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तेजोमय विजय पर्व का अभिनंदन

👤 mukesh | Updated on:25 Oct 2020 11:03 AM GMT

तेजोमय विजय पर्व का अभिनंदन

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- हृदयनारायण दीक्षित

संघर्ष आदिमकाल से ही मानव समाज का हिस्सा है। यह दुनिया युद्धविहीन कभी नहीं रही। भारतीय चिंतन में सत्य और असत्य, शुभ और अशुभ व सही-गलत का संघर्ष बताया गया है। भारतीय मनीषा ने इस संघर्ष में सत्य की विजय देखी है। युद्ध के लिए तमाम हथियार और उपकरण भी बनाए जाते रहे हैं। आधुनिक काल में भी युद्ध उपकरणों की बहुतायत से पृथ्वी के अस्तित्व पर संकट है। युद्धविहीन दुनिया विश्व चिंतकों का सपना है, लेकिन मानव सभ्यता की शुरूआत से ही हथियारों का निर्माण जारी है। तमाम पुरातात्विक खोजों में पत्थर और लोहे के हथियारों के अवशेष मिले हैं। युद्ध इतिहास के मुख्य विवरण है। दुनिया का इतिहास वस्तुतः युद्ध का ही इतिहास है। युद्ध में भारी हिंसा होती है। महाभारत की कथा भयावह हिंसा से भरी-पूरी है। मध्यकाल के इतिहास में भी युद्ध है। रामकथा की भी समाप्ति भीषण युद्ध में रावण के मारे जाने के बाद होती है। इस युद्ध में तमाम हथियार चले थे। युद्ध में विजय के अनेक उपकरण होते हैं। योद्धा का धैर्य, पौरुष और पराक्रम मुख्य उपकरण है। प्राचीनकाल में रथ भी युद्ध का मुख्य उपकरण था। ऋग्वेद में भी रथ की भारी चर्चा है। वैदिककाल में रथ का उपयोग युद्ध के अलावा यात्राओं के लिए भी होता था, लेकिन रथ युद्ध का विशेष सहायक उपकरण था।

राम रावण युद्ध में भी रथ मुख्य उपकरण था। रामचरितमानस में विशेष रथ का सुन्दर उल्लेख है। यह रथ अनूठा है। इस रथ में भारतीय चिंतन परंपरा के अनुसार युद्ध में विजय के अनेक उदात्त तत्व भी शामिल हैं। रामचरितमानस लंकाकाण्ड में श्रीराम और रावण आमने-सामने थे। रावण के पास खूबसूरत रथ था। श्रीराम पैदल ही थे। इसपर विभीषण बहुत दुखी हुए। तुलसीदास ने लिखा है, ''रावनु रथी बिरथ रघुबीरा/देखि बिभीषन भयउ अधीरा।'' विभीषण ने श्रीराम से कहा, ''नाथ न रथ नहि तन पद त्राना/केहि बिधि जितब बीर बलवाना।'' विभीषण ने कहा, आपके पास रथ नहीं है, न ही पैरों में पहनने के लिए ही कुछ है। हे राम आप इस पराक्रमी रावण का सामना कैसे करेंगे?'' यह बात सुनकर श्रीराम ने कहा कि विजय रथ यह नहीं दूसरा ही है। फिर श्रीराम ने युद्ध में विजय दिलाने वाले रथ का वर्णन किया और कहा शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिये हैं- सौरज धीरज तेहि रथ चाका/सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका। सत्य और शील इस रथ के ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक और इन्द्रियों का वसीकरण व परोपकार इस रथ के चार घोड़े हैं। ये क्षमा, दया और समतारूपी डोरी से रथ में जुड़े हैं। वैराग्य ढाल है। संतोष तलवार है। बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है। विज्ञान धनुष है। निर्मल और संकल्प सिद्ध मन तरकस है। शम-यम और नियम बाण हैं। तुलसी के अनुसार श्रीराम ने अन्त में कहा, ''एहि सम विजय उपाय न दूजा।'' आगे कहा, ''सखा धर्ममय अस रथ जाकें/जीत न सकिह कतहुँ रिपु ताकें।''

