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'नो मैन्स लैंड' में नेपाल की जबरन दखल

👤 mukesh | Updated on:8 July 2020 11:53 AM GMT

नो मैन्स लैंड में नेपाल की जबरन दखल

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- डॉ. रमेश ठाकुर

चीन की कठपुतली बनकर नेपाल क्या-क्या रंग दिखा रहा है, उसकी एक और तस्वीर सामने आई है। तराई क्षेत्र अमूनन शांत रहता है। दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले इसके भूजल स्तर में नमी की तरावट पूरी आबादी को ठंडक से लबरेज रखती है। समूचा इलाका वन क्षेत्र और फसली जमीन से घिरा है। प्राकृतिक धरोहर एवं दुर्लभ किस्म के जंगली जानवरों की चहलकदमी हमेशा बनी रहती है। लेकिन अपनी नापाक हरकत से नेपाल ने इस क्षेत्र में अशांति फैलाने की हिमाकत की है। हिमाकत कोई छोटी नहीं बल्कि बड़े स्तर की, जो बर्दाश्त करने लायक नहीं। नेपाल ने सीमा निर्धारित क्षेत्र का घोर उल्लंघन करते हुए, पीलीभीत जिले से सटे क्षेत्र में 'नो मैन्स लैंड' में जबरन सड़क का निर्माण किया। खबर जैसे ही स्थानीय प्रशासन को लगी, आला अफसरों की टीम तुरंत वहां पहुंची और निर्माण कार्य को रुकवाया।

फिलहाल नेपाल की इस ताजा हरकत ने दोनों मुल्कों के बॉर्डर क्षेत्र को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। भारत के अधिकृत क्षेत्र में बीते रविवार को नेपाल के लोगों ने सुबह के वक्त आकर सड़क बनानी शुरू कर दी। जबकि वह क्षेत्र 'नो मैन्स लैंड' में आता है, जिसका मतलब होता है कि जब किन्हीं दो मुल्कों के दरम्यान सीमा निर्धारित करने के लिए कुछ भूमि छोड़ी जाती है तो उसे 'नो मेंस लैंड' कहा जाता है। जो अधिकृत रूप से किसी भी देश के अधिकार क्षेत्र में नहीं होती है और इसमें सीमा निर्धारण के लिए स्तंभ, पिल्ले या बाड़ लगा दी जाती है। तराई क्षेत्र में भी दोनों मुल्कों की सीमा से सटा ऐसा क्षेत्र मौजूद है जो दशकों पहले निर्धारित हुआ था। जिसपर नेपाल ने दूसरी बार बिना वजह विवाद खड़ा किया है।

'नो मेंस लैंड' एरिया की कुछ शर्तें और नियम होते हैं, जिसका दोनों तरफ से पालन होता है। दोनों देशों के बीच 18-18 गज की चौड़ाई में जमीन छोड़ी हुई है। छोड़ी गई जमीन को ही 'नो मेंस लैंड' कहते है। भारत-नेपाल के बाॅर्डर क्षेत्र में भी ये भूमि मौजूद है। इसलिए छोड़ी हुई उस जगह पर न भारत अपना हक जमा सकता है और न नेपाल? किसी भी तरह का निर्माण कार्य वहां वर्जित होता है। ये भूमि हर उस मुल्क को छोड़नी होती है जिनकी सीमाएं दूसरे देशों से लगी होती है। ये सब जानने के बावजूद नेपाल ने उस वर्जित और प्रतिबंधित क्षेत्र में सड़क बनाने की जुर्रत की। उनकी इस हिमाकत के बाद काठमांडू से दिल्ली तक माहौल गर्मा गया है। आखिर ऐसा क्या है जो कुछ समय के अंतराल बाद नेपाल सीमाई क्षेत्रों में उछलकूद मचा रहा है।

