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श्री गणेश जन्मोत्सव

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:17 Sep 2018 3:37 PM GMT

श्री गणेश जन्मोत्सव

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ज्योतिषाचार्य मदन गुप्ता सपाटू

मांगलिक कार्य में सबसे पहले श्री गणेश की वंदना को भारतीय संस्कृति में अनिवार्य माना गया है। व्यापारी वर्ग बही खातों, यहां तक कि आधुनिक बैंकों में भी लैजर्स आदि में सर्वपथम श्री गणेशाय नमः अंकित किया जाता है। नववर्ष तथा दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी एवं गणेशजी की ही आराधना से कई कार्यकम आरंभ किये जाते हैं। विवाह में लग्न पत्रिका में भी `श्री गणेशाय नमः' लिखा जाता है। कोई भी पूजा-अर्चना, देव पूजन, यज्ञ, हवन, गृह पवेश, विद्यारंभ, अनुष्ठान हो, सर्वपथम गणेश वंदना ही की जाती है, ताकि हर कार्य निर्विघ्न समाप्त हो।

भादपद शुक्ल चतुर्थी गणेश जी के पादुर्भाव की तिथि संकट चतुर्थी कहलाती है, परंतु महीने की हर चौथ पर भक्प, गणपति की आराधना करते हैं। गणेशजी हिन्दुओं के पथम आराध्य देव हैं, जिन्हें देवताओं में विशेष स्थान पाप्त है। विवाह हो या कोई भी महत्वपूर्ण कार्य, उसे निर्विघ्न पूर्ण करने के लिए सर्वपथम गजानन की ही पूजा की जाती है। भादपद शुक्ल चतुर्थी को श्री गणेश जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। गणपति जी का जन्म काल दोपहर में माना गया है। गणेशोत्सव भादपद की चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक 10 दिन चलता है।

गणेशजी बुद्धि के देवता हैं। विघ्न विनाशक हैं। चूहा इनका वाहन है। रिद्धि-सिद्धि दो पत्नियां हैं। कलाकारों के लिए गणेशजी की आकृति बनाना सबसे सुगम है। एक रेखा से भी इनका चित्रण हो जाता है। वे हर आकृति और हर परिस्थिति में ढल जाते हैं।

गणेशजी के छोटे नेत्र, एकाग्र होकर लक्ष्य पाप्ति का संदेश देते हैं। बड़े कान सबकी बात सुनने की सहनशक्पि देते हैं। विशाल मस्तक परंतु छोटा मुंह इंगित करता है कि चिंतन अधिक-बातें कम की जाएं। लंबी सूंड कहती है कि हर हालत में सजग रहकर कष्टों का सामना करें। एकदन्त का अर्थ है कि हम एकाग्रचित्त होकर चिन्तन, मनन, अध्ययन व शिक्षा पर ध्यान दें। बड़ा उदर सबकी बुराई बड़े कान से सुनकर बड़े पेट में ही रखने की शिक्षा देता है। छोटे पैर उतावला न होने की पेरणा देते हैं। चंचल वाहन, मूषक मन की इंदियें को नियंत्रण में रखने की पेरणा पदान करता है।

गणेश जन्मोत्सव पर सिद्धि विनायक व्रत रखा जाता है। इसे कलंक चौथ या पत्थर चौथ भी कहा जाता है।

कैसे करें पूजा?

शुभ घड़ी अर्थात शुभ मुहूर्त में ही गणपति को गृह पवेश कराएं तो कल्याण होता है। पूजन से पूर्व शुद्ध होकर आसन पर बैठें। एक ओर पुष्प, धूप, कर्पूर, रौली, मौली, लाल चंदन, दूर्वा, मोदक आदि रख लें। एक पटे पर साफ पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर

गणेश जी की पतिमा जो मिट्टी से लेकर सोने तक किसी भी धातु में बनी हो, स्थापित करें। गणेश जी का पिय भोग मोदक व लड्डू है। मूर्ति पर सिंदूर लगाएं, दूर्वा चढक्वाएं व षोडशोपचार करें। धूप, दीप, नैवेद्य, पान का पत्ता, लाल वस्त्र तथा पुष्पादि अर्पित करें। इसके बाद मीठे मालपुओं या 11 से 21 लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए। इस पूजा में संपूर्ण शिव परिवार-शिव, गौरी, नंदी तथा कार्तिकेय सहित सभी की पूजा षोडशोपचार विधि से करनी चाहिए। पूजा के उपरांत सभी देवी-देवताओं को विधि-विधानानुसार विसर्जन करना चाहिए परंतु लक्ष्मी जी व गणेश जी को नहीं करना चाहिए। गणेश पतिमा का विसर्जन करने के बाद उन्हें अपने यहां लक्ष्मी जी के साथ ही रहने का आमंत्रण करें। यदि कोई कर्मकांडी यह पूजा संपन्न करवा रहा है तो उसका आशीष पाप्त करें और यथायोग्य पारिश्रमिक दें। सामान्यतः तुलसी के पत्ते छोड़कर सभी पत्र-पुष्प गणेश पतिमा पर चढक्वाए जा सकते हैं।

गणपति जी की आरती से पूर्व स्रोत या गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें।

नीची नजर करके चंदमा को अर्ध्य दें, इस मंत्र का जप कर सकते हैं-

वकतुंड महाकाय सूर्यकोटि समपभः! निर्विध> कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा!!