सदाचार के सभी उपकरणों वाला यह रथ विजय श्री दिलाने वाला है। ऐसे रथी को कोई शत्रु पराजित नहीं कर सकता। ऐसा रथ अजेय है। यह भारतीय चिन्तन का विजय रथ है। विभीषण से श्रीराम ने कहा जिसके पास ऐसा रथ हो वह सांसारिक दुखरूपी शत्रु को भी जीत लेता है- महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर/जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर। संसार में अनेक दुख और अनेक अन्तर्विरोध हैं। प्रिय से विक्षोह दुख है। अप्रिय का मिलन दुख है। प्रिय वस्तु का छूट जाना दुख है। प्रिय परिजन या मित्र का वियोग दुख है। पराजय दुख है। बीमारी दुख है। बुढ़ापा दुख है। मृत्यु दुख है। संसार दुख से भरा-पूरा है। बुद्ध का दुख बोध भारतीय चिंतन की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। श्रीराम के विजय रथ में वर्णित तत्व सांसारिक दुखों पर भी विजय प्राप्त कराने वाले हैं। विजय रथ के तत्व योग के भी तत्व हैं। इन्द्रिय निग्रह यम-नियम आदि का पालन योग है। शील और सदाचार योग की उपलब्धि है। चित्त वृत्तियाँ दुखी करती हैं। इनसे छुटकारा पतंजलि के योग सूत्रों का ध्येय है। विजय प्राप्ति के लिए योग और योग के उपकरणों का उल्लेख गीता में भी आया है। गीता की समाप्ति वाले अंश में धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा कि इस युद्ध में कौन जीतेगा। संजय ने कहा ''जिधर योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन हैं मेरे मत में वही विजय पाएगा।'' यहाँ विजय के उपकरण के रूप में योगेश्वर कृष्ण हैं। योग है। धनुर्धर अर्जुन भी हैं। यहाँ धनुर्धर युद्ध का भौतिक उपकरण है।

संप्रति सारी दुनिया में विजय पर्व का उल्लास है। श्रीरामलीला के मंचन है। इस पर्व का सम्बन्ध श्रीराम की लंका विजय से है। श्रीराम की विजय और रावण की पराजय सत्य शील मर्यादा और आदर्श की विजय है। जन उत्पीड़न, शोषण और अत्याचार की पराजय है। ऐसा युद्ध आदिमकाल से जारी है। इस युद्ध में आदर्श जीवन मूल्य बार-बार विजयी होते हैं। निकृष्ट जीवन मूल्य बार-बार हारते हैं, लेकिन युद्धक प्रवृत्तियाँ नष्ट नहीं होती। आदर्श समाज बनाने के इच्छुक सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिन्सा की प्रवृत्तियों पर ध्यान देना चाहिए। विश्व लोकमंगल के लिए जीवन में उदात्त तत्वों की भूमिका है। श्रीराम भारतीय जीवन आदर्शों के विग्रह हैं। वे आदर्श जीवन, आचार व्यवहार के परिपूर्ण मर्यादा पुरूषोत्तम हैं। श्रीराम की विजय उत्कृष्ट जीवन आदर्शों की भी विजय है। रामकथा इसीलिए सारी दुनिया की प्रेरक है। श्रीराम सूर्य की तरह तपते हैं। दग्ध होते हैं। असह्य दुख सहते हैं। लेकिन उदात्त आदर्श और आदर्श जीवन मूल्यों के पक्षधर बने रहते हैं। वह कोई समझौता नहीं करते। उनका विजय रथ प्रेरक है।

सामान्य संसारी मनुष्यों के लिए भी अपनी आंतरिक वेदना पर विजय प्राप्त करने के सूत्र विजय रथ में हैं। विजय रथ बाद लंकाकाण्ड में ही श्रीराम को देवों द्वारा भेंट किए गए एक अन्य रथ का भी उल्लेख है पर विजय रथ की बात ही दूसरी है। विजय रथ का प्रतीक वैदिककाल से लेकर रामायणकाल और तुलसी की रामचरितमानस तक प्रवाहमान है। अथर्ववेद में काल भी रथ पर चलते हैं। ऋषि के अनुसार इस रथ पर ज्ञानी ही बैठ सकते हैं। काल रथ तेज रफ्तार गतिशील है। लेकिन श्रीराम का विजय रथ भारत के मन संकल्प की प्रतिबद्धता है। वाल्मीकि, तुलसी, कंबन आदि ज्ञानी काल रथ पर सवार होकर ही विजय रथ के शाश्वत सूत्रों का गान करते हैं। वे लोकमंगल के लिए हम सबको प्रेरित करते हैं। तेजोमय विजय पर्व का अभिनंदन। भारतीय जीवन मूल्य और पौरुष पराक्रम ही विजय की गारंटी है।

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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