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बर्नियर की भारत यात्रा जिसने खोला मुगलों का काला चिट्ठा

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:31 July 2017 6:29 PM GMT

बर्नियर की भारत यात्रा जिसने खोला मुगलों का काला चिट्ठा

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 धीरज बसाक
दुनिया देखने का हर व्यक्ति का अपना नजरिया होता है.इसलिए एक ही चीज का अलग-अलग लोग,अलग-अलग ढंग से वर्णन करते हैं.इसे हम भारत की यात्रा करने वाले तमाम वैश्विक सैलानियों के बीच भी देख सकते हैं.भारत की यात्रा पर आने वाले इब्न बतूता ने रखा, जहाँ अनू"ाr चीजों को अपने लेखन के लिए चुना.वहीँ बर्नियर को इस देश की कला संस्कृति ने आकर्षित किया.
बर्नियर एक बौद्धिक यात्री था.उसने भारत में जो कुछ भी देखा,उसकी उसने यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस में मौजूद उन्हीं चीजों से तुलना किया.इस तुलना में उसे जो भी भिन्नता नजर आयी, उसी भिन्नता को उसने खास तौरपर उजागर किया. वह अपने लेखन से बुद्धिजीवी वर्ग को फ्रभावित करने की कोशिश में रहता था ताकि वह जिस चीज को सही मानता था उसे सार्वभौमिक तौरपर सही साबित किया जा सके. बर्नियर द्वारा लिखी गयी किताब ट्वैल्स इन द मुगल एम्पायर अपनी गहन आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि के लिए मशहूर है.
इस किताब में उसने मुगलो के इतिहास को एक व्यवस्थित और वैश्विक ढाँचे में स्थापित करने का फ्रयास किया है. बर्नियर लगातार मुगलकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से करता रहा लेकिन यूरोप की श्रेष्"ता को रेखांकित करते हुए.उसने अपने लेखन में भारत को एक किस्म से यूरोप का फ्रतिलोम बना दिया है.उसने भारत और यूरोप के बीच की भिन्नताओं को कुछ इस क्रम में रखा मानो भारत यूरोप का उच्छिष्ट हो.जबकि वास्तविकता उल्टी थी.
बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था.उसका निजी स्वामित्व के गुणों में दृढ़ विश्वास था और उसने भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों दोनों के लिए हानिकारक माना था.उसके हिसाब से मुगल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था जो इसे अपने अमीरों के बीच बाँटता था,जिसके अर्थव्यवस्था और समाज के लिए अनर्थकारी परिणाम होते थे.हालाँकि यह विचार अकेले बर्नियर का नहीं था बल्कि सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के अधिकांश यात्रियों के वृत्तांतों में यह उल्लेख मिलता है. राजकीय भूस्वामित्व के संबंध में बर्नियर तर्क देता है कि भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे.इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें बढ़ोत्तरी के लिए दूरगामी निवेश के फ्रति उदासीन थे.
बर्नियर का मानना था कि इसी के चलते कृषि का समान रूप से विनाश,किसानों का असीम उत्पीड़न तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में अनवरत पतन की स्थिति उत्पन्न हुई.जबकि शासक वर्ग इस सबके बीच फल-फूल रहा था.बर्नियर ने भारतीय समाज को दरिद्र लोगों के जनसमूह के रूप में वर्णन किया है.बर्नियर सही ही लिखा है कि तत्कालीन भारत में गरीबों में सबसे गरीब तथा अमीरों में सबसे अमीर व्यक्ति के बीच नाममात्र का भी कोई सामाजिक सरोकार नहीं था. बर्नियर बहुत विश्वास से कहता है भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं हैं. बर्नियर ने मुगल साम्राज्य को भिखारियों का क्रूर राजा बताया है.उसके हिसाब से मुगल साम्राज्य के शहर और नगर खराब हवा से दूषित थे. खेत झाड़ीदार तथा घातक दलदल से भरे हुए होते थे.
उसके हिसाब से इस सबका एक ही कारण था,राजकीय भूस्वामित्व. आश्चर्य की बात यह है कि एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था.जबकि सच्चाई तो यही थी.लेकिन अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फजल भू-राजस्व को 'राजत्व का पारिश्रमिक' बताता है जो राजा द्वारा अपनी फ्रजा को सुरक्षा फ्रदान करने के बदले की गई माँग फ्रतीत होती है न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान. ऐसा संभव है कि यूरोपीय यात्री ऐसी माँगों को लगान मानते थे क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी. यह न तो लगान था न ही भूमिकर बल्कि उपज पर लगने वाला कर था.
बर्नियर के विवरणों ने अ"ारहवीं शताब्दी के पश्चिमी विचारकों को फ्रभावित किया. मसलन फांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत का फ्रयोग फ्राच्य निरंकुशवाद के सिद्धांत को विकसित करने में किया जिसके अनुसार एशिया यफ्राच्य अथवा पूर्व में शासक अपनी फ्रजा के ऊपर निर्बाध फ्रभुत्व का उपभोग करते थे.यहाँ फ्रजा को दासता और गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था. इस तर्क का आधार यह था कि सारी भूमि पर राजा का स्वामित्व होता था तथा निजी सम्पत्ति अस्तित्व में नहीं थी.यही वजह थी कि राजा और उसके अमीर वर्ग को छोड़ फ्रत्येक व्यक्ति मुश्किल से गुजर-बसर कर पाता था. उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने भी इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में और आगे बढ़ाया.

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