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स्वामी प्रासाद मौर्यं का पार्टी छोड़ना कितना बड़ा झटका?

👤 Veer Arjun | Updated on:14 Jan 2022 5:28 AM GMT

स्वामी प्रासाद मौर्यं का पार्टी छोड़ना कितना बड़ा झटका?

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—अनिल नरेन्द्र

दिल्ली में चुनावी रणनीति बना रही भाजपा को मंगलवार को तब बड़ा झटका लगा, जब वैबिनेट मंत्री स्वामी प्रासाद मौर्यं ने भाजपा सरकार पर दलितों, पिछड़ों, किसानों, बेरोजगारों व एमएसएमईं उदृामियों की घोर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। मौर्यं ने तीन विधायकों ब्रजेश प्राजापति, भगवती सागर, रोशन लाल वर्मा के साथ भाजपा छोड़ दी। उन्होंने समाजवादी पाटा के अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात की। 14 जनवरी को सभी सपा की सदस्यता लेंगे। दो और अभी कईं विधायकों के भी साइकिल पर सवार होने की चर्चा जोरों पर है। योगी सरकार में श्रम एवं सेवायोजन मंत्री स्वामी प्रासाद मौर्यं ने मंगलवार दोपहर सोशल मीडिया पर इस्तीपे की घोषणा की। फिर पाटा नेतृत्व को इस्तीफा भेजा। करीब 12:30 बजे उन्होंने तीनों विधायकों के साथ जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट में अखिलेश याव से मुलाकात की। घंटेभर बाद वहां से बाहर निकले मौर्यं ने कहा—मेरी किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है। भाजपा सामाजिक न्याय की लड़ाईं नहीं लड़ पा रही। सरकार उपेक्षा कर रही है।

पिछड़े वर्ग के लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में भाजपा के साथ रहना संभव नहीं है। सपा से उम्मीद है, इसलिए साथ जा रहा हूं। मौर्यं का दावा है—आगे की धार और वार देखते रहिए। अभी 10 से 12 विधायक इस्तीफा देंगे। स्वामी प्रासाद मौर्यं के इस्तीपे पर जानकारों ने एक विश्लेषण छापा है। स्वामी प्रासाद मौर्यं के इस्तीपे से सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ उस अभियान को बल मिलेगा कि उत्तर प्रादेश में ऊंची जातियों की सरकार है। भाजपा ने मंगलवार को दिल्ली में उत्तर प्रादेश विधानसभा चुनाव को लेकर बैठक की थी। इस बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रासाद मौर्यं, भाजपा प्रादेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिह और गृहमंत्री अमित शाह के साथ पाटा के अन्य वरिष्ठ नेता मौजूद थे।

लेकिन स्वामी प्रासाद मौर्यं का इस्तीफा बैठक की सारी योजनाओं पर भारी पड़ गया। पाटा के नेताओं का कहना है कि यूपी में भाजपा को अपने चुनावी अभियान पर फिर से सोचना होगा क्योंकि मौर्यं के जाने से पिछड़ी जातियों में एक अहम संदेश गया है। अभी तक यूपी में पीएम मोदी और योगी आदित्यनाथ भाजपा के चुनावी अभियान के चेहरे हैं। भाजपा में यह चिन्ता भी बढ़ी है कि मौर्यं के कारण समाजवादी पाटा को बढ़त मिलने की संभावना है। समाजवादी पाटा अपने विश्वसनीय वोट बैंक यादव-मुस्लिम को विस्तार देना चाहती है। अखिलेश सपा के साथ गैर-यादव, ओबीसी, पिछड़ों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उत्तर प्रादेश में गैर-यादव, ओबीसी मतदाता एक अनुमान के मुताबिक 35 प्रातिशत से भी ज्यादा हैं।

चुनाव से ऐन पहले भाजपा छोड़ने वाले स्वामी प्रासाद मौर्यं सबसे हाईं- प्राोफाइल नेता हैं। मौर्यं 2016 में बसपा से भाजपा में आए थे। बसपा में उनकी हैसियत मायावती के बाद नम्बर दो पर थी। रिपोर्ट के अनुसार भाजपा के नेताओं ने मौर्यं के पाटा छोड़ने को बहुत महत्व नहीं देते हुए कहा कि वह लंबे समय से मौका परस्त रहे हैं। उन्होंने बताया कि वह अपने बेटे उत्वृष्ट के लिए टिकट मांग रहे थे जिसे पाटा ने मानने से मना कर दिया था और वह इसी वजह से नाराज थे। मौर्यं की बेटी संघमित्रा मौर्यं वदायूं लोकसभा सीट से भाजपा की सांसद हैं और उन्होंने जातीय जनगणना की मांग का संसद में समर्थन किया था।

मंगलवार को स्वामी प्रासाद मौर्यं के भाजपा छोड़ने पर पाटा के अंदर आधिकारिक तौर पर खामोशी रही, लेकिन उसने सार्वजनिक रूप से ट्वीट कर अपील की कि आदरणीय मौर्यं जी ने किन कारणों से इस्तीफा दिया है, मैं नहीं जानता हूं, उनसे अपील है कि बैठकर बात करें, जल्दबाजी में लिए गए पैसले अकसर गलत साबित होते हैं।

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