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भाजपा नीति नहीं, अपने नेताओं की नीयत बदले

👤 mukesh | Updated on:14 Feb 2020 7:03 AM GMT

भाजपा नीति नहीं, अपने नेताओं की नीयत बदले

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- मनोज ज्वाला

राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के बाद झारखण्ड तक हार चुकी भाजपा दिल्ली भी नहीं जीत सकी। ऐसा प्रतीत होता है कि 'सत्ता के केन्द्र' में विराजमान भाजपा अब देश के 'केन्द्र' में नहीं बल्कि सिर्फ 'देश की सत्ता के शीर्ष' पर आसीन रहेगी और देश के आन्तरिक सत्ता प्रतिष्ठानों से बेदखल होती रहेगी। पांच राज्यों में हार के बाद भाजपा इसके कारणों की समीक्षा करती रही है। स्वाभाविक है 'दिल्ली से दूर' रहने के कारणों की भी पड़ताल करेगी। जिस पार्टी को पिछले साल ही संसदीय चुनाव में देशभर के मतदाताओं ने आशा से अधिक प्रचण्ड बहुमत देकर केन्द्रीय सत्ता के शीर्ष पर दोबारा आसीन किया, उसी दल को विधानसभा चुनाव में उन्हीं मतदाताओं द्वारा नकार दिया जाता है तो यह उस पार्टी के लिए ही नहीं बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी गहन चिन्तन-मंथन का विषय अवश्य है। देखना यह होगा कि विधानसभा चुनाव में एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के लगातार पराभव का कारण उसकी नीतियां ही हैं या और कुछ?

यह बात भी सही है कि संसदीय चुनाव और विधानसभा चुनावों के मुद्दे एक-दूसरे से भिन्न होते हैं किन्तु यह भी गौरतलब है कि जिन प्रदेशों की सत्ता भाजपा को गंवानी पड़ी, उन प्रदेशों में पहले से कायम उसकी सरकार की प्रादेशिक रीतियां-नीतियां-गतिविधियां अथवा जनकल्याण की उसकी विधियां कहीं से भी गलत नहीं थी। केन्द्र सरकार की तरह उन राज्यों की उसकी सरकारें भी आमतौर पर शुचिता व पारदर्शिता से युक्त एवं भ्रष्टाचार से मुक्त होने के साथ-साथ चुस्त-दुरुस्त व कमोबेश लोकप्रिय भी थीं। छत्तीसगढ़ व झारखण्ड में नक्सली आतंक-अत्याचार पर काबू पाने का श्रेय भाजपा के नाम ही दर्ज है। इसी तरह से राजस्थान व महाराष्ट्र में उसकी सरकार कांग्रेस की तुलना में ज्यादा कल्याणकारी थीं। बावजूद इसके विधानसभा चुनावों में वह सत्ता से बेदखल हो गई। पड़ताल करने पर जो तथ्य सामने आते हैं, उससे उसकी नीति के बजाय उसके नेताओं की नीयत व कार्यपद्धति की ओर संकेत मिलता है। प्रायः इन सभी प्रदेशों में भाजपा की हार 'भाजपाइयों' के कारण हुई दिखती है। भाजपा के छुटभैये नेता और उसके जमीनी कार्यकर्ताओं ने ही उसे सत्ता से बेदखल कर दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव की बात करें तो दिल्ली प्रदेश में भाजपा सदस्यों की संख्या 62 लाख से भी अधिक है किन्तु उसे प्राप्त हुए कुल मतों की संख्या मात्र 35 लाख है। प्राप्त मतों में आम जनता के मत भी शामिल हैं। मतलब साफ है कि उसके सभी सदस्यों ने भी उसे अपना मत नहीं दिया।

