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एक स्कूली बच्चे की दास्तान वो बातें, वो डांटें जो मैं हर रोज सुनता हूँ

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:24 Sep 2017 5:47 PM GMT

एक स्कूली बच्चे की दास्तान  वो बातें, वो डांटें जो मैं हर रोज सुनता हूँ

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नीलम अरोड़ा
सुबह-सुबह घर में
हर दिन सुबह जागते ही मुझे ये बातें सुननी पड़ती हैं-'जल्दी उठो...अरे बाबा जल्दी करो!','अपनेदांत जल्दी स़ाफ करो!', 'क्या हुआ तुमने अपनी शर्ट के बटन अब तक नहीं लगाये?', 'तुमयूं हीं क्यों बैठे हो, अपना दूध पियो? '
हर सुबह स्कूल में
स्कूल पहुंचकर मुझे ये बातें सुननी पड़ती हैं-'ये सारे सवाल तुमने अब तक क्यों नहीं किये?','क्या..तुमने अभी तक उत्तर नहीं लिखे?','देखो, हर किसी ने अपना काम पूरा कर लिया है और तुम अभी तक बैठे हो ?'
स्कूल से घर लौटने पर
जब दोपहर को मैं स्कूल से घर लौटता हूं तो ये बातें मुझे मेरा इंतज़ार करती मिलती हैं- बैग रखो । चलो यूनिफोर्म उतारो । घर के कपड़े पहनो । खाना खाओ । चलो अपना होमवर्क अभी खत्म करो!', 'नीचे खेलने जाने से पहले 10 मिनट तक अपनी पियानो प्रैक्टिस कर लो।', 'सोने से पहले 20 मिनट तक कोई स्टोरी बुक पढ़ लो।',
रात 10 बजे बिस्तर में
अरे 'क्या हुआ? इतनी रात हो गई अभी तक सोये नहीं । चलो सो जाओ जल्दी । आँखें मूंदो । लाइट बंद । ओके गुड नाईट । नो...बिलकुल नहीं । अब एक मिनट भी नहीं जागना ।
कभी कभी मैं सोचता हूं कि जैसे मेरे पेरेंट्स ने जीवन को नियंत्रित करने वाले रिमोट का फ़ास्ट फॉरवर्ड बटन दबा दिया है। हर चीज़ अभी होनी है । अभी इसी वक्त । बिलकुल उनके कहते ही वर्ना उसका करना बेकार है । अरे हर चीज़ हम जल्दबाजी में क्यों कर रहे हैं ? माँ कहती है कि मैं समय प्रबंधन का महत्व नहीं समझता और अगर मैं हर चीज़ समय पर नहीं करूंगा तो समय मुझे कुचलता हुआ आगे बढ़ जायेगा।
मुझे यह बातें अजीब लगती हैं, लेकिन मैं माँ से नहीं कहता क्योंकि अगर उनके भाषण के बीच में मैं बोलूंगा तो वह नाराज़ हो जायेंगी। माँ अपना भाषण जारी रखती है, "तुमअगर हर चीज़ देर से करोगे तो देर से नींद आयेगी, देर से सोना होगा और फिर देर से उठोगे।" लेकिन मैं जल्दी क्यों उठूं अगर मुझे एकसा ही काम फिर फ़ास्ट फॉरवर्ड पर करना है? मैं सोच रहा हूं कि जो कुछ मेरे पेरेंट्स कहते हैं उसे रिकॉर्ड कर लूं और फिर उसे सुनाऊं कि वह कितने बेवकूफ प्रतीत होते हैं।
कभी कभी मेरे पेरेंट्स और मेरे टीचर्स मुझसे कहते हैंः 'अपनासमय लो। उत्तर देने में जल्दबाजी मत करो।', 'इतनीजल्दी तुम नहा कैसे लिए?', 'अपनाखाना धीरे धीरे, चबा चबा कर खाओ।' अब अगर यह मिश्रित सन्देश नहीं है तो और क्या है - जल्दी करो या धीरे करो? अगर दोनों ही काम करने हैं तो पेरेंट्स या टीचर्स ही मुझे क्यों बताएं कि मैं कब जल्दी करूं और कब धीरे धीरे? यह सही नहीं है। अगर मुझसे मालूम किया जाये (हालांकि कोई करता नहीं है) तो मैं टीवी देखते में धीरे और नहाने में जल्दी करना चाहता हूं। माँ कहती है कि यह बातें मेरे बड़ा होने पर समझ में आयेंगी। चूंकि बड़ा होकर व्यक्ति हर काम जल्दी करना चाहता है, इसलिए मैं धीरे धीरे बड़ा होना चाहता हूं ।

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