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मजदूरों पर राजनीति नहीं, आत्ममंथन जरूरी

👤 mukesh | Updated on:26 May 2020 9:33 AM GMT

मजदूरों पर राजनीति नहीं, आत्ममंथन जरूरी

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- सियाराम पांडेय 'शांत'

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दो बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। दोनों ही बयान योगी आदित्यनाथ ने प्रवासी मजदूरों की दशा को देखते हुए दिए हैं। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह गलत बिल्कुल नहीं है लेकिन जिम्मेदार पद पर बैठे लोगों के स्तर पर इस तरह के बयान कितने उचित हैं, मंथन तो इस बात पर होना चाहिए। यह बयान निश्चित रूप से विपक्ष के तंज और मिथ्यारोपों की कोख से ही निकले हैं। काम करने के बाद भी कोई नकारा साबित करे तो इस तरह की प्रतिक्रियाओं का सामने आना स्वाभाविक है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है राज्यों में प्रवासी मजदूरों की घोर उपेक्षा हुई, उन्हें बेरोजगारी और मुफलिसी की विषम यातना झेलनी पड़ी। अब अगर किसी राज्य को मजदूरों की जरूरत होगी तो उन्हें रखने से पूर्व यूपी सरकार से अनुमति लेनी होगी। जाहिर-सी बात है कि योगी आदित्यनाथ ने यह बयान अत्यंत दुखी होकर दिया लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि लंबे समय से यूपी-बिहार के लोगों को महाराष्ट्र से निकालने की राजनीति कर रही शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को उनके इस बयान से संजीवनी मिल गई है। जो काम बाल ठाकरे पूरी जिंदगी नहीं कर पाए, उसे कोरोना और लॉकडाउन ने चुटकी बजाते कर दिया। यूपी-बिहार के मजदूर खुद महाराष्ट्र छोड़ आए। कोरोना युग की समाप्ति के बाद दोबारा वहां वे अपनी पहुंच बना पाएंगे भी या नहीं और उनके इस प्रयास में शिवसेना और मनसे कितना रोड़ा अटकाएगी, यह देखने वाली बात होगी लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अनुमति वाली बात से यूपी-बिहार के विरोधी दलों के दिल की मुराद पूरी कर दी है। इससे अपने राज्य अपने मजदूर- की भावना बलवती होगी जो वसुधैव कुटुम्बकम और सारा देश अपना-की भावना को आहत करेगी।

योगी आदित्यनाथ जब अनुमति देने की बात करते हैं तोे कहीं न कहीं इससे संविधान की मूल भावना 'भारत का नागरिक देश में कहीं भी जा सकता और रोजगार पा सकता है' भी प्रभावित होती है। बसपा ने उनके इस बयान के लिए उनकी आलोचना की है और बेरोजगारी से जूझते युवाओं के लिए इस बयान को परेशानी बढ़ाने वाला बताया है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और उस अनुपात में यहां कारोबारी विकास नहीं हुआ है। पूरब का मैनचेस्टर कहा जाने वाला कानपुर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। गाजियाबाद और नोएडा पर पहले ही रोजगार का भारी दबाव है। एक जिला एक उत्पाद योजना से सहारा मिल सकता था लेकिन नौकरशाही इसके विकास में निरंतर रोड़ा अटका रही है। तमाम विकास योजनाएं अधर में लटकी हैं।

22 करोड़ की आबादी को खुशहाल रखने के लिए जरूरी है कि एक भी काम करने योग्य हाथ बेकाम न रहें। इसमें शक नहीं कि मुख्यमंत्री इस बाबत निरंतर सोच रहे हैं। मंथन कर रहे हैं लेकिन जबतक योजनाएं धरातल पर नहीं आतीं तब तक केवल मंथन का कोई मतलब नहीं है। मुख्यमंत्री ने प्रवासी मजदूर आयोग के गठन की बात कही है। मजदूरों की स्किल मैपिंग कर उसकी योग्यता के अनुरूप काम देने की बात कही है। प्रयास तो इस बात के होने चाहिए कि एक भी व्यक्ति को रोजी-रोटी के लिए अपने परिवार से दूर न जाना पड़े। उसे अपने ही गांव, तहसील और जिले में काम मिले। देश ने मुम्बई को आर्थिक राजधानी बनाकर गलती की है। हर प्रदेश में आर्थिक राजधानी बनानी चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि वहां बिजली-पानी, सड़क, रेल और वायु परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं का विकास हो।

यह सच है कि कोरोना और लॉकडाउन से सर्वाधिक प्रभावित उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ही हुई है। राजस्थान, हरियाणा और पंजाब से पलायन कर रहे उत्तर प्रदेश के मजदूरों का दबाव तो उसपर है ही, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मजदूरों के हितों की चिंता करने भी उसकी नैतिक जिम्मेदारी बनी हुई है। इन सभी मजदूरों को जाना तो यूपी होकर ही है। मजदूरों को सुरक्षित लाने और उन्हें सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी जिस गति के साथ योगी सरकार ने निभाई, ऐसा अन्य किसी भी सरकार में देखने को नहीं मिला लेकिन विरोधी दलों ने योगी सरकार की जितनी आलोचना की है, वह किसी से छिपा नहीं है। शिवसेना तो योगी आदित्यनाथ की तुलना हिटलर से कर रही है। कांग्रेस को लगता ही नहीं कि यूपी में मजदूरों को कोई सुविधा मिल भी रही है। ऐसे में योगी अगर यह कह रहे हैं कि उद्धव ठाकरे ने अगर सौतेली मां की तरह भी मजदूरों का ध्यान रखा होता तो मजदूर वहां से पलायन को विवश न होते। जब वे यह कह रहे हैं कि सर्वाधिक कोरोना पीड़ित मजदूर महाराष्ट्र से आए हैं। उससे कुछ कम कोरोना संक्रमित दिल्ली से आए हैं और बाकी अन्य राज्यों से आए हैं तो इसमें कुछ गलत भी नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस की सरकार है। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है तो दिल्ली में सत्ता पर आम आदमी पार्टी काबिज है। अगर उक्त दलों और उनकी सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाई होती, प्रवासी मजदूरों के हितों का ध्यान रखा होता तो प्रवासी मजदूरों का संकट न बढ़ता।

आंकड़ों पर राजनीतिक बहस हो सकती है, एक-दूसरे को घेरा जा सकता है लेकिन असल सवाल यह है कि लोगों को रोजगार देने के मामले में हम कहाँ खड़े हैं। राजनीतिक आलोचना-प्रत्यालोचना तो ठीक है लेकिन गांव-गांव, तहसील-तहसील और जिला स्तर पर हम मूलभूत सुविधाओं का विकास कब और कैसे कर पाएंगे। मौजूदा समय एक-दूसरे की टांग खिंचाई का नहीं, परस्पर आत्ममंथन करने का है। एक-दूसरे की आलोचना कर हम अपने उत्तरदायित्वों से बच तो नहीं सकते।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)

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