संसदीय चुनाव के दौरान उसके राष्ट्रवाद और मोदी जी के आदर्शवाद से प्रेरित-प्रभावित होकर दिल्ली की सभी सातों लोकसभा क्षेत्रों में जिन लोगों ने उसे भारी बहुमत से विजय प्रदान कर दिया, उसी प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उन्हीं लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया। मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 निरस्त करने और पाकिस्तानी हिन्दुओं को नागरिकता प्रदान करने सहित राष्ट्रीय महत्व के कई काम करने के बावजूद आखिर ऐसा क्यों हुआ? कम से कम दिल्ली में तो भाजपा को प्राप्त कुल मतों के आंकड़ों से तो साफ हो जाता है कि उसके सदस्यों की कुल संख्या जो 62 लाख है, वह या तो फर्जी हैं या उसके आम सदस्य और आम कार्यकर्ता भी उससे नाराज हैं। इन दोनों ही स्थितियों में उसके नेताओं की नीयत और उनकी कार्यपद्धति के दोष उजागर हो जाते हैं।

इसी तरह मोदी लहर के सहारे सांसद बने बड़े भाजपाई पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और सामान्य सदस्यों से असामान्य दूरी बनाकर अपने ऊपर के नताओं की परिक्रमा में लगे रहे होंगे। भाजपा के भीतर-बाहर यह आम शिकायत है कि उसके नेतागण सत्ता या संगठन में बड़ा पद हासिल कर पार्टी के आम कार्यकर्ताओं से दूरी बना लेते हैं। फलतः पांच वर्षों तक हैरान-परेशान कार्यकर्ता चुनाव के ऐन मौके पर अपनी भड़ास निकालने के लिए या तो पार्टी के विरोध में चला जाता है या मन मारकर चुपचाप घर बैठ जाता है । बची-खुची कसर दल-बदलुओं को चुनावी टिकट देकर पूरी हो जाती है। झारखण्ड में यही हुआ।

दूसरी ओर भाजपा विरोधी दल और उनके नेता-नियन्ता सत्ता हासिल करते ही अपने कार्यकर्ताओं को शासनतंत्र का हिस्सा बना कर उन्हें न केवल संतुष्ट किये रखते हैं बल्कि आर्थिक रूप से भी उनकी स्थिति सुदृढ़ बना देते हैं। सत्ता में रहने के दौरान वे अपने कार्यकर्ताओं से नजदीकी बनाए रखने में भी लगे रहते हैं। पांच साल अपने मतदाताओं-समर्थकों के हितों की चिन्ता भी करते हैं। अपना वोटबैंक बनाये रखना उनकी प्राथमिकताओं में होता है। दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल हों या झारखण्ड के 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन हों; उनके कार्यकर्ता उनसे कभी नाराज नहीं रहते क्योंकि सत्ता की चाशनी के रस-गंध उन्हें भी मिलते रहते हैं। इसके विपरीत भाजपा के नेतागण अपने केन्द्रीय नेतृत्व, जो पिछले छह वर्षों से मोदी-शाह के नेतृत्व में है उनके भरोसे या 'संघ' के सहारे बैठे रहते रहते हैं। 'संघ' कोई राजनीतिक संगठन तो है नहीं जो भाजपा के लिए 'सत्ता-प्रबंधन' का काम करता रहे, उसकी प्राथमिकताओं में अपने बहुत सारे कार्यक्रम हैं। यह बात दीगर है कि उसकी गतिविधियों का लाभ सीधे-सीधे भाजपा को ही मिलता है। ऐसे में जाहिर है कि भाजपा का यह पराभव 'भाजपाइयों' के कारण हुआ है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

मालूम हो कि दिल्ली में लगभग 25-26 ऐसी सीटें हैं जहां भाजपा उम्मीदवारों की हार महज कुछ सौ या कुछ हजार वोटों से हुई है। अगर भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं एवं सदस्यों में चुनाव के प्रति पर्याप्त उत्साह होता और उन तमाम लोगों ने केवल अपना-अपना मतदान भी किया होता तो भाजपा 'दिल्ली से दूर' नहीं रहती। अन्य पांच राज्यों में भाजपा की लगातार हुई हार का यही सबसे बड़ा कारण है। भाजपा को इस पराभव से उबरने के लिए अपनी 'नीति' में नहीं, अपने नेताओं की नीयत और उनकी कार्यपद्धति को बदलना होगा। अन्यथा आगे उसे और भी नुकसान हो सकता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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