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लक्ष्मी पूजन विधि, मुहूर्त और लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के स्त्रोत

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:18 Oct 2017 3:25 PM GMT

लक्ष्मी पूजन विधि, मुहूर्त और लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के स्त्रोत

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देवी लक्ष्मी पूरे विधि विधान से की गयी पूजा से प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों पर विशेष कृपा करती हैं। लक्ष्मी जी के पूजन के समय सबसे जरूरी है कि पूजा की थाली शास्त्रों के अनुसार सजाई जाए। शास्त्रों में उल्लेख है कि लक्ष्मी पूजन के लिए तीन थालियां होनी चाहिएं। इनमें पहली थाली में 11 दीपक समान दूरी पर रखें कर सजाएं। दूसरी थाली में धानी (खील), बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चंदन का लेप, सिंदूर कुमकुम, सुपारी और थाली के बीच में पान रखें और तीसरी थाली में फूल, दूर्वा, चावल, लौंग, इलाइची, केसर−कपूर, हल्दी चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती और एक दीपक रखें।
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त
दिनाँक- 19 अक्तूबर को 19.26 बजे से 20.25 बजे तक
अवधि- 58 मिनट
प्रदोष काल- 17.54 बजे से 20.25 बजे तक
वृषभ काल- 19.26 बजे से 21.24 बजे तक
पूजन से जुड़ी खास बात
लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल के दौरान करनी चाहिए जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग 2 घण्टे 24 मिनट तक रहता है। लक्ष्मी पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल इसलिए होता है क्योंकि इस समय स्थिर लग्न होती है। माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान लक्ष्मी पूजा की जाये तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती हैं। इसीलिए लक्ष्मी पूजा के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है।
पूजन विधि
मान्यता है कि दीपावली के पूजन का जो समय होता है उसके अतिरिक्त यदि देर रात्रि लक्ष्मी पूजन किया जाए तो मां लक्ष्मी अवश्य प्रसन्न होती हैं। कई लोग लक्ष्मी पूजन के समय सिर्फ उन्हीं की तस्वीर की पूजा करते हैं। मां लक्ष्मी अपने पति भगवान श्री विष्णु के बगैर कहीं नहीं रहतीं इसलिए उनकी तस्वीर अथवा मूर्ति के साथ भगवान श्री विष्णु की तस्वीर या मूर्ति होना भी आवश्यक है। इसके अलावा मां लक्ष्मी के साथ ही भगवान श्री गणेश की भी तस्वीर या मूर्ति स्थापित कर विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। तभी मां लक्ष्मी का वहां स्थायी वास होता है। इसके अलावा पूजन के समय वहां शालिग्राम, शंख, तुलसी और अनंत महायंत्र भी होना चाहिए। मां लक्ष्मी चूंकि समुद्र देवता की पुत्री हैं इसलिए पूजन के समय मंदिर में यदि कुबेर पात्र, मोती और शंख इत्यादि भी हों तो अच्छा रहेगा। मां लक्ष्मी को कमल बेहद पसंद है।
मध्यरात्रि पूजन से होता है विशेष लाभ
यदि संभव हो तो मध्यरात्रि के समय मां लक्ष्मी का पूजन अवश्य करें। इसके लिए श्रीयंत्र, कुबेर यंत्र, कनक धारा श्री यंत्र और लक्ष्मी यंत्र को मंदिर में स्थापित कर पूजन करें। इस दौरान कमल गट्टे की माला लेकर 'ओम श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ओम महालक्ष्म्ये नमः' का जाप करें। इस मंत्र को जपने के दौरान यदि हवन में घी की आहुति भी डालें तो अच्छा रहेगा। ब्रह्मपुराण के अनुसार, कार्तिक अमावस्या की इस अंधेरी रात्रि में महालक्ष्मीजी स्वयं भूलोक में आती हैं और प्रत्येक सद्गृहस्थ के घर कुछ क्षण के लिए रुकती हैं। जो घर पूर्णतया स्वच्छ, शुद्ध, सुंदर तरीके से सुसज्जित और प्रकाशयुक्त होता है, वहां अंश रूप में ठहर जाती हैं।
दीपावली से जुड़ी मान्यताएं
दीपावली पूजन के अलावा इस पर्व के बारे में कुछ मान्यताएं भी प्रचलित हैं जैसे कि हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि त्रेता युग में इस दिन भगवान राम 14 वर्ष के वनवास और रावण का वध करने के बाद अयोध्या लौटे थे। इसी खुशी में अयोध्यावासियों ने समूची नगरी को दीपों के प्रकाश से जगमग कर जश्न मनाया था और इस तरह तभी से दीपावली का पर्व मनाया जाने लगा। इसके अलावा बौद्धों के प्राकृत जातक में दिवाली जैसे त्योहार का जिक्र है जिसका आयोजन कार्तिक महीने में किया जाता है। जैन लोग इसे महावीर स्वामी के निर्वाण से जोड़ते हैं। कहा जाता है कि करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात में पावा नगरी में भगवान महावीर का निर्वाण हुआ। महावीर के निर्वाण की खबर सुनते ही सुर असुर मनुष्य नाग गंधर्व आदि बड़ी संख्या में एकत्र हुए। रात अंधेरी थी इसलिए देवों ने दीपकों से प्रकाश कर उत्सव मनाया और उसी दिन कार्तिक अमावस्या को प्रातरू काल उनके शिष्य इंद्रमूर्ति गौतम को ज्ञान लक्ष्मी की प्राप्ति हुई। तभी से इस दिन दीपावली मनाई जाने लगी। दीपावली के बारे में एक मान्यता यह भी है कि जब राजा बलि ने देवताओं के साथ लक्ष्मी जी को भी बंधक बना लिया तब भगवान विष्णु ने वामन रूप में इसी दिन उन्हें मुक्त कराया था। पुराणों में कहा गया है कि दीपावली लक्ष्मी के उचित उपार्जन और उचित उपयोग का संदेश लेकर आती है।
लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए कुछ सूक्त इस प्रकार हैं−
−पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्माप्रिये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णुमनोनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सं नि ध्त्स्व।।
पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षी पद्मसम्भवे।
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाभ्यहम्।।
अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वाकामांश्च देहि मे।।
पुत्रपौत्रधनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम्।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे।।
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमश्विना।।
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्मं ददातु सोमिनः।।
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तया श्रीसूक्तजापिनाम्।।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवतलरांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम।।
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्।
लक्ष्मीं प्रियसखीं भूमिं नमाम्यच्युतवल्लभाम्।।
महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्र चोदयात।।
आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः।
ऋषयः श्रियः पुत्राश्च श्रीर्देवीर्देवता मताः।।
ऋणरोगादिदारिद्रयपापक्षुदपमृत्यवः।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा।।
चन्द्रप्रभां लक्ष्मीमेशानीं सूर्या भांलक्ष्मीमैश्वरीम्।
चन्द्र सूर्याग्निसंकाशां श्रियं देवीमुपास्महे।।
श्रीवर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः।।
- शुभा दुबे

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