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भारत में अब विदेशी नहीं रहा किसमस

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:2018-12-24T21:59:40+05:30

भारत में अब विदेशी नहीं रहा   किसमस

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समीर चौधरी

पभु यीशु के जन्मदिन के मौके पर मनाया जाने वाला ािढसमस का त्यौहार, अब कुछ दशक पहले की तरह हमारे लिए कोई विदेशी त्यौहार नहीं रहा बल्कि दूसरे भारतीय त्यौहारों की ही तरह अब यह धुर भारतीय त्यौहार हो गया है। यही कारण है की गोवा से लेकर गुडग़ांव तक और पंचमढ़ी से लेकर पंचगनी तक आज यह त्यौहार न केवल खूब धूमधाम से मनाया जाता है बल्कि धुर भारतीय तरीके से भी मनाया जाता है। वैसे तो भारत के जिन शहरों में ईसाईयों की आबादी अच्छीखासी है- मसलन गोवा का पणजी, उत्तर-पूर्व का आइजोल, केरल के तमाम शहर, झारखंड का रांची और नागालैंड की राजधानी कोहिमा व उत्तर-पूर्व का ही शिलांग आदि। इन तमाम शहरों में तो दिसंबर माह की शुरुआत होते ही ािढसमस की रौनक दिखने ही लगती है, देश के दूसरे तमाम शहरों में भी विशेषकर महानगरों में, ािढसमस की धूम दिसंबर के पहले से ही शुरू हो जाती है खासकर मुंबई और बंग्लुरु में। इस साल भी दिसंबर शुरू होते ही देश के तमाम छोटे-बड़े शहर सजने-संवरने लगे हैं। चर्चो में विशेष फ्रार्थनाएं शुरू हो चुकी हैं और बाजारों में ािढसमस गिफ्ट, कार्ड, फ्रभु ईशु की चित्रकृतियां, सांता क्लॉज की टोपी, सजावटी सामग्री और केक की पी इन दिनों खूब जोरों पर है।

यूं तो देश में सबसे ज्यादा ईसाई केरल में रहते हैं लेकिन अगर कहा जाये कि मिजोरम की राजधानी आइजोल ािढसमस की धूम का सबसे बड़ा गढ़ है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा। आप भी अगर भीड़ और शोर-शराबे से दूर ािढसमस की पवित्र खुशी में डूब जाना चाहते हैं, तो आइजोल इसके लिए बेस्ट जगह है। यहां न्यू ईयर और ािढसमस का एन्जॉय आपस में घुलमिल गए हैं। यही कारण है की दिसंबर माह के आखिरी सप्ताह में यहां जश्न का जो सिलसिला शुरू होता है, वह अगले साल 2 जनवरी तक जाता है। आइजोल में इस मौके पर खूब सजावट होती है। यहां ािढसमस और न्यू ईयर का स्वागत जगमगाती रौशनी में होता है।गौरतलब है कि 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म हुआ था, जिन्होंने ईसाई धर्म की स्थापना की इसलिए इस दिन को पूरी दुनिया में ािढसमस डे के नाम से जाना जाता है। वैसे भारतीय ईसाई ािढसमस का त्यौहार बेहद सादगीपूर्ण तरीके से मनाते हैं। लेकिन गोवा के पणजी में इस त्योहार की धूम विदेशों के जैसे होती है। पणजी के समुद्र तटों पर दिसंबर के शुरू होते ही देशी-विदेशी सैलानी आने लगते हैं और 20 दिसंबर के आसपास तक तो यहां के तट सैलानियों से भर जाते हैं। चूंकि दिसंबर माह में यहां मौसम बहुत ही खुशनुमा रहता है, इसलिए यहां पर समुद्र पर राइडिंग करने का मजा ही कुछ और होता है। यहां दिसंबर के आखिरी दिनों में पब, चर्च या बीच पर सांता क्लॉज की टोपी पहने सभी धर्म के लोग अंग्रेजी फ्रार्थनाओं और गानों की धुनों पर थिरकते हुए मिल जायेंगे।

सही मायनों में यहां इंडियन ािढसमस देखने को मिलता है। चारों तरफ मौसमी फूलों, फलों और केक की सुगंध यहां फैली होती है। बेसिलिका ऑफ बॉम जीजस, सेंट एंटोनी चर्च, सेंट एंड्रू चर्च, नवेलिन आदि गोवा के चर्च इन दिनों खूब गुलजार रहते हैं। गोवा की तरह ही केरल में भी धुर भारतीय तरीके से जाति-धर्म का भेदभाव भुलाकर लोग ािढसमस का त्यौहार मनाते हैं। गौरतलब है कि ईसाई धर्म का फ्रचार-फ्रसार सर्वफ्रथम भारत के इसी राज्य में हुआ था। ईसा मसीह के शिष्य सेंट थॉमस ने यहां फ्रभु ईशु के विचारों का फ्रचार फ्रसार किया था। शायद इसीलिए भारत केरल में ईसाई समाज के लोग बहुतायात में रहते हैं।

सेंट जॉर्ज चर्च, होली फेमेली चर्च, सेंट फ्रांसिस चर्च,सेंट ाढtज बेसिलिका चर्च, सेंट जॉर्ज कैथेड्रल, पारुमाला आदि चर्च यहां के फ्रसिद्ध चर्च हैं। केरल में सेंट थॉमस और माता मरियम के नाम पर भी ऐतिहासिक चर्च हैं। केरल के बाजारों में भी दिसंबर आते ही ािढसमस की रौनक छा जाती है। बच्चों के पास सांता क्लॉज की मुखाकृति वाली टोपी इन दिनों यहां बहुत देखने को मिलती है। लेकिन सिर्फ गोवा या केरल में ही ािढसमस की रौनक नहीं दिखती बल्कि गुजरात के रन ऑफ कच्छ में और दमन दीव वाले दीव में भी खूब दिखती है। दीव के ज्यादातर बीच एकांत, साफ-सुंदर और बड़े हैं। साथ ही यहां "हरने के लिए तमाम इकॉनमी शेल्टर भी हैं तो कई रिजॉर्ट भी हैं। कुल मिलाकर अगर कहा जाए कि देश के अब हर कोने में और हर डेस्टेनेशन में ािढसमस की धूम रहती है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी।

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