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अपनी जान से खेलना है किसी 'संदिग्ध' का वकील होना...!

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:1 July 2017 4:36 PM GMT

अपनी जान से खेलना है  किसी संदिग्ध का वकील होना...!

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शाहिद ए चौधरी

साल 2002 में घाटकोपर (मुंबई) में, एक बस में बम विस्फोट हुआ। दो व्यक्ति मारे गए और 50 अन्य घायल हुए। पुलिस ने आ" संदिग्धों को गिरफ्तार किया। इनमें से एक आरिफ पूनावाला भी था, जिसके भाई का परिचय मुंबई के जाने माने वकील शरीफ शेख से था। आरिफ के भाई ने शरीफ शेख से मुकदमे में मदद करने का आग्रह किया, वह तैयार हो गए। संदिग्धों का मुकदमा हाथ में लेते ही शरीफ शेख की दुनिया बदल गई। उनके दोस्त उनसे किनारा करने लगे। परिजन उनसे सवाल करने लगे कि वह पुलिस के 'क"िन परिश्रम' पर पानी क्यों फेर रहे हैं? स्वयंभू राष्ट्रवादी उन्हें व उनके परिवार को जान से मारने की धमकी देने लगे। उनकी आजादी पर पाबंदी लग गई। पहले लंच के बाद वह अकेले ही चहलकदमी के लिए निकल जाते थे, अब दो व्यक्ति साथ रहते हैं, फिर भी डर लगता है। जब धमकी व खतरे में वृद्धि होने लगी तो उन्होंने गन लाइसेंस के लिए अर्जी दी, जिसे "gकरा दिया गया। वह राज्यमंत्री के पास सिफारिश के लिए गए। राज्यमंत्री ने उनकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा, "तुम्हें गन की क्या जरुरत है जब आतंकी तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं।'
यही होता है जब समाज व व्यवस्था संदिग्धों के जबरदस्त विरोध में हो। संदिग्धों को अदालती फैसले से पहले ही दोषी मान लिया जाता है। आज स्थिति यह है कि जब तक संदिग्ध अदालत में अपने को निर्दोष साबित न कर दें, उसे दोषी ही माना जाता है, जबकि होना यह चाहिए कि जब तक वह दोषी साबित न हो उसे निर्दोष माना जाना चाहिए। तो क्या संदिग्धों का अदालत में बचाव नहीं करना चाहिए? क्या उनकी वकालत नहीं करनी चाहिए? निश्चित रूप से करनी चाहिए। ऐसा अकारण नहीं। अगर आप सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो अधिकतर संदिग्धों को अदालत ने निर्दोष पाया, यानी सुरक्षा एजेंसी अपनी कमियों को छुपाने के लिए, जन आाढाsश को शांत करने के लिए या राजनीतिक कारणों से अकसर निर्दोषों को ही संदिग्ध बना देती हैं। घाटकोपर के सभी 8 संदिग्धों को 2005 में अदालत ने निर्दोष पाते हुए बरी व रिहा कर दिया।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा 2014 व 2015 के लिए जारी रिपोर्टों (भारत में वार्षिक अपराध) से मालूम होता है कि 2014 में आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने या सहयोग करने या फ्रतिबंधित संग"न का सदस्य होने के आरोप में 3,354 व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया, जिनमें से 1678 को जमानत मिली, 18 को सजा मिली और 123 बरी हुए। 2015 में अवैध गतिविधि (रोकथाम) कानून-1967 के तहत 1128 अतिरिक्त व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया, 76 मामलों में ट्रायल पूरी हुई, 11 व्यक्तियों को सजा मिली और 65 बरी व रिहा हुए। इसलिए मानवाधिकार एक्टिविस्ट व वकील फ्रशांत भूषण का कहना है, "आतंक सम्बंधी मामलों में बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में अदालतों ने जो बड़ी तादाद में व्यक्तियों को बरी किया है, उससे यह बात एकदम स्पष्ट है। अधिकतर संदिग्ध गरीब हैं और अच्छे वकीलों की सेवाएं नहीं ले सकते। ऐसी स्थिति में उनकी रक्षा के लिए न केवल अधिक वकील होने चाहिए बल्कि अधिक संग"न उनकी मदद करें उन्हें फ्रोफेशनल वकील उपलब्ध करा के।'
