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क्यों मुसलमानों में फर्क करते इमरान खान

👤 Veer Arjun | Updated on:7 Oct 2019 4:30 AM GMT

क्यों मुसलमानों में फर्क करते इमरान खान

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-आर.के. सिन्हा

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद के हालिया भारत दौरे से ठीक पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का उन्हें फोन करके जम्मू-कश्मीर की ताजा स्थिति पर बात करना एक शर्मनाक कृत्य ही माना जाएगा। वे बांग्लादेश की प्रधानमंत्री से बात करके उनसे कश्मीर के मसले पर समर्थन मांग रहे थे। कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि आखिरकार वे किस मुंह से बांग्लादेश से समर्थन मांग रहे थे? जिस पाकिस्तान ने लगभग 48 साल गुजरने के बाद भी अपनी सेना के द्वारा पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में किए नरसंहार के लिए माफी तक न मांगी हो, उस देश का प्रधानमंत्री बेशर्मी के साथ बांग्लादेश से कह रहा है कि वह भारत की निंदा करे, क्योंकि, उसने अपने एक प्रदेश जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35-ए को समाप्त कर दिया है। क्या उन्हें कभी बांग्लादेश में दर-दर की ठोकरें खाने वाले पाकिस्तान समर्थक उर्दूभाषी मुसलमानों की भी चिंता रही है?

चूंकि इमरान खान अपने को इतिहास का छात्र होने का दावा करते हैं, तो उन्हें पता तो होगा ही कि उनके देश की फौज ने पूर्वी पाकिस्तान में लाखों लोगों का बेदर्दी से कत्लेआम कर दिया था। उन्हें कत्ल करने की वजह मात्र यह थी कि शेख हसीना के पिता और बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी अवामी लीग को 1970 के पाकिस्तान के आम चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला था। इस तरह से पहली बार पाकिस्तान में सत्ता की बागडोर पूर्वी पाकिस्तान में जबर्दस्त असर रखने वाली किसी पार्टी को मिल रही थी। लेकिन जनता के फैसले को पश्चिम पाकिस्तान में स्वीकार नहीं किया गया। इसका जब पूर्वी पाकिस्तान में पुरजोर विरोध शुरू हुआ तो उन पर पाकिस्तानी फौज ने दमन करना चालू कर दिया। जालिम फौज ने अपने ही लाखों देशवासियों का खुलेआम कत्लेआम किया और लाखों बांग्लाभाषी औरतों की घर में घुसकर अस्मत लूटी। हालांकि उस दमन के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान की जनता भी जमकर लड़ी और अन्तत: पूर्वी पाकिस्तान बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में एक नए राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश के नाम से विश्व मानचित्र में आया। पूर्वी पाकिस्तान के आम अवाम के उस आंदोलन को भारत की जनता और तत्कालीन सरकार ने भी हर तरह से साथ दिया।

बांग्लादेश तब से पाकिस्तान से यह मांग करता रहा है कि वह सेना के किए खून-खराबे के लिए माफी मांगे। इस दौरान पाकिस्तान में तमाम सरकारें आती-जाती रहीं पर पाकिस्तान को कभी अपने किए पर शर्म तक नहीं आई। किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री या तानाशाह राष्ट्रपति ने भी बांग्लादेश से माफी नहीं मांगी। तो यह रहा पाकिस्तान के रहनुमाओं का चरित्र।

अब सबसे बड़ा सवाल तो यह खड़ा होता है कि शेख हसीना के सामने गिड़गिड़ाने वाले इमरान खान भी क्यों नहीं मांगते बांग्लादेश से माफी? दरअसल, इमरान खान इस तरह का जोखिम किसी भी सूरत में नहीं उठाएंगे। उन्हें पता है कि यदि उन्होंने बांग्लादेश से अपनी फौज की करतूतों के लिए माफी मांगी तो वे तत्काल अपनी कुर्सी गंवा बैठेंगे। भला आज विश्व में किस को नहीं पता कि पाकिस्तान में सत्ता की चाबी रावलपिंडी में बैठे फौज के जनरलों के पास ही तो है। उसी फौज के रहमोकरम पर ही तो इमरान खान को वजीरे- ए- आजम बनने का मौका मिला।

