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मनोरोगियों को संबल देता मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम

👤 manish kumar | Updated on:9 Oct 2019 7:22 AM GMT

मनोरोगियों को संबल देता मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम

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मानसिक स्वास्थ्य देखभाल बिल, राज्यसभा में 19 अगस्त, 2013 को पेश किया गया था। इस बिल में सरकार विकलांगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कनवेंशन, 2007 का अनुमोदन करती हुई सार्थक पहल के साथ मानसिक रोगियों की हिफाजत के लिए ठोस पहल करना चाहती थी। लेकिन तत्कालीन सरकार की दुर्बल इच्छाशक्ति और लालफीताशाही की वजह से मामला लटक गया। मोदी सरकार के गठन के बाद 7 अप्रैल, 2017 को 'मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017' को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई और यह अधिनियम उसी दिन से प्रभावी हो गया। मानसिक स्वास्थ्य बिल, 2017 की पहल उन प्रभावित क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव लाएगी जो अभी तक मानवीय दायरों से बाहर थे। मानसिक रोगियों को यह बिल, वह सभी अधिकार प्रदान करता है जो उन्हें सशक्त बनाते हैं। मानसिक बीमारियों से पीड़ित प्रत्येक व्यक्ति को सरकार द्वारा संचालित और वित्त पोषित सेवाओं से उपचार और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल पाने का अधिकार है। यह अधिकार गुणवत्तापूर्ण देखभाल को सुनिश्चित करता है। साथ ही मानसिक रोगियों के उपचार में समानता, मानवता और सहज उपलब्धता की दिशा में व्यवस्था को उत्तरदायी बनाता है। यह बिल किसी भी मानसिक समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को नि:शुल्क कानूनी सेवा के साथ अपने मेडिकल रिकॉर्ड तक आसानी से पहुंच और देखभाल के प्रावधान में खामियों और लापरवाही के लिए न्यायालय में शिकायत करने का अधिकार प्रदान करता है।

मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के कई फायदे हैं। यह इस मायने में भी मजबूत पहल है कि बिल मानसिक रोगी को अग्रिम निर्देश देने का अधिकार प्रदान करता है कि किसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या के दौरान वह किस तरह से उपचार चाहता है और उसका मनोनीत प्रतिनिधि कौन होगा। यह अग्रिम निर्देश किसी चिकित्सक से सर्टिफाई या स्वास्थ्य बोर्ड से पंजीकृत होना चाहिए। यदि कोई पेशेवर मानसिक स्वास्थ्यकर्मी अथवा उसका संबंधी या केयरटेकर उपचार के दौरान दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करता है तो मानसिक स्वास्थ्य बोर्ड को अग्रिम निर्देश की समीक्षा करने और बदलने हेतु आवेदन करने की छूट देता है।

यह बिल केंद्र और राज्य के मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण को ऐसे प्रशासनिक निकाय के रुप में चिन्हित करता है जो सभी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रतिष्ठानों को पंजीकृत करने, विवरण रखने और निरीक्षण करने के साथ-साथ इन प्रतिष्ठानों की गुणवत्ता और सेवा संबंधी नियमों का निर्माण और विस्तार करे। साथ ही ये प्राधिकरण मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत पेशेवरों और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देशों एवं कानूनी प्रावधानों का प्रशिक्षण देने का दायित्व निभाएगा। सेवा प्रावधान में दर्ज खामी की शिकायतों के निवारण की दिशा में जरूरी हस्तक्षेप करता है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सभी मुद्दों पर सरकार को परामर्श देने का दायित्व भी इनका है। मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा आयोग और बोर्ड एक अर्ध-न्यायिक निकाय के रुप में काम करेगा और राज्य सरकारों की सहमति से जिला स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड का गठन करेगा।

यह बिल मानसिक रोगियों को भर्ती करने से लेकर उनके उपचार करने और उपचार के बाद डिस्चार्ज करने तक अपनाई जाने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया को भी स्पष्ट करता है। मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती होने का निर्णय जहां तक संभव हो सके वह मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति का ही हो, इस दिशा में हर संभव तरीका अपनाया जाए। केवल उस स्थिति को छोड़कर जब वह स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ हो।

