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जनाधार खोती कांग्रेस, दिल्ली में रही-सही साख भी समाप्त

👤 mukesh | Updated on:14 Feb 2020 7:09 AM GMT

जनाधार खोती कांग्रेस, दिल्ली में रही-सही साख भी समाप्त

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- रमेश सर्राफ धमोरा

आम आदमी पार्टी एकबार फिर भारी बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आई है। आप को 62 व भाजपा को 8 सीटें मिलीं। सीटों के हिसाब से देखें तो आप की 5 सीटें कम हुई हैं। आम आदमी पार्टी फिर से सत्ता में आने पर खुश है, वहीं भारतीय जनता पार्टी अपना वोट प्रतिशत व सीटें बढ़ने से खुश है। चुनाव में यदि किसी को सबसे अधिक नुकसान हुआ है तो वह है कांग्रेस। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रही-सही साख भी समाप्त हो गई है। दिल्ली में कांग्रेस लगातार दूसरी बार शून्य पर आउट हुयी है।

2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद लगने लगा था कि कांग्रेस दिल्ली में पकड़ बना रही है। दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में से 5 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के सामने कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही थी। जबकि आम आदमी पार्टी सिर्फ 2 सीटों पर ही मुकाबले में आ पाई थी। उस चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत भी बढ़कर 22.46 प्रतिशत हो गया। जबकि उससे पूर्व 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 9.03 प्रतिशत ही वोट मिले थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से भाजपा 65 पर व कांग्रेस 5 विधानसभा सीटों पर आगे रही थी। उस चुनाव में आम आदमी पार्टी को एक भी विधानसभा क्षेत्र में बढ़त नहीं मिली। लेकिन लोकसभा चुनाव के 8 माह बाद ही आप ने पासा पलटकर रख दिया व एकबार फिर भारी बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हो गई।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 66 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था तथा 4 सीटें गठबंधन के तहत लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल को दी थी। लेकिन 70 में से कांग्रेस के देवेंद्र यादव बादली से, अभिषेक दत्त कस्तूरबा नगर से व अरविंद सिंह लवली गांधीनगर सीट से जमानत बचा पाने में सफल रहे हैं। बाकी कांग्रेस के सभी 63 व राजद के चारों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। सबसे बुरी हालत तो कांग्रेस के सहयोगी राजद की हुई। उसके (बुरारी, किरारी, उत्तमनगर व पालम) चारों प्रत्याशियों को कुल मिलाकर 3 हजार 463 वोट मिल पाए।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप से कांग्रेस में आई अलका लंबा चांदनी चौक सीट पर मात्र 3032 वोट व आप से कांग्रेस में आए आदर्श शास्त्री द्वारका सीट से 5885 वोट हासिल कर सके। चुनाव के वक्त दोनों आप के विधायक थे। पूर्व सांसद कीर्ति झा आजाद की पत्नी पूनम आजाद संगम विहार सीट से मात्र 2604 वोट ही ले पाईं। 1993 से 2013 तक दिल्ली में 5 बार विधायक रहे कांग्रेस नेता जयकिशन को सुलतानपुर माजरा (सुरक्षित) सीट से मात्र 9033 वोट ही मिले। दिल्ली में कांग्रेस के कद्दावर नेता व कई बार कैबिनेट मंत्री रहे हारून यूसुफ अपनी परम्परागत बल्लीमारान सीट से मात्र 4802 वोट ही बटोर पाए। वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री कृष्णा तीर्थ पटेल नगर (सुरक्षित) सीट से मात्र 3382 वोट ही ले पाईं। पूर्व विधायक मुकेश शर्मा को विकासपुरी सीट पर 5721 वोट मिले। पूर्व मंत्री परवेज हाशमी ओखला सीट से 2834 वोट ले पाये। 1993 से 2008 तक कृष्णा नगर सीट से लगातार पांच बार चुनाव जीतने वाले व शीला दीक्षित सरकार में 5 साल स्वास्थ्य मंत्री रहे डॉ. अशोक वालिया को महज 5079 वोट मिले। इस चुनाव में कांग्रेस को मात्र 3 लाख 93 हजार 353 वोट मिले। जबकि भारतीय जनता पार्टी को 35 लाख 20 हजार 253 वोट व आम आदमी पार्टी को 49 लाख 13 हजार 945 वोट मिले हैं।

