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अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है सोने का संग्रह

👤 mukesh | Updated on:31 July 2020 12:07 PM GMT

अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है सोने का संग्रह

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- प्रमोद भार्गव

भारत समेत पूरी दुनिया में कोरोना महामारी के चलते अर्थव्यवस्था जबरदस्त मंदी का सामना कर रही है। बाजार में धन की तरलता कम हो जाने के कारण अधिकतर देशों की माली हालत लड़खड़ा गई है और बेरोजगारी बढ़ रही है। बावजूद व्यक्तिगत स्तर पर सोने की खरीद में तेजी आई हुई है। इस खरीद की पृष्ठभूमि में बैंक में जमा धनराशि की ब्याज दरों में कमी, जमीन-जायदाद और शेयर बाजार का कारोबार लगभग ठप पड़ जाना है। इसलिए लोग ठोस सोने-चांदी की खरीदकर संग्रह में लगे हैं।

सोने में पूंजी का सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। इसीलिए बीते पांच दशकों में सोने में 14 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है। बीते एक साल में यह वृद्धि 40 प्रतिशत रही है। कुछ साल पहले रिर्जव बैंक द्वारा सोने में आयात के नियमों में ढील देने के कारण सोने का आयात बढ़ा है, जो विदेशी मुद्रा डॉलर में होता है। सोने की तस्करी भी बड़ी मात्रा में हो रही है। केरल की स्वप्ना सुरेश प्रभु नाम की महिला ही 230 किलो सोने की तस्करी मात्र बीते एक साल के भीतर कर चुकी है। इसकी कीमत 125 से 130 करोड़ बताई जा रही है। एनआईए ने खुलासा किया है कि इस मामले से जुड़े आरोपी केटी रमीज के आतंकियों से संबंध हैं और वह इस धन से आतंकवाद के वित्त पोषण में लगा है। इस बिना पढ़ी-लिखी महिला के तार केरल के मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर संयुक्त अरब अमीरात के महावाणिज्य दूतावास तक जुड़े हैं। जाहिर है, यदि इस अनुत्पादक और मृत संपदा में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार खप जाएगा तो निकट भविष्य में देश को विदेशी मुद्रा के संकट का सामना करना पड़ सकता है। एक समय भले ही भारत सोने की चिड़िया कहा जाता हो, लेकिन आज तो उसे अपनी जरूरतों के लिए 95 फीसदी सोना दूसरे देशों से खरीदना होता है। कच्चे तेल के बाद सोने के आयात में ही सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च होती है। ऐसे में मिलावटी सोना भी खूब बिक रहा है।

कोरोना काल में सोने में बहुत तेजी देखने में आई है। सोना अब करीब 54 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गया है। इससे पहले सोने के दाम इतने कभी नहीं उछले। चांदी भी 64 हजार रुपए प्रति किलो पहुंच गई है। दुनिया में रफ्तार के पहिए थम जाने के कारण ऐसा लग रहा है कि इन धातुओं के दामों में फिलहाल गिरावट आने वाली नहीं है। सोना भारतीय परंपरा में धार्मिक,सामाजिक और आर्थिक दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। पूजा-पाठ से लेकर शादी में वर-वधु को सोने के गहने देना प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रतीक है। जीवन में बुरे दिन आ जाने की आशंकाओं के चलते भी सोना सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति आम आदमी में खूब है। इसलिए जैसे ही सोना सस्ता होता है, इसकी खरीद बढ़ जाती है। जिसका अप्रत्यक्ष प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। सोना डॉलर में आयात किया जाता है। इस वजह से व्यापार घाटा खतरनाक तरीके से बढ़ जाता है। इस कारण रूपए की कीमत भी गिरने लगती है।

2003 में जहां हम 3.8 अरब डॉलर सोने का आयात करते थे, वहीं देश के धनी लोगों की स्वर्ण-लिप्सा के चलते 2011-12 में यह आंकड़ा 57.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत सोने के आयात के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। 2016-17 में 771.2 टन और 2018-19 में 760.4 टन सोने का आयात किया गया। राजस्व गुप्तचर निदेशालय यानी डीआरआई की 2019 में आई रिपोर्ट के मुताबिक देश में सोने की तस्करी लगातार बढ़ रही है। 2017-18 में कुल 974 करोड़ रुपए का सोना पकड़ा गया। इसके अलावा कस्टम विभाग ने भी लगभग इतने ही सोने की बरामदगी अंतरराष्ट्रीय हवाई-अड्डों और बंदरगाहों से की। डीआरआई का मानना है कि तस्करी के जरिए जितना सोना भारत में आता है, उसका मात्र 5 से 10 प्रतिशत ही सोना पकड़ में आ पाता है। इस हिसाब से डीआरआई का मानना है कि 10 हजार करोड़ रुपए का सोना देश में तस्करी के जरिए आया है। विश्व स्वर्ण परिषद् का मानना है कि सोने पर 2.5 प्रतिशत कर बढ़ा दिए जाने के कारण तस्करी में वृद्धि हुई है। सोने की वैध खरीद पर कुल 12.5 प्रतिशत कर लगता है। सोना और इसके अभूषणों पर 3 प्रतिशत जीएसटी लगती है। इसके अलावा सोने के व्यापारी और स्वर्णकार इस पर दो प्रतिशत अलग से शुल्क लेते हैं। मसलन सबकुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार से सोने के भाव में अंतर 15.5 प्रतिशत तक होता है। इस कारण तस्करी को बढ़ावा मिल रहा है। तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने एक समग्र स्वर्ण नीति बनाने की घोषणा की थी, लेकिन उनके निधन के बाद इसपर अमल नहीं हुआ।

