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कृषि कानूनों का भ्रम

👤 mukesh | Updated on:1 Dec 2020 7:46 AM GMT

कृषि कानूनों का भ्रम

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- प्रमोद भार्गव

तीन नए कृषि कानूनों के विरोध को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को आईना दिखाया है। उन्होंने कहा, 'जिनका इतिहास छल का रहा है, वे किसानों में नए कानून को लेकर भ्रम फैला रहे हैं।' कृषि एवं किसान की हालत सुधारने वाले विधेयकों का विरोध व दुष्प्रचार समझ से परे है। दरअसल जब इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी दलों ने स्वागत किया था। लेकिन अब, जब इन्हें कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा एवं राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया तब विपक्ष ने खूब हंगामा किया। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के भीतर ही घमासान हुआ। भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तीनों विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया था।

आधुनिक खेती और अनाज उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में तभी से अन्नदाता आंदोलन पर उतारू हैं। पंजाब एवं हरियाणा की ग्राम पंचायतें फैसला ले रही हैं कि हर घर से एक व्यक्ति आंदोलन में भागीदारी करे। हरियाणा की 130 खाप पंचायतें भी इस किसान आंदोलन का हिस्सा बन गई हैं। साफ है, सिंधु सीमा पर डेरा डाले किसान लंबी लड़ाई लड़ने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं।

अनुबंध खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आशंकाएं बेबुनियाद हैं। दरअसल इन विधेयकों के माध्यम से सरकार भरोसा दे रही है कि किसान मंडियों, आढ़तियों और बिचैलियों से मुक्त हो जाएगा। औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और तकनीकी समावेशन से पूरे देश में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल देश में केवल हरियाणा-पंजाब में गेहूं की उत्पदकता 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जो अंतरराष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से भी 13 प्रतिशत ज्यादा है। जबकि अन्य राज्यों में यही उत्पादकता आधी है। गोया, मंडियों का वर्चस्व खत्म कर अनुबंध-खेती लाभदायी होगी। किसानों को पूरे देश में फसल बेचने की छूट रहेगी। इससे किसान वहां अपनी फसल बेचेगा, जहां उसे दाम ज्यादा मिलेंगे। हालांकि पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, केरल और हिमाचल प्रदेश में राज्य सरकारों ने पहले से ही अनुबंध खेती की सुविधा दी हुई है। इससे किसानों को बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। इसलिए किसान कह रहे हैं कि किसान हित मंडी व्यवस्था के सुधार और एमएसपी को कानूनन अनिवार्य बनाने में सुरक्षित हो जाएंगे।

भारत सरकार ने बाधा मुक्त खेती-किसानी के लिए 'कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश-2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तीकरण और सुरक्षा) अनुबंध अध्यादेश-2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन अध्यादेश-2020 विधेयकों को कानूनी दर्जा दिया है। अभीतक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गई मंडियों में ही उपज बेचने को बाध्यकारी थे। अब यह बाधा खत्म हो गई है। प्रधानमंत्री ने बनारस की सभा में कहा कि, 'इसी के चलते किसान बनारस के लंगड़ा और दशहरी आम के साथ सब्जी, खाड़ी देशों से लेकर लंदन तक बेचने लगे।' किसानों को अनुबंध खेती की सुविधा दी गई है। किसान अब कृषि-व्यापार से जुड़ी कंपनियों व थोक-व्यापारियों के साथ अपनी उपज की बिक्री का करार खेत में फसल बोने से पहले ही कर सकते हैं। मसलन किसान अपने खेत को एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर देने को स्वतंत्र हैं। ये कानून किसान को फसल के इलेक्ट्रोनिक व्यापार की अनुमति भी देते हैं। साथ ही निजी क्षेत्र के लोग, किसान उत्पादक संगठन या कृषि सहकारी समिति ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिससे इन प्लेटफार्मों पर हुए सौदे में किसानों को उसी दिन या तीन दिन के भीतर धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जाए।

आवश्यक वस्तु अधिनियम को संशोधित करके अनाज, खाद्य, तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस कानून से मुक्त कर दिया है। नतीजतन व्यापारी इन कृषि उत्पादों का जितना चाहें उतना भंडारण कर सकेंगे। इस सिलसिले में किसानों को आशंका है कि व्यापारी उपज सस्ती दरों पर खरीदेंगे और फिर ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। हालांकि अभी भी व्यापारी इनका भंडारण करके नौकरशाही की मिलीभगत से कालाबाजारी करते हैं। इसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया है। लेकिन नौकरशाही इसे औजार बनाकर कदाचरण में लिप्त हो जाती है।

बावजूद किसान संगठन आशंका जता रहे हैं कि कानून के अस्तित्व में आने के बाद उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जाएगी। क्योंकि विधेयक में इस बाबत कुछ भी स्पष्ट नहीं है। जबकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि एमएसपी को नहीं हटाया जाएगा। मोदी के इस कथन को किसान जुबानी आश्वासन मान रहे हैं क्योंकि एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी विधेयक नहीं देता है। अच्छा है, सरकार इस मुद्दे को विधेयक की इबारत में स्पष्ट कर दे। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि व्यापारी एमएसपी दर से नीचे फसल नहीं खरीद सकें। ये शंकाएं दूर हो जाती हैं तो किसान निश्चिंत हो जाएगा।

विपक्ष का कहना है कि कंपनियां धीरे-धीरे मंडियों को अपने प्रभुत्व में ले लेंगी, नतीजतन मंडियों की श्रृंखला खत्म हो जाएगी और किसान कंपनियों की गिरफ्त में आकर आर्थिक शोषण के लिए विवश हो जाएंगे। यह आशंका इसलिए बेबुनियाद है, क्योंकि राज्यों के अधिनियम के अंतर्गत संचालित मंडियां भी राज्य सरकारों के अनुसार चलती रहेंगी। किसान को तो मंडी के अलावा फसल बेचने का एक नया रास्ता खुलेगा। साफ है, किसान अपनी मर्जी का मालिक बने रहने के साथ दलालों के जाल से मुक्त रहेगा। अपनी उपज को वह गांव में ही बेचने को स्वतंत्र रहेगा। अभीतक मंडी में फसल बेचने पर 8.5 फीसदी मंडी शुल्क लगता था, किंतु अब किसान सीधे व्यापारियों को फसल बेचता है तो उसे किसी प्रकार का कर नहीं देना होगा। नए कानून में तीन दिन के भीतर किसान को उपज का भुगतान करने की बाध्यकारी शर्त रखी गई है। साफ है, किसान को व्यापारी के धनराशि के लिए चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

नरेंद्र मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद से ही खेती-किसानी के प्रति चिंतित रही है। इस नजरिए से अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में 'प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण नीति' लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है।

केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में 'ए-2' फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसान की खुशहाली बढ़ेगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी। अब सरकार खेती-किसानी, डेयरी और मछली पालन से जुड़े लोगों के प्रति उदार दिखाई दे रही है, इससे लगता है कि भविष्य में किसानों को अपनी भूमि का किराया भी मिलने लग जाएगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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