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बड़े पर्दे में इस साल छाये रहे महिला किरदार

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:2018-12-24T21:49:24+05:30

बड़े पर्दे में इस साल छाये रहे महिला किरदार

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कैलाश सिंह

इस साल रिलीज हुई फिल्मों पर सरसरी निगाह डालने से भी अंदाजा हो जाता है कि यह महिला किरदारों का वर्ष रहा है। न सिर्फ महिलाओं को फिल्मों में फ्रमुख रोल मिले बल्कि जिन फिल्मों का भविष्य महिलाओं के ही कंधे पर था, उन्हें अच्छी सफलता मिली यानी उन्होंने अधिक पैसा कमाया। जबकि दूसरी ओर दो महानतम अभिनेताओं- अमिताभ बच्चन व आमिर खान- की बहु-फ्रतीक्षित फिल्म `"ग्स ऑफ हिंदुस्तान'- वर्ष की सबसे बड़ी निराशा साबित हुई, जिसके लिए आमिर खान ने अपने फ्रशंसकों से सार्वजनिक माफी भी मांगी। अतः यह कहना गलत न होगा कि 2018 के बॉक्स ऑफिस को महिलाओं ने रॉक किया। इस कामयाबी पर महिलाओं को `बधाई हो', जो संयोग से इस वर्ष की महिला-केन्द्रित सफल फिल्मों में शामिल है।

2014 से 2017 के ग्लोबल बॉक्स ऑफिस अध्ययन से मालूम होता है कि फ्रत्येक बजट श्रेणी में महिला-केन्द्रित फिल्मों ने पुरुष-केन्द्रित फिल्मों की तुलना में औसतन अधिक आय हासिल की। इससे जाहिर होता है कि दर्शकों का दृष्टिकोण व टेस्ट बदल रहा है और अब महिला-केन्द्रित फिल्में बनाना व्यापारिक समझदारी हो गया है। भारतीय फिल्म निर्माताओं ने भी इस बदलते ट्रेंड को भांप लिया था इसलिए विद्या बालन को लेकर `कहानी', `द डर्टी पिक्चर', `हमारी सुलू' आदि महिला-केन्द्रित फिल्में बनीं व सफल हुईं। लेकिन 2018 में तो यह `वीमेन पॉवर ट्रेंड' भारतीय बॉक्स ऑफिस पर अपने चरम पर दिखाई दिया।

इस ट्रेंड की शुरुआत जनवरी में दीपिका पादुकोण की फिल्म `पद्मावत' से शुरू हुआ और फिर इसने रुकने का नाम ही नहीं लिया। `राजी' में आलिया भट्ट ने एक ऐसी युवा कश्मीरी महिला की भूमिका की जिसे विवाह के जरिये पाकिस्तान में भारतीय जासूस बनाकर भेजा जाता है। `स्त्राr' में श्रद्धा कपूर ने एक ऐसी जांबाज महिला की भूमिका निभाई जो मध्य फ्रदेश के छोटे शहर में घूमती है, रात के अंधेरे में पुरुषों का अपहरण करती है, लेकिन उनकी `अनुमति' लेने के बाद ही। पुरुष अकेले घर से बाहर निकलना बंद कर देते हैं और उन्हें अजनबियों से भी बात करने में घबराहट होने लगती है। `वीरे दी वेडिंग' में सोनम कपूर व उनकी सहेलियां आज के युग में महिलाओं की यौन इच्छा व स्वतंत्रता पर बल देती हैं यानी उन्होंने सिंडी लुपर के एंथम को महिला-दोस्ती का रूप देने का फ्रयास किया है कि स्कूल से निकलने व अपने अपने जीवन से जूझते हुए भी महिलाओं के बीच दोस्ती हमेशा के लिए संभव है। `अंधाधुंध' में तब्बू लेडी मैकबेथ की भूमिका में गजब की थीं और `बधाई हो' में नीना गुप्ता अपने जवान बच्चों के होते हुए भी गर्भवती हो जाती हैं, जिससे हास्य व्यंग के साथ यह संदेश देने का फ्रयास किया गया कि बच्चों के जवान होने का अर्थ यह नहीं है कि महिला की यौन इच्छा पर विराम लग जाये। दक्षिण में बायोग्राफिकल `महान्ति' ने गुजरे समय की लीजेंड सावित्री को आज की आधुनिक स्थितियों में फ्रदर्शित किया। यह इस वर्ष की महिला-केन्द्रित फिल्मों की एक छोटी सी सूची है, लेकिन इनकी रेंज से यह अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है कि अभिनेत्रियों के लिए भूमिकाएं फ्रभावशाली व सशक्त होती जा रही हैं।

