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आंदोलन की अवधि व स्थान

👤 Veer Arjun | Updated on:15 Feb 2021 7:57 AM GMT

आंदोलन की अवधि व स्थान

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गईं यह टिप्पणी कि 'कोईं जब चाहे तब और जहां चाहे वहां, प्रदर्शन नहीं कर सकता। दरअसल सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी शाहीन बाग में प्रादर्शन के खिलाफ दायर याचिका में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ है कि 'सार्वजनिक स्थान पर अनिाित काल के लिए कब्जा स्वीकार्यं नहीं है।' गत वर्ष नागरिकता कानून के विरोध में जब सड़क घेर कर महीनों सरकार विरोधी प्रादर्शन हुआ तो स्थानीय एवं उस रास्ते से प्रतिदिन गुजरने वाले लोगों को काफी परेशानी हुईं और वुछ लोगों ने धरना स्थल बदलने की मांग की थी किन्तु जब प्रादर्शनकारी नहीं माने तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी थी। उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा था कि यदि वह चाहे तो प्रादर्शनकारियों को हटा दें। किन्तु हिसा की आशंका से दिल्ली पुलिस ने बल प्रायोग नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पैसले में स्पष्ट रूप से पुलिस को इस बात के लिए अधिवृत किया है कि समय और स्थान के औचित्य की समीक्षा वह कर सकती है।

सच तो यह है कि यह पैसला ऐसे वक्त आया है जब दिल्ली की सीमाओं पर पंजाब, हरियाणा और पािमी उत्तर प्रादेश के किसान नेता तीन वृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। उससे बड़ी बात तो यह है कि अब दिल्ली पुलिस किसान आंदोलन के नेताओं द्वारा दी जाने वाली किसी गारंटी पर विश्वास करने वाली नहीं है। दिल्ली पुलिस ने किसान नेताओं के खिलाफ वादाखिलाफी के सन्दर्भ में प्राथमिकी दर्ज कर रखी है। धरना स्थल को घेरकर वंटीले तार लगाने के पीछे भी दिल्ली पुलिस यही तर्व देती है कि उसे इन प्रादर्शनकारियों पर भरोसा नहीं है क्योंकि आंदोलन पर नेताओं का नियंत्रण नहीं है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बल के जवानों की जो दुर्गति प्रादर्शनकारी ट्रैक्टर किसानों ने की है उससे दिल्ली पुलिस में आज भी आव््राोश है। इसलिए प्रादर्शन से जुड़े किसान नेताओं को नए कार्यंव््रामों के लिए शायद ही अनुमति मिले।

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट का यह पैसला अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह देश में होने वाले भविष्य के आंदोलनों की दिशा को भी प्राभावित करेगा क्योंकि अब समय और स्थान पर टिप्पणी की गईं है।

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