Home » संपादकीय » प्रमोद कृष्णम को तो जाना ही था

प्रमोद कृष्णम को तो जाना ही था

👤 Veer Arjun | Updated on:12 Feb 2024 6:00 AM GMT

प्रमोद कृष्णम को तो जाना ही था

Share Post

कांग्रेस की परम्परा से अविज्ञ कांग्रेस नेतृत्व ने अपने एक ऐसे नेता को पार्टी से निकाल बाहर किया जो पूर्ण रूपेण कांग्रेसी परम्परा के परिपक्व एवं पारंगत उन्हें जितना कांग्रेस इतिहास की जानकारी थी, उतनी आज के शीर्ष नेतृत्व को भी शायद ही हो। जी हां बात कल्कि धाम के पीठाधीश्वर आचार्यं प्रमोद कृष्‍णम की कर रहे हैं। प्रमोद कृष्‍णम अपने विदृार्थी जीवन से ही कांग्रेस के समर्थक और छात्र संगठन एनएसयूआईं के नेता थे। इसके पहले वह लखनऊ से राजनाथ सिंह के विरुद्ध लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी भी रह चुके हैं। यह पार्टी का अधिकार है कि वह जिसे चाहे, उसे पार्टी हितों के खिलाफ कार्यं करने के आरोप में निकाल सकता है। पिछले वुछ दिनों से प्रमोद कृष्‍णम कांग्रेस से इस बात को लेकर नाराज थे कि वह अपनी जड़ों को काट रही है। आचार्यं कृष्‍णम का आरोप था कि इन दिनों पार्टी में वामपंथी और सनातन विरोधी तत्वों की संख्या ही प्रभावशाली है। आचार्यं गांधी परिवार के खिलाफ तब ज्यादा मुखर दिखे जब श्रीमती सोनिया गांधी व मल्लिकार्जुन खरगे अयोध्या में भगवान श्रीराम के मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा में जाने से मना कर दिया। खुलेआम आचार्यं जी ने कांग्रेस नेतृत्व को भ्रमित बताया और टीवी डिबेट मीडिया इंटरव्यू में कांग्रेस की फजीहत करनी शुरू कर दिया। जाहिर सी बात है कि कांग्रेस नेतृत्व ने आचार्यं जी को चुप रहने के लिए कहा होगा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और वह भी कांग्रेस छोड़ने का मन बना चुके थे। असल कांग्रेस में पार्टी नेतृत्व की आलोचना करके तो रहा जा सकता है कितु प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करके रह पाना असंभव है। प्रमोद कृष्‍णम का यह कहना कि कांग्रेस अपने मूल सिद्धांतों से भटक गईं है, कांग्रेस नेतृत्व के लिए असहज स्थिति तो बन गईं कितु कल्कि धाम में मंदिर उद्घाटन कार्यंव्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित करना और यह कहना कि यदि प्रधानमंत्री न होते तो रामलला विराजमान का मंदिर बन पाना संभव नहीं था, कांग्रेस के लिए असहनीय था।

दरअसल कांग्रेस के नेताआंे ने अयोध्या न जाने का पैसला इसीलिए किया ताकि मुस्लिम समाज को संदेश दिया जा सके कि वह उनकी भावनाओं के साथ खड़ी है। आचार्यं प्रमोद कृष्‍णम भी इस कारण को अच्छी तरह जानते हैं कि राम, अयोध्या तीर्थ धाम इत्यादि कांग्रेस नेतृत्व के लिए बहुत नीरस शब्द है। फिर भी वह कांग्रेस की परम्पराओं का उदाहरण देकर नेतृत्व को उलझन में डालने से नहीं चूके और लगातार खुद को रामभक्त साबित करते हुए भाजपा के नेताओं से नजदीकियां बढ़ाना जारी रखे।

वास्तविकता तो यह है कि आचार्यं प्रमोद कृष्‍णम कांग्रेस के वास्तविकता को आधार बनाकर ही उसके शीर्ष नेतृत्व को आइना दिखाना चाहते थे जबकि कांग्रेस दूध की जली हुईं है, इसलिए छाछ भी पूंक-पूंक कर पीना चाहती है। कांग्रेस ने 1987 में हिंदुओं का दिल जीतने के लिए प्रचारित तो कर दिया कि उसी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाया कितु जब मुस्लिम समाज ने आंखें तरेरी तब कांग्रेस की समझ में आया कि एक गलत संदेश ने उसे वैसे मुसलमानों का कोपभाजन बना दिया। कितु तब तक देर हो चुकी थी और कांग्रेस उन्हें यह नहीं समझा पाईं कि ताला तो जिला जज ने खोला, सरकार के पास इस तरह का कोईं अधिकार नहीं था। यदृापि कांग्रेस ने वुछ मुस्लिम नेताओं को समझाने की कोशिश की और बाबरी ऐक्शन कमेटी बनाने की सलाह भी दी कितु तब तक मुस्लिम समाज कांग्रेस को सबक सिखाने का संकल्प ले चुका था। मुस्लिम समाज को विकल्प मिल गया मुलायम सिंह यादव जैसे घोर तुष्टीकरण के लिए मशहूर नेता के रूप में। मुस्लिम समाज ने कांग्रेस को छोड़कर लालू यादव का साथ देना शुरू कर दिया।

इसके बाद तो मुस्लिम समाज पूरी तरह कांग्रेस से दूर हो चुका था। दशकों बाद अब फिर कांग्रेस मुस्लिम नेताओं को अपने पक्ष में करने में सफलता हासिल की है। अब वह मुस्लिम समाज की नाराजगी एक बार फिर झेलने को तैयार नहीं है। इसीलिए कांग्रेस नेतृत्व खुलकर राम मंदिर की बात करने से बच रहा है। कांग्रेस को पता है कि क्षेत्रीय पार्टियां मुस्लिम वोटों के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं, इसलिए यदि उसने अपनी तरफ से जरा भी सनातनी प्रेम दिखाया तो मुसलमानों में गलत संदेश जाएगा और कांग्रेस को लगता है कि यह उसके लिए आत्मघाती साबित होगा। इसलिए कांग्रेस को आचार्यं प्रमोद कृष्‍णम के जाने से उतना दु:ख नहीं है जितना कि इसके प्रतिव्रिया स्वरूप मुसलमानों द्वारा कांग्रेस के संभावित बहिष्कार की संभावना से डर रहे हैं। प्रमोद कृष्‍णम अब कांग्रेस के गले के मरे सांप बन चुके थे।

Share it
Top