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कश्मीर का भविष्य

👤 Veer Arjun | Updated on:15 Feb 2021 8:06 AM GMT

कश्मीर का भविष्य

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अब दूसरे वेंद्र शासित प्रादेशों से जम्मू-कश्मीर में आईंएएस, आईंपीएस और आईंएफएस अधिकारी नियुक्ति पा सवेंगे। इस आशय का विधेयक लोकसभा में शनिवार को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2021 पारित हो गया। इसका मतलब यह हुआ कि अब इस सीमावता राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा निकट भविष्य में मिलना संभव नहीं है।

लोकसभा में विधेयक पेश किए जाने पर कांग्रोस के सदस्यों ने गृहमंत्री से पूछा कि सरकार ने अनुच्छेद 370 समाप्त करते वक्त जम्मू-कश्मीर को वेंद्र शासित प्रादेश मे परिवर्तित कर दिया था किन्तु आश्वासन दिया था कि शीघ्र ही राज्य को पूर्ण दर्जा वापस कर दिया जाएगा। विपक्ष का सवाल उचित था। इसके जवाब में गृहमंत्री ने कहा कि उचित समय पर दिया जाएगा पूर्ण राज्य का दर्जा। एक तरफ तो सरकार जम्मू-कश्मीर में शासकीय कामकाज को सुचारू बनाने के लिए वैडर सुधार प्राव््िराया पर काम कर रही है जबकि दूसरी तरफ सदस्यों को आश्वासन भी दे रही है कि उचित समय पर राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कर दिया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि जब तक अन्य शांत राज्यों की तरह जम्मू-कश्मीर भी शांत नहीं हो जाता तब तक उसे पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा।

सवाल यह है कि पूर्ण राज्य का दर्जा चाहिए क्यों इस राज्य को? जनाकांक्षाओं के अनुरूप विकास के लिए या सुरक्षा के लिए? यदि विकास और सुरक्षा दोनों वेंद्र शासित राज्य को सुनिाित हो जाता है तो फिर 'पूर्ण' या 'वेंद्र शासित' से क्या फर्व पड़ता है राज्य की जनता को। वेंद्र शासित प्रादेशों को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल होने की यही शर्ते हैं। असम को भी पूर्ण राज्य का दर्जा 1960 में मिला था। हरियाणा और हिमाचल प्रादेश 1971 में पंजाब से अलग होकर पृथक राज्य बने थे किन्तु उससे पहले पंजाब राज्य का गठन 1966 में हुआ था। पंडित नेहरू का देहांत तो 1964 में ही हो गया किन्तु 1960 से 1964 तक इंदिरा जी और नेहरू जी पंजाब राज्य के गठन पर कईं बार चर्चा कर चुके थे। उस वक्त वेंद्र सरकार को इस बात की चिन्ता हो गईं थी कि सीमावता राज्य को धर्म विशेष राज्य के रूप में वैसे बनाया जा सकता है। इंदिरा जी चाहती थीं कि पंजाब को वेंद्र शासित प्रादेश घोषित किया जाए क्योंकि पाकिस्तान इस राज्य में खुराफात कर सकता है। किन्तु नेहरू जी नहीं माने और पंजाब को भी पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया। चूंकि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य से वेंद्र शासित राज्य में बदलने का असामान्य कारण है और जब तक वह कारण असामान्य बना रहेगा तब तक इस राज्य को वेंद्र शासित ही रहना होगा।

परिस्थितियों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को जीवंत करके राज्य में एक लोकप््िराय सरकार के गठन का प्रावधान किया जा सकता है। दरअसल वेंद्र शासित प्रादेश तीन तरह के होते हैं। पहला स्वरूप वह होता जिसमें मुख्यमंत्री शासन चलाता है और उसके अधीन जमीन, पुलिस और प्राशासन होता है। इस तरह का वेंद्र शासित प्रादेश पुडुचेरी और अरुणाचल प्रादेश हैं। दूसरा स्वरूप है जिसमें प्राशासन, पुलिस और जमीन उपराज्यपाल के पास होती है शेष विभाग मुख्यमंत्री उपराज्यपाल के सहयोग से चलाता है। इस तरह का वेंद्र शासित प्रादेश दिल्ली है। किन्तु वेंद्र शासित प्रादेश का तीसरा स्वरूप वह होता है जिसमें विधानसभा होती ही नहीं। वहां का शासन उपराज्यपाल या प्राशासक ही चलाता है। ऐसे राज्य हैं चंडीगढ़ और अंडमान-निकोबार। अभी तो जम्मू-कश्मीर को तीसरी श्रेणी में रखा गया है। किन्तु शीघ्र ही उसे दूसरी श्रेणी में रखा जा सकता है। लेकिन इसके लिए जम्मू-कश्मीर के नेताओं को सहमत करना होगा। या ऐसा भी हो सकता है कि राज्य के राजनीतिक दल वेंद्र सरकार से खुद ही मांग करें कि उनकी विधानसभा पुनजावित कर दी जाए और वे वेंद्र शासित प्रादेश को स्वीकार कर लेंगे।

लब्बोलुआब यह है कि जम्मू-कश्मीर निकट भविष्य में राज्य का दर्जा हासिल नहीं कर सकेगा किन्तु वेंद्र शासित प्रादेश रहते हुए उसके वुछ अधिकारों एवं स्वरूपों में बदलाव संभव है।

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