अभी थोड़े दिन पहले भी नेपाली सैनिकों ने बिहार से लगे क्षेत्र में अंधाधुंध गोलियां चलाकर एक भारतीय नागरिक को मार दिया था। जबसे चीन-भारत के बीच माहौल गर्म हुआ है तभी से नेपाल भारतीय सीमाओं पर लगातार कोई न कोई खुराफात कर रहा है। तराई क्षेत्र के 'नो मेंस लैंड' में जिस तरह से नेपाल ने हरकत की है, उससे कई तरह के सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि उनके निर्माण कार्य को पीलीभीत जिला प्रशासन ने रुकवा दिया है लेकिन उस घटना के बाद पीलीभीत और लखीमपुर खीरी दोनों जिलों की सीमाओं से सटे बॉर्डर क्षेत्र पर भारत ने एसएसबी की कई टुकड़ियों की तैनाती करके उन्हें सतर्क रहने का आदेश दिया है। एकाध सप्ताह पहले भी नेपालियों ने बसही बॉर्डर पर भी जबरन निर्माण करके बवाल किया था।

तराई ऐसा क्षेत्र है जहां कभी भी इस तरह की हरकतें नहीं हुई। पर, अचानक से नेपाल की तरफ से ने कूद-फांद शुरू कर दी गयी है। केंद्र सरकार भी सकते में है, आखिर नेपाल ऐसा कर क्यों रहा है? संदेह ऐसा भी है कि कहीं किसी के उकसाने से तो ये हरकत नहीं कर रहा। फिलहाल सरकार ने पूरे मामले पर नेपाल सरकार से जवाब मांगा है और काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास को भी अलर्ट किया है। जवाब मांगना भी चाहिए ताकि माजरा पता चले। गौरतलब है कि नेपाल के साथ हमारी 'नो मेंस लैंड' क्षेत्र से उत्तर प्रदेश के कुछ जिले जुड़े हुए हैं जिनमें पीलीभीत, लखीमपुर, गोंडा, बहराइच आदि प्रमुख हैं। कुछ क्षेत्रफल उत्तराखंड का भी आता है। इन क्षत्रों में नेपाली लोग बिना वीजा के भारतीय क्षेत्रों में मजदूरी-नौकरी आदि करते आते हैं। ज्यादातर खेतों में काम करने आते हैं। इस वक्त खेतों में धान की रोपाई हो रही है तो ज्यादातर मजदूर नेपाल से आ रहे हैं। कभी कोई रोकधाम नहीं हुई लेकिन उनके मौजूदा कृत्य ने सतर्कता बढ़ा दी। वहां से भारतीय क्षेत्रों में मजदूरी करने आने वाले मजदूरों को रोक दिया गया है।

नेपाल सीमा पर भारतीय सैनिकों की जबरदस्त पहरेदारी शुरू हो गई है। घटना बीते रविवार यानी पांच अप्रैल की है तब से लेकर अभीतक कई मजदूरों को पुलिस ने जबरन भारतीय सीमाओं में घुसने को लेकर अरेस्ट भी किया है। बखेड़ा ज्यादा खड़ा होने के बाद से एसएसबी के जवान बॉर्डर से सटे नेपाली गांवों पर भी नजर बनाए हुए हैं। नेपालियों ने जिस क्षेत्र पर सड़क का निर्माण शुरू किया था, उसे टिल्ला नंबर-4 कहते हैं, जो नेपाल का पचंवी नामक गांव से बिल्कुल सटा हुआ है। इस गांव के लोग काफी समय से भारतीय क्षेत्र को अपना बताते आए हैं लेकिन दो सौ वर्ष पूर्व के कालखंडों और दस्तावेजों के मुताबिक वह क्षेत्र अधिकारिक रूप से भारत का ही है।

आज से करीब पचास साल पहले भी नेपाल ने एकबार और विवाद खड़ा किया था। तब भी नो मैंस लैंड सीमा में करीब दस मीटर अंदर तक नेपालियों ने घुसकर अपना झंडा गाड़ा था। विरोध में तब हमारे एसएसबी जवानों द्वारा हवाई गोलियां चलाईं और करीब दस राउंड फायरिंग व आंसू गैस के गोले दागने के बाद नेपाली पीछे हटे थे। खैर, उस समय दोनों तरफ के अधिकारियों ने मसला सुलझा लिया था। उस समय सहमति बनी थी कि वहां दोनों ओर से किसी प्रकार का कोई निर्माण नहीं किया जाएगा। लेकिन पुरानी बातें भूलकर नेपाल ने एकबार फिर नो मैंस लैंड एरिया में सड़क बनाने का नाकाम प्रयास किया। इसबार भी खदेड़े गए हैं लेकिन उनकी इन हरकतों के बाद से सीमा पर माहौल तनातनी का बन गया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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