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एकात्मकता का प्रतीक है दशहरा

👤 Veer Arjun | Updated on:8 Oct 2019 7:15 AM GMT

एकात्मकता का प्रतीक है दशहरा

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-योगेश वुमार गोयल

देशभर में प्रतिवर्ष आश्विन शुक्ल दशमी को 'विजयादशमी' पर्व के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है, जिसे दशहरा भी कहा जाता है। दशहरा दो शब्दों दश तथा हरा से मिलकर बना है, दश का अर्थ है दस तथा हरा का अर्थ है ले जाना। इस प्रकार दशहरे का मूल अर्थ है दस अवगुणों या बुराइयों को ले जाना यानी इस अवसर पर अपने भीतर के दस अवगुणों को खत्म करने का संकल्प लेना।

दरअसल हर इंसान के भीतर रावण रूपी अनेक बुराइयां मौजूद होती हैं और सभी पर एक बार में विजय पाना संभव भी नहीं है, इसलिए दशहरे पर ऐसी ही वुछ बुराइयों का नाश करने का संकल्प लेकर इस पर्व की सार्थकता सुनिाित की जा सकती है। दशहरा समस्त भारत में भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण के वध के रूप में अर्थात बुराईं पर अच्छाईं की जीत के रूप में तथा आदि शक्ति दुर्गा द्वारा महाबलशाली राक्षसों महिषासुर व चंड-मुंड का वध किए जाने के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय पाने के लिए इसी दिन प्रस्थान किया था। इतिहास में कईं ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे पता चलता है कि हिन्दू राजा अक्सर इसी दिन विजय के लिए प्रस्थान किया करते थे। इसी कारण इस पर्व को विजय के लिए प्रस्थान का दिन भी कहा जाता है और इसे क्षत्रियों का त्यौहार भी माना गया है। इस दिन अपराजिता देवी की पूजा भी होती है।

मान्यता है कि सर्वप्रथम श्रीराम ने समुद्र तट पर शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ किया था और तत्पात दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान करते हुए विजय प्राप्त की थी। तभी से दशहरे को असत्य पर सत्य तथा अधर्म पर धर्म की जीत के पर्व के रूप में मनाया जा रहा है।

दशहरे को रावण पर राम की विजय अर्थात आसुरी शक्तियों पर सात्विक शक्तियों की विजय तथा अन्याय पर न्याय की, बुराईं पर अच्छाईं की, असत्य पर सत्य की, दानवता पर मानवता की, अधर्म पर धर्म की, पाप पर पुण्य की और घृणा पर प्रेम की जीत के रूप में मनाया जाता है।

दशहरे का धार्मिक के साथ सांस्वृतिक महत्व भी कम नहीं है। यह पर्व देश की सांस्वृतिक, ऐतिहासिक एवं राष्ट्रीय एकता का पर्व है, जो राष्ट्रीय एकता, भाईंचारे और सत्यमेव जयते का मंत्र देता है। पािम बंगाल तथा मध्य भारत के अलावा यह त्यौहार अन्य राज्यों में भी क्षेत्रीय विषमता के बावजूद पूर्ण उमंग, उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। देशभर में जगह-जगह पर दशहरे के दिन रावण, वुंभकर्ण, मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है, जिसका उद्देश्य एक ही है कि हम अपने जीवन में मर्यांदा पुरुषोत्तम श्रीराम के महान आदर्शो को आत्मसात करते हुए अपनी सभी दसों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर जितेंद्रिय बनने का प्रयास करें। सही अर्थो में यह पर्व अपने भीतर छिपे दुर्गुणों रूपी रावण को मारकर तमाम अवगुणों पर विजय प्राप्त करने का शुभकाल है।

दशहरे के उत्सव का संबंध नवरात्रों से भी जोड़कर देखा जाता रहा है। शक्ति की उपायना का यह पर्व सनातन काल से ही शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक नौ तिथि, नौ नक्षत्र और नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ मनाया जाता है। माना जाता है कि नवरात्रों में देवी की शक्ति से दसों दिशाएं प्रभावित होती हैं और देवी दुर्गा की वृपा से ही दसों दिशाओं पर विजय प्राप्त होती है, इसलिए भी नवरात्रों के बाद आने वाली दशमी को 'विजयादशमी' कहा जाता है।

