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चक्का जाम की हकीकत

👤 Veer Arjun | Updated on:8 Feb 2021 1:12 PM GMT

चक्का जाम की हकीकत

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केेंद्र सरकार के वृषि सुधार कानूनों के विरुद्ध शनिवार को दोपहर 12 बजे से तीन बजे तक के राष्ट्रव्यापी चक्का जाम को न तो व्यापक समर्थन मिला और न मिलना था। आंदोलनकारी नेताओं को इस बात का एहसास था कि दिल्ली में 'ट्रैक्टर' शब्द से भी वुछ लोग डरने लगे हैं इसलिए यहां तो समर्थन मिलने से रहा।

उत्तर प्रादेश और उत्तराखंड में भाजपा सरकारें हैं, इसलिए वहां भी समर्थन नहीं मिलेगा। किन्तु उन्हें इस बात की उम्मीद जरूर थी कि कांग्रोस शासित राज्यों में चक्का जाम को व्यापक समर्थन मिल सकता है क्योंकि उन राज्यों में शासकीय संरक्षण मिलेगा। सच पूछें तो चक्का जाम का आयोजन किया ही इसलिए गया था कि देखें आम जनता किसान आंदोलन को कितनी गंभीरता से लेती है।

दिल्ली पुलिस को आंदोलनकारी नेताओं पर भरोसा ही नहीं हुआ, इसलिए उसने अपनी तरफ से पूरी सुरक्षा का प्राबंध किया। अच्छा भी किया क्योंकि यदि इतनी कड़ी सुरक्षा न होती तो दिल्ली को दहलाने के प्रायास जरूर होते और आंदोलनकारी नेता कह देते कि आखिर हमें क्या पता! हम तो जानते ही नहीं उपद्रवी कौन थे। इतनी कड़ी व्यवस्था के बावजूद बुराड़ी में उपद्रवियों ने अपना रंग दिखा ही दिया जिनके खिलाफ पुलिस ने तत्काल कार्रवाईं करते हुए उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया। सवाल यह है कि जब आंदोलनकारी नेताओं ने मीडिया के सामने आकर इस बात का ऐलान किया कि दिल्ली, उत्तर प्रादेश और उत्तराखंड में चक्का जाम नहीं किया जाएगा तो वे कौन लोग थे जिन्हें अपने नेताओं के प्राति आस्था ही नहीं है? जब समर्थक अपने नेताओं की भी बात नहीं मानते तो ऐसी स्थिति को ही अराजकता कहते हैं। आंदोलन खड़ा करके नेता यह नहीं कह सकते कि उनके समर्थक नियंत्रण में नहीं हैं या उन्हें पता ही नहीं किसने उपद्रव कर दिया। इसका मतलब है कि आंदोलन के नेतृत्व के प्राति उनके समर्थकों की निष्ठा ही खंडित है।

बहरहाल आंदोलनकारी नेतृत्व की आशा के अनुरूप चक्का जाम को व्यापक समर्थन नहीं मिला। यही नहीं कांग्रोस शासित राज्य राजस्थान में तो चक्का जाम करने के लिए मंत्रियों और विधायकों को सड़क पर उतरना पड़ा।

पंजाब में भी शासकीय प्रायास के बावजूद यह व्यापक नहीं बन सका। महाराष्ट्र में तो मुंबईं सरपट दौड़ती रही। राज्य के एकाध स्थानों पर कांग्रोसी कार्यंकर्ताओं ने सड़क पर लेट कर चक्का जाम का टोटका किया। यह टोटका इसलिए था क्योंकि चक्का जाम के आह्वान को दिल से स्वीकार ही नहीं किया। पहले भी आंदोलन हुए हैं और नेताओं के आह्वान पर जो वाहन जहां थे वहीं खड़े हो गए।

सड़कों पर पूरी तरह सन्नाटा छा जाता था। किसी से जोर-जबरदस्ती करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। महात्मा गांधी की तरह आंदोलन चलाना है तो पहले महात्मा गांधी का आचरण करना पड़ेगा। चौरी चौरा में स्वतंत्रता सेनानियों ने जब एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी और पुलिस के जवानों की हत्या कर दी तो महात्मा गांधी ने ऐलान कर दिया था कि अब वे आंदोलन वापस लेते हैं। महात्मा गांधी पुलिस के जवानों के खिलाफ हुईं हिसा को लेकर इतने खिन्न हुए कि उन्होंने अनशन शुरू कर दिया। किसान के नाम पर आंदोलन करने वाले किस आंदोलनकारी ने महात्मा गांधी का आचरण अपनाते हुए 26 जनवरी की हिसा पर दुख व्यक्त किया। ज्यादा से ज्यादा यही कहा कि 'ऐसा नहीं होना चाहिए था' एक भी आंदोलनकारी नेता ने अस्पताल में घायल पड़े पुलिसकर्मियों के प्राति संवेदना तक व्यक्त नहीं की, उनसे मिलकर हालचाल पूछने की तो बात दूर की है।

लब्बोलुआब यह है कि आंदोलनकारी नेताओं को उनके चक्का जाम के आह्वान पर देशभर से जो जवाब मिला है, उसकी हकीकत समझने की जरूरत है।

यह आंदोलन किसानों के नाम पर चल रहा है सत्ता छीनने के लिए नहीं। सत्ता छीनने का संघर्ष राजनीतिक दलों को करना चाहिए किन्तु किसानों को अपने आंदोलन को किसान हितों के प्राति वेंद्रित करने की जरूरत है। इसके लिए किसानों को सरकार से बातचीत करनी चाहिए। राजनीतिक विरोधी मोदी सरकार से अपना हिसाब-किताब करते रहेंगे। किसानों को आंदोलन की सफलता के प्राति गंभीर होने की जरूरत है। किसानों को अपने आंदोलन की सफलता के लिए यदि राजनेताओं की मदद लेनी ही है तो सभी पार्टियों से समान रूप से व्यवहार करें।

हर पाटा के वरिष्ठ नेताओं का मार्गदर्शन प्राप्त करें और देश की जनता को इस बात का एहसास कराएं कि उनके आंदोलन पर किसी पाटा विशेष की प्रोत-छाया नहीं है।

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