लेकिन यह काम आसान नहीं है। अपनी कानूनी व फ्रोफेशनल जिम्मेदारी उ"ाने हेतु जब कोई वकील संदिग्ध के लिए खड़ा होता है तो उसे तरह-तरह की क"िनाइयों का सामना करना पड़ता है। बंग्लुरु के 2008 विस्फोट मामले में संदिग्धों का बचाव कर रहे वकील आर महादेवन से उनके रिश्तेदारों ने बात करना बंद कर दिया है कि वह 'देश से नफरत करने वालों' की वकालत क्यों कर रहे हैं? वह उन्हें बचाव वकील के महत्व को समझाने का फ्रयास करते हैं, लेकिन कोई लाभ नहीं होता। हिंसा व जान से मारने की धमकियां मिलना आम बात है। अपने साथी वकील ही मौखिक विरोध व हाथापाई पर उतर आते हैं। दोस्त, फासला बना लेते हैं। पड़ोसी सवाल करते हैं कि तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? विवाह व अन्य समारोह में रिश्तेदार बहस करने लगते हैं।
2001 में दिल्ली पुलिस ने 4 व्यक्तियों को इस आरोप में गिरफ्तार किया कि उन्होंने सेना भवन, डलहौजी रोड व इंडिया गेट पर बम रखे थे और बीएसएफ मुख्यालय पर विस्फोट किया था। जैसे ही इस मामले में एमएस खान बचाव पक्ष के वकील बने उन पर मुकदमे से अलग हटने का दबाव डाला जाने लगा। उनकी कार पर चिट चस्पां कर दीं गईं, जिनमें उनके परिवार के सदस्य क्या करते हैं, कहां जाते हैं आदि का विवरण दिया गया था। उन्हें धमकी भरे एसएमएस मिलने लगे ...और यह सब तब, जब अदालत ने चारों संदिग्धों को निर्दोष पाते हुए बरी कर दिया। 2009 में एमएस खान मथुरा गए थे, एक ऐसे संदिग्ध के मामले में जो 14 वर्ष से जेल में था। उनके वहां पहुंचते ही 300 से अधिक वकीलों ने उनका घेराव कर लिया और उनके खिलाफ नारेबाजी करने लगे।
खान के साथ हिंसा तो नहीं हुई, लेकिन लखनऊ के मुहम्मद शोएब को अदालत में ही उनके साथी वकीलों द्वारा पीटा गया; क्योंकि वह 2007 के उत्तर फ्रदेश अदालत विस्फोट मामले के संदिग्ध आफताब आलम अंसारी का बचाव कर रहे थे। शोएब के पास "ाsस साक्ष्य थे कि विस्फोट के समय अंसारी एक डाक्टर की क्लिनिक में इलाज करा रहा था, बाद में पुलिस ने अंसारी के खिलाफ लगे आरोपों को वापस ले लिया। दरअसल आतंक एक ऐसा अपराध है जिसमें अधिकतर लोग संदिग्धों को पुलिस हिरासत में आते ही दोषी मान लेते हैं और उस समय तक मानते हैं जब तक वह अपना निर्दोष होना साबित नहीं कर देता। चूंकि ज्यादातर मामलों में निर्दोषों को ही संदिग्ध बनाया जाता है, इसलिए भी रक्षा वकील का महत्व बढ़ जाता है।
लेकिन रक्षा वकील से बदतर शायद ही किसी की जिंदगी हो। व्यक्तिगत जीवन के लिए समय नहीं बचता और चूंकि उन्हें समाज व व्यवस्था की भावनाओं का विरोधी समझा जाता है, इसलिए उन्हें धमकियां दी जाती हैं। कभी-कभी तो हत्या भी कर दी जाती है, जैसे 2006 के रेल विस्फोटों में संदिग्धों के वकील शाहिद आजमी को 2010 में कत्ल कर दिया गया था। इसके अतिरिक्त इन रक्षा वकीलों पर संदिग्धों व उनके परिजनों की तरफ से यह संदेह भी बना रहता है कि वह जानबूझकर मुकदमा हार जायेंगे, व्यवस्था को खुश करने के लिए। इस संदेह से भी अधिक दुःख उस समय होता है, जब स्थिति की गम्भीरता को समझे बिना अपने ही दोस्त किनारा करने लगते हैं। मसलन, अहमदाबाद के वकील खालिद शेख कहते हैं, "जब मैंने अक्षरधाम मामले में बचाव पक्ष का वकील बनना तय किया तो किसी ने मुझसे सीधे कुछ नहीं कहा लेकिन मैं महसूस कर सकता था कि मेरे दोस्त मुझसे बच रहे हैं। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, मुझे इससे इंकार नहीं है, लेकिन जिन निर्दोषों को झू"ा फंसाया गया है, उन्हें न्याय भी तो मिलना चाहिए, जैसे अक्षरधाम मामले में सुफ्रीम कोर्ट ने न केवल सभी 6 संदिग्धों को बरी किया बल्कि उन्हें गलत फंसाने के लिए जांच एजेंसी की कड़ी आलोचना भी की।'

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