ये फिल्में वास्तविक जीवन में लिंग भूमिकाओं को किस फ्रकार फ्रभावित करती हैं, शायद इस बारे में वह व्यंग्यकार सही था जिसने कहा था कि फेमिनिज्म ने `वंडर वुमन' को बनाया और फिर वंडर वुमन ने पुनः फेमिनिज्म को बना दिया। बहरहाल, इस साल भी बायोपिक्स बनने का सिलसिला जारी रहा और इस ाढम में दो फिल्में विशेषरूप से चर्चा का विषय रहीं- एक, राजकुमार हिरानी की `संजू', जो फिल्म अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर थी और दूसरी नंदिता दास की `मंटो' जो विख्यात कहानीकार सादत हसन मंटो के जीवन पर आधारित थी। लेकिन इन फिल्मों को पूर्णतः बायोपिक्स कहना गलत होगा क्योंकि इनमें इन व्यक्तियों के सम्पूर्ण जीवन का सार नहीं है बल्कि इनके एक विशेष पहलू को लेकर निर्देशकों ने आज के संदर्भों में अपनी बात कहने की कोशिश की है। ड्रग्स का सेवन आज एक बड़ी समस्या है, `संजू' में इसी मुद्दे पर बल दिया गया है। इसी फ्रकार `मंटो' के जरिये आज के सांफ्रदायिक माहौल में सौहार्द की बात कहने का फ्रयास है।

अनुभव सिन्हा की `मुल्क' भी साफ्रदायिक सौहार्द की बात करती है, बनारस के एक ऐसे मुस्लिम परिवार के जरिये जिस पर आतंकी होने के आरोप लगाये गये हैं। इस फिल्म पर पाकिस्तान में फ्रतिबंध लगा दिया गया। इस बारे में अनुभव सिन्हा का कहना है, "सरकारों को मेलमिलाप या हारमनी पसंद नहीं आती है। यह फिल्म मेलमिलाप के बारे में है। इसमें नग्नता नहीं है, मुस्लिमों को गालियां नहीं दी गयी हैं और न ही पाकिस्तान को गालियां दी गयी हैं। इसलिए मुझे नहीं मालूम कि इस पर क्यों फ्रतिबंध लगाया गया है।' लेकिन शायद सरकारें हर जगह एक सा ही सोचती हैं। मसलन, जब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने `केदारनाथ' पर फ्रतिबंध लगाने से इंकार कर दिया, जिसमें उत्तराखंड की बाढ़ की पृष्"भूमि में हिन्दू मुस्लिम की फ्रेम कथा है (जिसे संघ परिवार `लव जिहाद' कहता है) तो राज्य सरकार के आदेश पर उत्तराखंड के हर जिलाधिकारी ने कानून व्यवस्था की आड़ लेते हुए फिल्म के फ्रदर्शन पर रोक लगा दी।

लेकिन ऐसी फूहड़ व अश्लील फिल्मों पर रोक नहीं लगाई जाती है जिनके शीर्षक से लेकर किरदारों के नाम तक में द्विअर्थी बकवास होती है, जैसे इस साल रिलीज हुई एक फिल्म `पीके लेले अ सेल्समैन' में एक किरदार का नाम रखा गया है `मेरी मारलो'। चार राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित रीमा दास की फिल्म `विलेज रॉकस्टार्स' को 91वें अकादमी अवार्ड्स (ऑस्कर) की सर्वश्रेष्" विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी के लिए भारत की अधिकारिक एंट्री के रूप में चुना गया। `विलेज रॉकस्टार्स' आउट-ऑफ-द-बॉक्स फिल्म है, सुंदर कहानी, जबरदस्त पटकथा और दर्शनीय विजुअल्स के साथ। इसके केंद्र में मां-बेटी की कहानी है।

इस साल भारतीय फिल्मों में दो अन्य ट्रेंड भी फ्रमुखता से देखने को मिले। एक, क्योंकि अब कंटेंट महत्वपूर्ण हो गया है, इसलिए उपन्यासों के राइट्स लिए गये उन पर फिल्में बनाने के लिए। `राजी' हरिंदर सिक्का के पहले ही उपन्यास `कालिंग सहमत' पर बनी फिल्म है। अनुजा चौहान की 2008 की बेस्टसेलर `द जोया फैक्टर' पर फिल्म बनाने के अधिकार रोनी पूवाला ने लिए हैं। पौला हॉकिन की 2015 की नावेल `द गर्ल ऑन द ट्रेन' पर हॉलीवुड में पहले ही फिल्म बन चुकी है। अब ऋभु दासगुप्ता इसका अधिकारिक देसी संस्करण जैकलिन फर्नानडिज को लीड में लेकर बनायेंगे। जंगली पिक्चर्स ने एड्रियन लेवी व कैथी स्कॉट-क्लार्क की 2017 की पुस्तक `द एक्साइल' के अधिकार खरीदे हैं जिसका वह विशाल भारद्वाज के साथ मिलकर निर्माण करेंगे जो फिल्म का निर्देशन भी करेंगे। लेखकों ने इस पुस्तक को `जीरो डार्क थर्टी' के फ्रीकुएल के रूप में परिभाषित किया है और इसी एक लाइन से विशाल फ्रभावित हुए। दूसरा नेटफ्लिक्स के लिए फिल्में बनी जिनमें सेक्स का पुट अधिक दिखा।

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