शेख हसीना को भारत के खिलाफ भड़काने की चेष्टा करने वाले इमरान खान यह जान लें तो बेहतर होगा कि शेख हसीना भारत के प्रति व्यक्तिगत रूप से भी कृतज्ञता का भाव रखती हैं। इसी भारत ने उन्हें और उनके परिवार को यहां पर छह सालों तक राजनीतिक शरण दी थी, जब उनके पिता और परिवार के बाकी सदस्यों का 1975 में पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी आईएसआई के गुर्गों द्वारा कत्ल कर दिया गया था। हसीना जी, उनके पति और दो बच्चे 1976 से लेकर 1981 तक नई दिल्ली में ही रहे थे। जब बंगबंधु के परिवार को बांग्लादेश में भी जगह नहीं थी तब भी भारत उनके साथ खड़ा था।

शेख हसीना का अपने भारतीय दौरे के समय जम्मू-कश्मीर के मसले पर कोई राय न देना यह साफ करता है कि वह इस मसले को भारत का आंतरिक मामला मानती हैं। हसीना जी और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच परिवहन, संपर्क, क्षमतावर्धन और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। बेशक, भारत और बांग्लादेश के बीच इतने करीबी रिश्ते कभी नहीं रहे। ऐसे में बातचीत का मुख्य मुद्दा द्विपक्षीय संबंध ही रहे।

खैर, इमरान खान के दोहरे चरित्र पर फिर से लौटते हैं। वे जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों के हक के लिए सारी दुनिया के मुसलमानों का आह्वान कर रहे हैं। लेकिन उन्हें सारे इस्लामिक देशों ने पीठ दिखा दी है। वे यह तो बताएं कि क्यों नहीं उनका मुल्क बांग्लादेश में रहने वाले बेसहारा उर्दूभाषी बिहारी मुसलमानों को पाकिस्तान में नागरिकता देकर वापस ले लेता? क्या उन्हें पता है कि सिर्फ ढाका में एक लाख से अधिक बिहारी मुसलमान शरणार्थी कैम्पों में नारकीय जिंदगी गुजार रहे हैं? दरअसल, बिहारी मुसलमान देश के बंटवारे के वक्त मुसलमानों के लिए बने देश पाकिस्तान में चले गए थे। जब तक बांग्लादेश नहीं बना था तब तक तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। परन्तु, बांग्लादेश बनते ही बंगाली मुसलमान बिहारी मुसलमानों को अपना शत्रु मानने लगे। इसकी एक वजह यह भी थी कि ये बिहारी मुसलमान तब पाकिस्तान सेना का खुलकर साथ दे रहे थे, जब पाकिस्तानी फौज पूर्वी पाकिस्तान में जुल्म ढहा रही थी। वे नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान बंटे। यह सारा दृश्य मैंने युद्ध संवाददाता की हैसियत से 1970-71 में स्वयं अपनी आंखों से देखा है।

उन्होंने 1971 के मुक्ति युद्ध के समय मुक्ति वाहिनी के खिलाफ पाकिस्तानी सेना का खुलकर साथ दिया था। तब से ही उन्हें बांग्लादेश में नफरत की निगाह से देखा जाता है। वे बांग्लादेश में अभी भी करीब 8-10 लाख हैं। वे पाकिस्तान जाना भी चाहते हैं, पर पाकिस्तान सरकार उन्हें अपने देश में लेने को तैयार नहीं है। तो यह हाल है इमरान खान का। वे जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों के लिए बेवजह शोर मचा रहे हैं, पर अपने ही देश उन लाखों नागरिकों के संबंध में तनिक भी सोच तक नहीं रहे, जो बांग्लादेश में फंसे हुए हैं। उन्होंने उस मुक्ति युद्ध के समय इस तरह की हरकत की थी कि उन्हें बांग्लादेश तो कभी माफ नहीं करेगा, परन्तु पाकिस्तान का यह दायित्व है कि वह उन्हें अपने यहां बुलाकर नागरिकता प्रदान करे। दुखद यह कि इमरान खान को उनकी कोई फिक्र नहीं है। क्या उन्हें शेख हसीना से बात करते हुए बांग्लादेश में रहने वाले बिहारी मुसलामानों के सुख-दुख की जानकारी नहीं लेनी चाहिए थी? पर, वे इस तरह की कोई पहल तब करते यदि वे वास्तव में मानवाधिकारों को लेकर एक तटस्थ सोच रखते। वे सच में बहुत ही छोटी सोच के इंसान हैं। उनका असली चेहरा तो अब पूरी तरह बेनकाब हो गया है।

(लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं।)

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