दशहरा को आसुरी शक्तियों पर नारी शक्ति की विजय का त्यौहार माना जाता है। आदि शक्ति दुर्गा को 'शक्ति' का रूप मानकर शारीरिक एवं मानसिक शक्ति प्राप्त करने के लिए नौ दिनों तक देवी के नौ अलग-अलग रूपों की व्रत, अनुष्ठान करके पूजा की जाती है। जगह-जगह मां दुर्गा की विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और माता के जागरण भी किए जाते हैं। माना जाता है कि दुर्गा पूजा से सुख-समृद्धि, ऐश्वर्यं, धन-सम्पदा, आरोग्य, संतान सुख एवं आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है। अंतिम नवरात्र पर वुंवारी कन्याओं को भोजन कराकर नवरात्रों का समापन किया जाता है। नवरात्रों के नौ दिनों में हम देवी के नौ रूपों की पूजा करते हैं लेकिन ऐसा करते हुए हमें यह भी समझना चाहिए कि हमारे समाज में सभी नारियां दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती या काली का ही रूप हैं, इसलिए इन पर्वो की सार्थकता सही मायनों में तभी सिद्ध हो सकती है, जब हम अपने समाज में देवी स्वरूपा नारी को उचित मान-सम्मान दें, उसे गर्भ में ही मौत की नींद सुलाने से बचाएं, शिक्षित करके उन्हें उनका हक दिलाएं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएं और सम्मानित जीवन जीने का अधिकार प्रदान करें।

शारदीय नवरात्रों का अहम अंग बनकर प्रतिवर्ष दुगरेत्सव को पूर्णता प्रदान करता बुराईं पर अच्छाईं तथा असत्य पर सत्य की जीत को परिभाषित करता यह पावन पर्व हमें मानवीय मूल्यों के संरक्षण में सर्वत्र विजयी होने का संदेश देता है। मान्यता है कि आदि शक्ति दुर्गा ने दशहरे के ही दिन महाबलशाली असुर सम्राट महिषासुर का वध किया था। जब महिषासुर के अत्याचारों से भूलोक और देवलोक त्राहि-त्राहि कर उठे थे, तब आदि शक्ति मां दुर्गा ने 9 दिनों तक महिषासुर के साथ बहुत भयंकर युद्ध किया था और दसवें दिन उसका वध करते हुए उस पर विजय हासिल की थी। इन्हीं 9 दिनों को दुर्गा पूजा (नवरात्र) के रूप में एवं शक्ति संचय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है और महिषासुर पर आदि शक्ति मां दुर्गा की विजय वाले दसवें दिन को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। श्राद्धों के समाप्ति वाले दिन मिट्टी के किसी बर्तन में मिट्टी में जाै बोए जाने की परंपरा बहुत से क्षेत्रों में देखने को मिलती है। दशहरे के दिन तक जाै उगकर काफी बड़े हो जाते हैं, जिन्हें 'ज्वारे' कहा जाता है। मिट्टी के जिस बर्तन में जाै बोए जाते हैं, उसे स्त्री के गर्भ का प्रतीक माना गया है और ज्वारों को उसकी संतान। दशहरे के दिन लड़कियां अपने भाईंयों की पगड़ी अथवा सिर पर ज्वारे रखती हैं और भाईं उन्हें कोईं उपहार देते हैं।

दशहरे और शक्ति पूजा के आपसी संबंध के बारे में कहा जाता है कि जिन दिनों में राम ने शक्ति की उपासना की थी, उसी समय रावण और मेघनाद ने भी शक्ति उपासना की थी। आदि शक्ति ने दोनों पक्षों की पूजा-उपासना से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिए लेकिन विजय राम की ही हुईं क्योंकि उनके साथ धर्म, मानवता, सत्य, निष्ठा, पुण्य इत्यादि गुण थे जबकि रावण भले ही बहुत बड़ा विद्वान था लेकिन उस समय उसके पास घमंड, वासना, क्रोध इत्यादि तमाम बुराइयां ही बुराइयां थी। पुराणों में बताया जाता है कि देवी ने राम को विजयी होने का आशीर्वाद दिया था जबकि रावण और मेघनाद को उनका कल्याण होने का आशीर्वाद दिया था। चूंकि रावण का कल्याण उसका अभिमान, उसकी दानवता और उसका अधर्म नष्ट होने में ही था, इसीलिए राम के हाथों उसे सद्गति प्राप्त हुईं और राम की जीत हुईं।

दशहरे के दिन रावण, वुंभकर्ण और मेघनाद के काम, क्रोध, मद, लोभ व वासना रूपी पुतलों का दहन कर लोग अपने आगामी वर्ष की सफलता की कामना करते हैं। वास्तव में इस पर्व की सार्थकता तभी सुनिाित हो सकती है, जब हम इस अवसर पर आत्मचितन करते हुए अपने भीतर की बुराइयों रूपी रावण पर ध्यान वेंद्रित करते हुए उनका विनाश करने का प्रयास करें।

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