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किन सवालों से रूबरू हमारा गणतंत्र

👤 mukesh | Updated on:26 Jan 2020 6:20 AM GMT

किन सवालों से रूबरू हमारा गणतंत्र

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- सतीश एलिया

इकॉनामिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की डेमोक्रेसी इंडेक्स की ताजा सूची में भारत को 51 वीं पायदान पर दिखाया गया है, पिछले साल की रैंकिंग में भारत 41 वें क्रम पर रखा गया था। यानी एक साल में सीधे 10 अंकों की गिरावट। इस रिपोर्ट के क्या मायने हैं? क्या कश्मीर से धारा 370 का हटना और नागरिकता संशोधन कानून की खिलाफत के हिेंसक आंदोलनों से भारत में डेमोक्रेसी खराब हो गई? इस रिपोर्ट के आधार और विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे क्योंकि बीते साल भारत को हंगर इंडेक्स में ऐसे ही नीचे उतारा गया था। भारत में पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से ज्यादा गरीबी बताई गई थी। जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश की जनता के लिए महंगाई और दुश्वारियां भारत से ज्यादा हैं। पाकिस्तान तो दिवालियेपन की कगार पर है, ऐसे में हंगर इंडेक्स पर यकीन नहीं होता। तो क्या डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत के 10 स्थान नीचे चले जाने का भी कोई अन्य निहितार्थ है?

ये सवाल ऐसे वक्त मेें उठ रहे हैं जब सरकार का लक्ष्य पांच ट्रिलियन इकॉनामी बनने का है, दुनिया समेत भारत में भी मंदी के हालात लग रहे हैँं और बेरोजगारी की समस्या गंभीर है। इनपर बात कम और सियासी विरोध का शोर है। वह भी तब जब भारत के संविधान के लागू होने के सत्तर बरस पूरे होने जा रहे हैं। यानी पूरे सात दशक। इस लंबे अर्से में इसमें 126 संशोधन हो चुके हैं। यानी हर दशक में 18 दफा संविधान में संशोधन किए जा चुके हैं। संविधान में संशोधन का प्रावधान संविधान में ही किया गया है वो इसलिए कि संविधान सभा में उस वक्त जो नेता शामिल थे, वे न केवल आला दर्जे के राष्ट्रभक्त थे बल्कि दूरदृष्टा और आने वाले समय की जरूरतों का अंदाजा लगा पा रहे थे। यही वजह थी कि उन्होंने आरक्षण को वंचित वर्ग के उत्थान के लिए लागू तो किया लेकिन इसे केवल 10 वर्षो के लिए ही लागू किया गया। अबतक हुए 126 संशोधनों में से सात तो आरक्षण को 10 और साल जारी रखने के संबंध में हो चुके हैं। वंचित वर्गों के उत्थान के मामले में हमारी सरकार अपनी असफलता को सात बार स्वीकार कर चुकी है।

आरक्षण के संबंध में एक दर्जन से ज्यादा संविधान संशोधनों के अलावा टैक्स प्रणाली और अन्य संशोधन समय-समय पर होते रहे हैं लेकिन संविधान में हुए ताजा नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश में लगातार जारी घमासान से देश में पहली दफा ऐसे हालात बना दिए गए हैं, जब संसद में पारित होने के बाद किसी संविधान संशोधन या कानून संशोधन के खिलाफ इतना विरोध सामने आया है। इस मामले में डेढ़ सौ से ज्यादा याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हैं और कोर्ट ने संविधान पीठ बनाने की बात कही है। असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई 35 साल बाद काला कोट पहनकर खुद सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ खड़े हुए हैं। यह भी पहली ही दफा हो रहा है। देखना यह है कि लागू हो चुके नागरिकता संशोधन कानून को अपने राज्य में लागू नहीं करने का एलान कर चुकी गैर भाजपा शासित कई राज्य सरकारों की इस मुद्रा से केंद्र-राज्य संबंध और संघीय गणतंत्र भारत गणराज्य को अपने संविधान लागू होने के 70 साल पूरे होने पर मिल रही इस चुनौती का कैसा समाधान निकलता है?

एक देश और राजनीतिक संघर्ष के तौर पर हम वहीं खड़े हैं, जहां से चले थे। अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी से मुक्ति के वक्त की विभाजनकारी सियासत सिर उठाए हुए है। बिडम्बना ही कही जाएगी कि भारत का संविधान लागू होने के 70 साल पूरे होने के मौके पर हर तरफ संविधान की दुहाई भरे प्रदर्शनों, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच टकराव तथा नए सियासत गठजोड़ों और दुरभिसंधियों के बीच न्यायपालिका के समक्ष भी चुनौतियां कम नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आजादी के पहले से चले आ रहे अयोध्या रामजन्म भूमि विवाद जैसे मामले का फैसला करने जैसा महत्वपूर्ण कार्य किया। लेकिन अब उसके समक्ष नागरिकता संशोधन कानून बनाम एनआरसी बनाम एनपीआर जैसे विवाादों को निपटाने का बड़ा सवाल सामने है, जाे मुख्यतया सियासी वर्चस्व और अस्तित्व की टकराव की परिणिति है। ऐसे में नागरिकों को नागरिकता बोध को गहरा करने और सियासी जमातों के असल मंतव्यों को समझने और खुद को देशहित में सामने लाने की जरूरत है।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।)

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