इस बिल का जो महत्वपूर्ण बिंदु है आत्महत्या को अपराध की श्रेणी से अलग करना। यह बिल घोषणा करता है कि आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को मानसिक रोगी माना जाएगा और उसको भारतीय दंड संहिता के तहत दंडित नहीं किया जाएगा।

मानसिक स्वास्थ्य बिल 2017 के अन्य पहलू भी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं। इस कानून की कार्यात्मक इकाई 'जनपद' होगा। यह प्रावधान स्थानीय स्तर पर मानसिक विकारों से जूझ रहे नागरिकों को सुविधाएं प्रदान करते हुए बिल को प्रभावी बनाने में योगदान करेगा। बिल किसी भी तरह की देखभाल और उपचार की कमी के संबंध में शिकायत पर निर्णय का हक देता है। मानसिक रोगी के उपचार में किसी भी तरह के ऐसे प्रयोग को निषिद्ध करता है जो व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करता हो। जैसे मानसिक रोगियों के इलाज हेतु बिजली के झटकों का उपयोग एक परम्परागत उपचार पद्धति के तौर पर होता रहा है। यह बिल इस उपचार प्रयोग को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है। यदि कोई ऐसी स्थिति बनती भी है कि बिजली के शॉक देना रोगी के लिए लाभकारी हो तो आंशिक अनुमति के साथ सिर्फ वयस्कों के उपचार हेतु बिजली शॉक का प्रयोग किया जा सकता है। बशर्ते स्नायु शिथिल दवाओं के साथ बेहोशी की हालत में ही मानसिक रोगी के साथ यह पद्धति अपनाई जाए। मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को किसी भी दशा में बेड़ी अथवा किसी प्रकार की जंजीर में नहीं जकड़ा जा सकता है। यह बिल इस बाबत बहुत सख्त प्रावधान के साथ मनोरोगियों को नागरिक हक के साथ मानवीय गरिमा प्रदान करता दिखता है। साथ ही इस बात के लिए प्रबल ढंग से पैरवी करता दिखता है कि किसी भी मानसिक रुप से अस्वस्थ व्यक्ति को अकेला नहीं रखा जा सकता।

मानसिक स्वास्थ्य बिल चिकित्सा बीमा पॉलिसी के तहत किसी भी तरह की मानसिक बीमारी को मेडीक्लेम के लिए बीमा कंपनियों द्वारा सूचिबद्ध करने को अनिवार्य बनाता है। साथ ही मानसिक-मंदता को मनोरोग की श्रेणी से बाहर रखता है। ये दोनों पहल मानसिक रोगियों के लिए बड़ी राहत लेकर आयी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012 में दुनिया में लगभग 8,04,000 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 2,58,000 आत्महत्याएं 'अवसाद' के कारण हुईं। भारत में आत्महत्या की प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इसी परिप्रेक्ष्य में 10 अक्टूबर, 2014 को भारत के तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के द्वारा देश की पहली 'मानसिक स्वास्थ्य नीति' की नींव रखी गई। प्रत्येक वर्ष 10 अक्टूबर का दिन 'राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य दिवस' के रुप में संपूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाए, यह तय हुआ। यह पहल मानसिक रोगों से जूझ रहे व्यक्तियों की जिंदगी में एक नयी सुबह लेकर आएगी। भारतीय समाज में मनोरोगियों के प्रति जो उपेक्षा भाव है और किसी उपचार के योग्य न समझा जानेवाला दृष्टिकोण है, उसे बदलने में प्रभावी पहल सिद्ध होगी।

भारत सरकार अपने संपूर्ण स्वास्थ्य बजट का अभी मात्र 0.06 प्रतिशत ही मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च करती है। जो बेहद कम है। डब्लू.एच.ओ. का पूर्वानुमान है कि वर्ष 2020 तक भारत की लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या यानि लगभग 30 करोड़ से भी ज्यादा लोग किसी न किसी प्रकार के मानसिक विकार की चपेट में होंगे। इस दिशा में हमारे प्रयास अभी भी नाकाफी हैं। मानसिक स्वस्थ्य क्षेत्र में भारत में मात्र 3500 मनोचिकित्सक ही कार्यरत हैं। इस दिशा में अभी गंभीर और प्रभावी पहल करने की जरूरत है।

(लेखक समाजशास्त्री हैं।)

डॉ. राकेश राणा

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