इसके अलावा ओम् गं गणपत्ये नमः मंत्र गणेश जी को पसन्न करने के लिए ही काफी है।

कलंक चतुर्थी या पत्थर चौथ क्या है?

कैसे करें बचाव?

विशेष ध्यान रखें कि इस दिन चांद न देखें। इसे कलंक चतुर्थी और पत्थर चौथ भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन चंददर्शन देखने से मिथ्यारोप लगने या किसी कलंक का सामना करना पड़ता है। दृष्टि धरती की ओर करके और चंदमा की कल्पना मात्र करके अर्घ्य देना चाहिए। मान्यता है कि एक बार गणेश जी चंद देवता के पास से गुजरे तो उसने गणपति का उपहास उड़ाया। गणेश जी ने शाप दिया कि आज के दिन जो तुझे देख भी लेगा, वह कलंकित हो जाएगा। शास्त्राsं के अनुसार भगवान कृष्ण ने भी भूलवश इसी दिन चांद देख लिया था और फलस्वरूप उन पर हत्या व स्मयंतक मणि चुराने का आरोप लगा था। यदि अज्ञानतावश या जाने-अनजाने यह दिख जाए तो निम्न मंत्र का पाठ करें-

! सिंह पसेनम् अवधात, सिंहो जाम्बवता हतः! सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्रास स्वमन्तक!!

इसके अलावा आप हाथ में फल या दही लेकर भी दर्शन कर सकते हैं। यदि आप पर कोई मिथ्यारोप लगा है तो भी इसका जप करते रहें। दोष मुक्प हो जाएंगे।

गणेश जी की सभी मूर्तियां सीधी या उत्तर की ओर सूंड वाली होती हैं। यह मान्यता है कि गणेश जी की मूर्ति जब भी दक्षिण की ओर मुड़ी बनाई जाती है तो वह टूट जाती है। कहा जाता है कि यदि संयोगवश यदि आपको दक्षिणावर्ती मूर्ति मिल जाए और उसकी विधिवत उपासना की जाए तो अभीष्ट फल मिलते हैं। गणपति जी की बायीं सूंड में चंदमा का पभाव और दायीं में सूर्य का माना गया है।

पायः गणेश जी की सीधी सूंड तीन दिशाओं से दिखती है। जब सूंड दायीं ओर घूमी होती है तो इसे पिंगला स्वर और सूर्य से पभावित माना गया है। ऐसी पतिमा का पूजन, विघ्न विनाश, शत्रु पराजय, विजय पाप्ति, उग्र तथा शक्पि पदर्शन आदि जैसे कार्यों के लिए फलदायी माना जाता है, जबकि बायीं ओर मुड़ी सूंड वाली मूर्ति को इड़ा नाड़ी व चंद पभावित माना गया है।

ऐसी मूर्ति की पूजा स्थाई कार्यों के लिए की जाती है, जैसे शिक्षा, धन पाप्ति, व्यवसाय, उन्नति, संतान सुख, विवाह, सृजन कार्य और पारिवारिक खुशहाली। सीधी सूंड वाली मूर्ति का सुश्रुषा स्वर माना जाता है और इनकी आराधना रिद्धि-सिद्धि, कुण्डलिनी जागरण, मोक्ष, समाधि आदि के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। संत समाज ऐसी मूर्ति की ही आराधना करता है।

मुंबई सिद्धि विनायक मंदिर में दायीं ओर सूंड वाली मूर्ति है, इसीलिए इस मंदिर की आस्था और आय, आज शिखर पर है।

गणेश जी का चित्र या मूर्ति कैसे रखी जाए?

घर के मंदिर में तीन गणेश पतिमाएं नहीं रखनी चाहिए। मूर्ति का मुंह सदा आपके घर के अंदर की ओर होना चाहिए, पीठ कभी नहीं। उनकी दृष्टि में सुख समृद्धि, ऐश्वर्य व वैभव है जो आपके यहां पवेश करते हैं। पीठ में दरिदता होती है जो रोग, शोक, नकारात्मक ऊर्जा लाती है। अतः कुछ लोग गलती से घर के द्वार या माथे पर गणेश जी की मूर्ति या संगमरमर की टाइल्स लगवा देते हैं और सारी उम्र फिर दरिद रह जाते हैं। इस दोष को दूर करने के लिए उसके समानान्तर उसके पीछे एक और चित्र या मूर्ति ऐसे लगाएं कि गणेश जी की दृष्टि निरंतर आपके घर पर रहे।

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