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वैदिक सभ्यता व जीवनशैली में आयुर्विज्ञान के सूत्र

👤 manish kumar | Updated on:23 March 2020 9:03 AM GMT

वैदिक सभ्यता व जीवनशैली में आयुर्विज्ञान के सूत्र

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– हृदयनारायण दीक्षित

प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी को लेकर राष्ट्र को सावधान किया। अपने भावुक सम्बोधन में प्रत्येक नागरिक से सजगता की अपील की। उन्होंने इस महामारी से निश्चिंत होकर घूमने को उचित नहीं बताया है। उन्होंने जनता कर्फ्यू को जनता द्वारा स्वयं अपने ऊपर लगाया गया नियंत्रण और बचाव को सामाजिक दायित्व निर्वहन का कर्तव्य बताया। प्रधानमंत्री ने आवश्यक सेवाओं में जान हथेली पर रखकर जुटे लोगों के लिए आज रविवार को घर में ही रहकर आभार जताने का भी अनुरोध किया।

कोरोना वायरस से विश्व मानवता भयग्रस्त है। राष्ट्र राज्य डरे हुए हैं। वैज्ञानिक परिश्रमरत हैं लेकिन इस महामारी के कारण व निवारण का कोई सूत्र हाथ नहीं लगा है। भारत सरकार व विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रयास प्रशंसनीय हैं लेकिन उसका जोर भी बचाव पर है। कोरोना भारतीय जलवायु में पैदा वायरस नहीं है। यह विदेश से भारत आने वाले लोगों के साथ यहां आया है। अन्य देशों की तुलना में लगभग एक अरब तीस करोड़ आबादी वाले इस देश में कोरोना के बीमारों की संख्या कम है। इसकी दवा है नहीं। रोगों से लड़ने वाली सुदृढ़ शारीरिक शक्ति इसका प्रभाव झेल जाती है। प्रथम द्रष्टया भारत के लोगों और भारतीय वातावरण में यह रोग निरोधक शक्ति संतोषजनक है। तो भी सतर्कता सजगता अति अनिवार्य है। डर एक अलग बीमारी है। इलेक्ट्रानिक समाचार माध्यमों व सोशल मीडिया के कारण सतर्कता के साथ डर भी बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री ने सजगता पर जोर दिया है।

आयुर्वेद आयु का विज्ञान है और चिकित्सा विज्ञान रोगी को स्वस्थ करने का विज्ञान। आयु विज्ञान का सम्बंध दीर्घायु रहने की जानकारी से है। ऐसा ज्ञान आजीवन आचरण योग्य है। ऋग्वेद के रचनाकाल से लेकर अथर्ववेद के रचनाकाल तक आयुर्विज्ञान का तमाम विकास हुआ है। अथर्ववेद के समाज को तमाम औषधियों की जानकारी थी। वे रोग पैदा करने वाले प्रत्यक्ष कीटों व रोग प्रसारक वातावरण से सुपरिचित थे। वे न दिखाई पड़ने वाले जीवाणुओं से भी परिचित थे। अथर्ववेद के एक सूक्त (8.6) में "सूर्य प्रकाश से डरकर भाग जाने वाले या सूर्य प्रकाश में मर जाने वाले तिरछी चाल वाले रस-विष युक्त कीटाणुओं का वर्णन है। ऋषि कहते हैं कि ऐसे रोगाणुओं को हम नष्ट करते हैं।" (वही 12) पुख्ता तौर पर नहीं कह सकते कि वैदिक पूर्वजों को 'वायरस' की जानकारी भी थी या नहीं थी। आधुनिक शोधों के अनुसार सभी वायरस जानलेवा नहीं होते। अनेक वायरस प्राण लेते हैं। वे प्राणशक्ति को तहस-नहस करते हैं लेकिन कुछ वायरस उपयोगी भी होते हैं।

अथर्ववेद (8.7.4) में इस तथ्य के संकेत हैं। कहते हैं "दुर्नाम और सुनाम जीवाणु साथ साथ रहने के इच्छुक हैं। इनमें हम निकृष्ट दुर्नाम को विनष्ट करते हैं, सुनाम बना रहना चाहिए।" बताते हैं कि "दुर्नाम रोग को दूर करने के लिए हम 'पिंगवज' औषधि का प्रयोग करते हैं।" (वही 3) आगे इसी सूक्त (6.8.6) में जीवाणुओं को रोग बीज बताते हैं। ये अपनी गंध द्वारा क्षति पहुंचाते हैं, परस्पर स्पर्श के द्वारा हनन करते हैं। लार द्वारा भी प्रवेश करते हैं। ऐसे नित्य हिंसक रोग बीजों को हम पिंगवज औषधि द्वारा नष्ट करते हैं।" (वही) पिंगवज नाम की वायरस हंता इस औषधि का नाम व परिचय आयुर्वेद के परवर्ती ग्रंथों में नहीं मिलता। सायण ने इसे श्वेत सरसों कहा है। अथर्ववेद के अनुसार इस औषधि के उपयोग अन्य रोगाणुओं पर भी होते थे।

