्या आस्था की नगरी में जातीय समीकरण हावी होगा

क्या आस्था की नगरी में जातीय समीकरण हावी होगा

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:9 May 2019 6:21 PM GMT
Share Post

गंगा-यमुना और सरस्वती के संगम को अपने आगोश में समेटे इलाहाबाद धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी अहम है। पुंभ का आयोजन इसे आस्था का केंद्र बनाता है तो देश को दो प्रधानमंत्री देकर इसने सियासत में अपनी अहमियत साबित की है। इलाहाबाद में 12 मई को चुनाव होना है। भाजपा ने यहां से रीता बहुगुणा जोशी को मैदान में उतारा है। मुकाबले में सपा के राजेन्द्र सिंह पटेल और कांग्रेस के योगेश शुक्ला हैं। लखनऊ कैंट की विधायक रीता बहुगुणा जोशी हैं। यह महिला कल्याण, परिवार कल्याण, मातृत्व व बाल कल्याण तथा पर्यटन मंत्री हैं योगी आदित्यनाथ की सरकार में। गठबंधन के तहत सपा ने पहली बार राजेन्द्र सिंह पटेल को यहां प्रत्याशी बनाया है। यह बहादुरपुर ब्लॉक के प्रमुख भी रहे हैं। वहीं वर्ष 2009 में भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुके योगेश शुक्ला इस बार कांग्रेस की टिकट पर लड़ रहे हैं। वह 60,983 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे। भाजपा से टिकट कटने के बाद बागी होकर वह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के श्यामा चरण गुप्ता 3,13,772 वोट लेकर जीते थे। दूसरे नम्बर पर सपा के रेवती रमण सिंह रहे जिन्हें 2,57,763 वोट मिले। तीसरे नम्बर पर बसपा की केरारी देवी पटेल रहे जिन्हें 1,62,073 वोट मिले। कांग्रेस के उम्मीदवार नन्द गोपाल गुप्ता नवी को 1,02,453 वोट मिले थे। इस बार सपा-बसपा मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। अगर 2014 के इन दोनों के वोटों को जोड़ा जाए तो यह टोटल बनता है 3,24,146। यह भाजपा के 2,51,763 से कहीं ज्यादा है। अगर सही मायने में बसपा का वोट सपा को ट्रांसफर हो जाता है तो भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए जीतना मुश्किल हो जाएगा। भाजपा उम्मीदवार को मोदी की लोकप्रियता, योगी आदित्यनाथ सरकार की उपलब्धियों का लाभ मिल सकता है। वहीं अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रितत्वकाल में हुए विकास का लाभ सपा उम्मीदवार को मिल सकता है। कांग्रेस यहां जीतने के लिए नहीं बल्कि अपनी खोई जमीन की वापसी के लिए लड़ रही है। यहां हमें रीता बहुगुणा जोशी के जीत पाने में संदेह है। राजेन्द्र सिंह पटेल का पलड़ा भारी दिखता है।

Share it
Top