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नगालैंड में मजबूत हो रहीं राष्ट्रवाद की जड़ें

👤 mukesh | Updated on:20 Feb 2021 9:37 AM GMT

नगालैंड में मजबूत हो रहीं राष्ट्रवाद की जड़ें

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- अरविंद कुमार राय

देश की आजादी के बाद भारत में अलगाववाद और आतंकवाद की जड़ें सबसे पहले नागालैंड में जमीं। कालांतर में अलगाववाद की आग धीरे-धीरे समूचे पूर्वोत्तर में फैलती चली गई। जनजातीय क्षेत्र होने के कारण पूर्व की केंद्र सरकार स्थानीय असंतोष को दूर करने या यूं कहें कि उनको समझने में पूरी तरह से विफल रही। इस कारण स्थानीय जनजातियों में असंतोष पनपने लगा। इसका फायदा कुछ यूरोपीय देश और क्रिश्चियन मिशनरियां उठाने में जुट गईं। पूर्वोत्तर में अनेक जनजातियां हैं जिनकी भाषा, रहन-सहन, पहनावा एक-दूसरे से मेल नहीं खाती हैं। इसको तत्कालीन केंद्र सरकार में बैठे राजनेताओं या नौकरशाह समझ नहीं सके। वे सबको एक ही तराजू में तोलते हुए एक दिशा में चलने के लिए मजबूर किया जिसका नतीजा असम सात टुकड़ों में बंट गया।

पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों होने के कारण विदेशी शक्तियां अलगाववाद की आग को हवा देती रहीं। आजादी के 70 वर्षों तक इसको बल मिलता रहा। लेकिन, 2014 में भाजपा नेतृत्वधीन गठबंधन सरकार के अस्तित्व में आने के बाद पूर्वोत्तर की मूल समस्याओं पर ध्यान दिया जाने लगा जिसके चलते अलगाववाद और हिंसा के पक्षधर भी राष्ट्र की मुख्यधारा में धीरे-धीरे लौटने लगे। भाजपा नेतृत्वाधीन केंद्र की गत छह वर्षों की सत्ता के दौरान लगभग सभी राज्यों के अलगाववादी संगठनों से देर-सबेर चर्चाएं शुरू हुईं। शांति और विकास का मार्ग प्रशस्त होने लगा। नगालैंड को छोड़ पूर्वोत्तर के अन्य छह राज्यों में उग्रवाद की मूल वजह सत्ता में भागीदारी थी जबकि नगालैंड में अलग देश के गठन की मांग थी।

नगालैंड को छोड़कर पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में छोटी-छोटी जनजातियों को उनके राजनीतिक अधिकार मिलने में कहीं न कहीं बाधाएं आ रही थीं। इसको दूर करने के लिए स्वायत्तशासी परिषदों का गठन कर छोटी जनजातियों के उनके राजनैतिक अधिकारों को देने का सिलसिला शुरू हुआ तो उससे हिंसा के बदले विकास का वातावरण तैयार होने लगा। आज पूर्वोत्तर में बड़ी तेजी से सड़कों का जाल बिछ रहा है। इससे संपर्क व्यवस्था बेहद तेज हुई है। लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर अब आसानी से पहुंच रहे हैं। केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर की बेहतर कनेक्टिविटी के लिए रेल संपर्क, सड़क संपर्क, हवाई संपर्क और जल मार्गों के विस्तार को गति प्रदान की है। आज का युवा अलगाववाद और उग्रवाद के बदले विकास की धारा से जुड़ कर अपने बेहतर भविष्य की कल्पना कर रहा है।

सरकार के इन प्रयासों का परिणाम देश की आजादी के बाद सबसे पहले नये राज्य के रूप में भारत के मानचित्र पर अस्तित्व में आने वाले नगालैंड में हाल के दिनों में देखा गया है। अमूमन अन्य राज्यों की विधानसभा में पहले दिन की कार्यवाही राज्यपाल के अभिभाषण के साथ आरंभ होती है। इस दौरान राज्यपाल के आने और जाने पर राष्ट्रगीत सुनाया जाता है। नगालैंड अलग राज्य के रूप में 01 दिसम्बर, 1963 को अस्तित्व में आया था लेकिन यह अपने आप में अजीब है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी नगालैंड विधानसभा में कभी भी राष्ट्रगीत नहीं गाया गया। 12 फरवरी, 2021 को पहली बार विधानसभा की कार्यवाही आरंभ होने पर सदन में राज्यपाल आरएन रवी की उपस्थिति में राष्ट्रगीत गाया गया।विधानसभा की कार्यवाही के दौरान राष्ट्रगीत गाये जाने संबंधित वीडियो सोशल मीडिया में खूब ट्रेंड कर रहा है।

राज्य के अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आफ नगालैंड (एनएससीएन) का प्रभाव राज्य में काफी बड़े स्तर पर था। समय के साथ संगठन में टूट होती रही और अनेक नए संगठन बनते रहे। माना जाता है कि एनएससीएन के प्रभाव के कारण ही राजनेता विधानसभा में राष्ट्रगीत गाने से परहेज करते थे। यह पहला अवसर था जब 12 फरवरी, 2021 को नगालैंड की विधानसभा में राष्ट्रवाद का इतिहास बनते देश ने देखा। सुरक्षा विश्लेषक नितिन ए गोखले ने नगालैंड विधानसभा में गाए गए राष्ट्रीय गीत का वीडियो अपने ट्विटर अकाउंट से ट्वीट किया है। विधानसभा के सचिव डॉ. पीजे एंटोनी ने भी राष्ट्रीय गीत गाये जाने की पुष्टि की है। हालांकि, उन्होंने यह बता पाने में असमर्थता जताई कि पूर्व में राष्ट्रीय गीत क्यों नहीं गाया जाता था। डॉ. एंटोनी ने विधानसभा में राष्ट्रीय गीत गाए जाने के लिए सभी विधायकों का स्वागत किया है। नगालैंड के कैबिनेट मंत्री तथा नगालैंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष तेमजेन इम्ना एलोंग ने विधानसभा में राष्ट्रीय गीत गाये जाने को ऐतिहासिक करार दिया है।

इसी तरह त्रिपुरा विधानसभा में भी पहली बार 3 वर्ष पूर्व 23 मार्च, 2018 को राष्ट्रीय गीत गाया गया था। त्रिपुरा में मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब के नेतृत्व में गठित भाजपा सरकार के अस्तित्व में आने के बाद ही त्रिपुरा विधानसभा में राष्ट्रीय गीत गाने की परंपरा आरंभ हुई थी। इससे पहले वामपंथी शासन के दौरान यह संभव नहीं हो पाया था। इन घटनाओं से यह साबित होता है कि पूर्वोत्तर में भी अब राष्ट्रवाद की जड़ें देर से ही सही बेहद मजबूत हो रही हैं जो भारत जैसे विशाल देश के लिए बहुत जरूरी है।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार के पूर्वोत्तर प्रभारी हैं)

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