प्रत्येक जीव में रोगों से लड़ने की व्यक्तिगत क्षमता होती है। उत्तम रोग निरोधक क्षमता से युक्त व्यक्ति से तमाम दृश्य अदृश्य जीव-जीवाणु टकराते हैं, लौट आते हैं। रोग निरोधक क्षमता का सम्बंध मन से भी है। मानसिक अवसाद या उद्विग्नता से भी रोग निरोधक क्षमता का हृास होता है। चित्त की प्रसन्नता प्रशांत रहना जरूरी है। एक मंत्र (8.7.17) में कहते हैं, "अंगिरा द्वारा विवेचित औषधियां पर्वतीय क्षेत्रों सहित समतल मैदानों में उगती हैं। वे दूध की तरह सारयुक्त होती हैं। यह औषधियां हृदय को सुख शान्ति देती हैं – शिवा औषधिः सन्तु शं हृदे।" हृदय को शांति देने वाली औषधियां अवसाद या डर नहीं पैदा करती। कोरोना जैसी महामारी में 'भय' का प्रभाव वायरस के प्रभाव का दोगुना ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। प्राचीन भारत का आयुर्विज्ञान प्रकृति के निकट था। पूर्वजों ने रोग दूर करने वाला सुविचारित औषधि विज्ञान विकसित किया था। एक मंत्र (8.7.26) में कहते हैं "औषधि विशेषज्ञ तमाम औषधियों के ज्ञाता हैं। वह यहां उपलब्ध हैं।"

ज्वर सामान्य बीमारी है लेकिन किसी गंभीर रोग की लाक्षणिक सूचना भी है। कोरोना का भी एक लक्षण तीव्र ज्वर है। प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञानियों ने ज्वर को प्रकृति प्रायोजित शारीरिक ताप कहा है। इस मत के अनुसार शरीर में पले बढ़े या बाहर से आए विजातीय द्रव्य, तत्व या जीवाणु उत्पात करते हैं। प्रकृति स्वयं संज्ञान लेती है और विजातीय द्रव्यों को जलाती है। ज्वर इसी ताप का परिणाम है। इस ताप से शरीर के सभी अंग भी प्रभावित होते हैं। रोग निरोधक शक्ति के कारण शरीर बुखार की पीड़ा झेल जाता है। अथर्ववेद के मनीषी ज्वर से परिचित थे। ऋषि कहते हैं, "कुछ ज्वर एकदिन छोड़कर आते हैं, कुछ दो दिन बाद और कुछ बिना निश्चित समय के आते हैं। कवि की इच्छा है कि ऐसे ज्वर आलसी लोगों के पास जाएं।" (वही 2) ज्वर और भी हैं, कहते है "तपाने वाले, हिलाने वाले, भड़काने वाले, शीत ठंढ के साथ आने वाले और शरीर को दुर्बल करने वाले ज्वर को हमारा नमस्कार है – नमो रूराय, च्यवनाय, नोदनाय धृष्णवे/ नमः शीताय, पूर्वकाम कृत्वने।" यहां ज्वर को भगाने का एक उपाय नमस्कार भी है। भाव रूप में यह नमस्कार ज्वर के लिए है लेकिन यथार्थ रूप में यह नमस्कार ज्वर पीड़ित के लिए है।

ऋग्वेद, यजुर्वेद नमस्कारों से भरापूरा है। सोम वैदिक ऋषियों का प्रिय पेय है। ऋग्वेद के अनुसार वे इसे दूध में मिलाकर पीते थे। दही मिलाने से इसका स्वाद बढ़ जाता था। एक मंत्र (ऋग्वेद 9.11.5-6) में कहते हैं, "पहले मधुर सोमरस में दूध मिलाओ फिर नमस्कारपूर्वक दही मिलाओ।" यहां नमस्कार प्रत्यक्ष के प्रति आदरभाव है और अप्रत्यक्ष अव्यक्त के प्रति आस्तिकता भी है। मित्र वरूण वैदिक देवता हैं। उन्हें भी नमस्कार किया गया है- नमो मित्रस्य, वरूणस्य। (ऋ0 10.37.1) प्राण से जीवन है। प्राण से प्राणी है। अथर्ववेद (11.6.1) में कहते हैं "प्राणस्य नमो यस्य सर्वमिदं वशे – प्राण के अधीन यह संपूर्ण विश्व है। प्राण को नमस्कार है।" आगे एक सुंदर मंत्र (वही 2) में कहते हैं, "नमस्ते प्राण क्रन्दाय, नमस्ते स्तनपित्नवे/नमस्ते प्राण विद्युते, नमस्ते प्राण वर्षते – ध्वनि करने वाले और मेघगर्जन करने वाले प्राण को नमस्कार है। विद्युत रूप प्रकाशदाता और जल रूप वर्षा कारक प्राण को नमस्कार है।"

नमस्कार करने में दोनों हाथ जुड़ते हैं। यह हाथ मिलाने वाले शिष्टाचार से भिन्न है। किसी से हाथ मिलाने में दोनों की ऊर्जा में हलचल होती है। हाथ में उपस्थित विजातीय द्रव्यों का भी आदान-प्रदान होता है। रोग हैं तो रोग के बीजाणुओं का संक्रमण भी होता है। नमस्कार में हमारी ऊर्जा का हमारे ही भावजगत् में वर्तुल बनता है। रोगाणुओं का संक्रमण भी नहीं होता। नमस्कार आनंदवर्द्धन है। ऋग्वेद में नमस्कार भी एक देवता है। संक्रामक रोगों में रोगी का स्पर्श क्षतिकारी है। यह तथ्य विज्ञानसम्मत है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नमस्कार की महत्ता कोरोना वायरस के प्रसार से सिद्ध हो चुकी है। नमस्कार में सामने वाले के प्रति आस्तिक भाव व आदर का प्रकटीकरण है। हृदय से हृदय का संवाद है। देह की दूरी है। अपने ही दोनो हाथों का मिलन है। किसी संक्रमण की गुंजाइश नहीं। वैदिक सभ्यता व जीवनशैली में ही आयुर्विज्ञान के सूत्र पिरो दिए गए थे। आपदाएं मार्गदर्शक भी होती हैं। कोरोना महामारी अंतर्राष्ट्रीय आपदा है। सतर्कता अपरिहार्य है। प्रधानमंत्री ने सही कहा है। हम उनकी अपील को यथावत् स्वीकार करें।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

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