बृहत्तर भारत में सोने का भण्डार लगातार बढ़ रहा है। यह सोना देश के स्वर्ण आभूषण विक्रेताओं, घरों, मंदिरों और भारतीय रिजर्व बैंक में जमा है। 2014-15 में ही 850 टन सोना आयात किया गया था। इतनी बड़ी मात्रा के बावजूद विश्व स्वर्ण परिषद् का मानना है कि भारत के सरकारी खजाने में सिर्फ 557.7 टन सोना है। सोने के सरकारी भंडार के मामले में भारत 11वें स्थान पर है। इसके इतर इसी परिषद् का अनुमान है कि भारत में 22 हजार टन सोना घरों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों एवं पूंजीपतियों के न्यासों के पास है। गुजरे जमाने के सामंतों के पास भी अकूत सोना है। सोने की उपलब्धता की जानकारी देने वाली यह रपट 'इंडिया हार्ट ऑफ गोल्ड 2015' शीर्षक से जारी की गई थी। यह रिपोर्ट विश्व के तमाम देशों में सोने की वस्तुस्थिति के सिलसिले में किए गए एक अध्ययन के रुप में सामने आई थी। अमेरिका के पास 8133.5 टन सोने के भंडार हैं। दुनिया का लगभग 32 प्रतिशत सोना भारत के पास है। 1991 में जब भारत की आर्थिक स्थिति डांवाडोल थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर सरकार ने बैंक आफ इंग्लैण्ड में 65.27 टन सोना गिरवी रखकर अर्थव्यवस्था को गति दी थी। देश में सोने की मजबूत स्थिति के चलते ही, देश को सोने की चिड़िया कहा जाता है।

यदि इस सोने को देश की कुल आबादी में बराबर-बराबर टुकड़ों में बांटा जाए तो देश के प्रत्येक नागरिक के हिस्से में करीब आधा औंस सोना आएगा। हालांकि प्रति व्यक्ति सोने की यह उपलब्धता पश्चिमी देशों के प्रति व्यक्ति की तुलना में बहुत कम है। लेकिन विशेषकर भारतीय महिलाओं में स्वर्ण-आभूषणों के प्रति लगाव के चलते रिर्जव बैंक ने सोने की जो बिक्री शुरू की है, उसके चलते व्यक्तिगत सोने की उपलब्धता में और बढ़ोत्तरी होगी। वैसे भी हमारे यहां लोग धन की बचत करने में दुनिया में सबसे अग्रणी हैं। भारतीय अपनी कुल आमदनी का तीस फीसदी हिस्सा बचत खाते में डालते हैं। इसमें अकेले सोने में 10 फीसदी निवेश किया जाता है। शादियों में भी बेटी-दामाद को स्वर्ण आभूषण दान में देने का प्रचलन है, इस कारण भी सोने की घरेलू मांग देश में हमेशा बनी रहती है। इसीलिए इस कोरोना-काल में सोने के दाम आसमान छू रहे हैं।

भारत के स्वर्ण बाजार को ख्याल में रखते हुए विश्व स्वर्ण परिषद् द्वारा यह रिपोर्ट इस मकसद से जारी की गई थी, जिससे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां निर्मित स्वर्ण आभूषण बाजार में पूंजी निवेश करने की संभावनाएं तलाशें। क्योंकि भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा बाजार है। अंतरराष्ट्रीय सराफा बाजार के लिए भारत के आभूषण बाजार बेहद महत्वपूर्ण हैं। वैसे सोना भारतीय समाज का अंतरंग हिस्सा है। देश में सोना जमीन-जायदाद व अन्य अचल संपत्तियों से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। घरों में सोना रखना इसलिए भी जरुरी माना जाता है, जिससे विपरीत परिस्थिति, मसलन हारी-बीमारी में सोना गिरवी रखकर नकद रकम हासिल की जा सके। सोने में बचत निवेश लोग इसलिए भी अच्छा मानते हैं, क्योंकि इसके भाव कुछ समय के लिए स्थिर भले ही हो जाएं, घटते कभी नहीं हैं। लिहाजा सोने में पूंजी निवेश को कमोबेश सुरक्षित माना जाता है। बशर्ते सोना चोरी न हो ? हालांकि अब सक्षम लोग बैंक लॉकरों में सोना रखने लगे हैं। वर्तमान में ऊंची कीमतों के बावजूद लोग सोने में खूब निवेश कर रहे हैं।

रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 के अनुच्छेद 33 (5) के अनुसार रिर्जव बैंक के स्वर्ण भंडार का 85 प्रतिशत भाग बैंक के पास सुरक्षित रखना जरूरी है। यह सोने के सिक्कों, बिस्किट्स, ईंटों अथवा शुद्ध सोने के रूप में रिजर्व बैंक या उसकी एजेंसियों के पास आस्तियों अथवा परिसंपत्तियों के रूप में रखा होना चाहिए। इस अधिनियम से सुनिश्चित होता है कि ज्यादा से ज्यादा 15 फीसदी स्वर्ण भंडार ही देश के बाहर गिरवी रखा जा सकता है अथवा बेचा जा सकता है। जबकि 1991 में इंग्लैण्ड में जो 65.27 टन सोना गिरवी रखा गया था, वह रिजर्व बैंक में उपलब्ध कुल सोने का 18.24 प्रतिशत था। जो रिजर्व बैंक की कानूनी-शर्तों के मुताबिक ही 3.24 फीसदी ज्यादा था। रिजर्व बैंक में जो सोना सुरक्षित होता है, उसका एक प्रतिशत से भी कम रिटर्न हासिल होता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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