इस तरह देखा जाए तो दिल्ली में कांग्रेस का पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो गया। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी इस तरह से चुनाव लड़ रहे थे मानो अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए खड़े हुये हों। कांग्रेस के पारम्पिक दलित, मुस्लिम मतदाताओं ने भी कांग्रेस को छोड़कर पूर्णतया आम आदमी पार्टी का दामन थामा। जिसके चलते कांग्रेस शून्य पर पहुंच गई। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय जब शीला दीक्षित प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थीं तो उस समय कांग्रेस काफी सक्रिय हो गई थी लेकिन कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी पीसी चाको के शीला दीक्षित से मतभेदों के चलते कांग्रेस आम आदमी से नहीं जुड़ पाई थी। पिछले छह सालों से दिल्ली कांग्रेस के प्रभारी रहे पीसी चाको ने चुनाव में शर्मनाक हार के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया लेकिन उनके प्रभारी रहते दिल्ली में लोकसभा, विधानसभा व नगर निगम के जितने भी चुनाव हुए हैं उन सब में कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली।

कांग्रेस का जनाधार धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का जनाधार घटा। हाल ही में संपन्न हुए महाराष्ट्र, झारखंड, विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस मुख्य मुकाबले में नहीं आ पाई थी। महाराष्ट्र में कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी है। सत्ता के लालच में कांग्रेस ने वहां शिवसेना जैसी कट्टर हिन्दूवादी पृष्ठभूमि वाली पार्टी के साथ मिलाकर सरकार चलाने को मजबूर है। इसी तरह झारखंड में भी कांग्रेस वोटों व सीटों के हिसाब से तीसरे नंबर की पार्टी है। वहां वह झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ सरकार में शामिल है।

दिसम्बर 2018 में कांग्रेस ने एक साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव जीतकर वहां सरकार बनाई थी। लेकिन मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी 15 वर्षों से निरंतर सत्ता में थी। इस कारण वहां सत्ता विरोधी लहर थी। राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का विरोध था। जिसके चलते वहां कांग्रेस सरकार बनाने में सफल रही थी। मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में महज 5 सीटों का फर्क रहा था। वहीं राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस से महज डेढ़ लाख वोटों से पीछे रह गई थी।

पार्टी के बड़े नेताओं के आम जनता से कट जाने के कारण कांग्रेस पार्टी दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है। प्रदेशों में जो कांग्रेस के प्रभारी लगाए गए हैं वो मनमानी करते हैं। दिल्ली में प्रभारी रहे पीसी चाको के खिलाफ बार-बार आवाज उठती रही है मगर उनपर कोई असर नहीं हुआ। महाराष्ट्र के प्रभारी मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ मुंबई प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष संजय निरूपम सहित कई नेताओं ने चुनाव के समय खुलेआम आरोप लगाए थे लेकिन उनको नहीं हटाया गया। कांग्रेस आलाकमान ने अपने प्रदेश प्रभारियों को पूरी छूट दे रखी है। जिसके चलते वो प्रदेशों में अपनी मनमानी चलाते हैं। प्रदेश प्रभारियों के अमर्यादित व्यवहार के चलते कई जनाधार वाले नेता पार्टी छोड़ देते हैं। जमीनी कार्यकर्ता कांग्रेस से नहीं जुड़ पाते हैं। यदि समय रहते कांग्रेस अपने पार्टी संगठन में आमूलचूल परिवर्तन नहीं करती है तो आने वाले समय में उसके मतदाताओं की संख्या में और भी कमी देखने को मिले तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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