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इस साल बेहतर मानसून की उम्मीद

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:2018-06-17 17:27:52.0

इस साल बेहतर मानसून की उम्मीद

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लोकमित्र

भले मौसम या मानसून भारतीय मीडिया की लोकफ्रिय बीट न हो, लेकिन अफ्रैल माह के आखिरी दिनों से लेकर मई महीने का पहला हफ्ता गुजरते-गुजरते अखबारों के आम पा"क ही नहीं शेयर बाजार के निवेशक और बाजार की गतिविधियों पर बारीक नजर रखने वाले लोग मीडिया में मानसून की खोज-खबर करने लगते हैं। दूसरे शब्दों में ये तमाम लोग यह जानने के लिए उत्सुक हो जाते हैं कि इस साल मानसून कैसा रहेगा? मौसम विभाग में पत्रकारों के फोन की घंटियां बजने लगती हैं और फिर एक दिन मानसून वैज्ञानिकों की भारी भरकम फ्रेस कांफ्रेंस का दिन आ ही जाता है। इस साल यह दिन 21 मई 2018 था। इस दिन हालांकि फ्रेस कांफ्रेंस जैसी चीज नहीं हुई सिर्फ इस साल के मानसून को लेकर मौसम विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा शुरुआती अनुमान जारी हुए।

इस साल के इस पहले अनुमान में मानसून के सामान्य रहने की बात कही गई है। मौसम विभाग के मुताबिक चूंकि इस साल अलनीनो की स्थिति न्यूट्रल है, इसलिए इस साल सामान्य से 97 फीसदी तक बारिश की उम्मीद है। वैसे ये प्रारंभिक अनुमान हैं और मौसम विभाग के मुताबिक इन अनुमानों को जून के पहले हफ्ते में अपडेट किया जाएगा। गौरतलब है कि पिछले साल सामान्य से 98 फीसदी तक बारिश का अनुमान था, लेकिन हकीकत में यह अनुमान से थोड़े कम हुई थी। पिछले साल पूरे सीजन में मात्र 95 फीसदी बारिश ही हुई थी।

लेकिन जहां तक इस साल की बात है तो स्काईमेट ने भी जून से सितंबर के बीच 100 फीसदी बारिश की उम्मीद जताई है। मालूम हो कि स्काईमेट वेदर कंपनी, मौसम की भविष्यवाणी करने वाली एक फ्राइवेट कंपनी है। इसके अनुमान आमतौर पर सरकारी अनुमानों से भिन्न होते हैं और सरकारी अनुमानों से कहीं ज्यादा सटीक पाये जाते हैं। इसलिए लोग मौसम विभाग के सरकारी वैज्ञानिकों की अपेक्षा स्काईमेट की भविष्यवाणियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। बहरहाल यहां सवाल है कि मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने मानसून को इस साल बेहतर रहने की जो भविष्यवाणी की है उसके क्या मायने हैं या दूसरे शब्दों में बेहतर मानसून का भारत जैसे देश के लिए क्या महत्व है?

यूं तो इसके बहुत अर्थ हैं और अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग अर्थ और फायदे हैं। लेकिन हिंदुस्तान में एक आम आदमी के लिए बेहतर मानसून का मतलब है- भरपूर अन्न उत्पादन, जिससे मंहगाई से राहत रहे। पानी और गर्मी की किल्लत से मुक्ति तथा शहरी भारत को बिजली कटौती से राहत। अगर अच्छी बारिश होती है तो स्वाभाविक है कि कृषि उत्पादन बेहतर होता है। क्योंकि अच्छी बारिश होने से देश के उन हिस्सों में भी अच्छी फसल हो जाती है, जहां सिंचाई की माकूल सुविधा नहीं है। जहां सिंचाई के साधन हैं, वहां भी अच्छी बारिश के चलते किसानों को ज्यादा नलकूप नहीं चलाने पड़ते। इसलिए न तो ज्यादा डीजल फुंकता है और न ही बिजली, नतीजतन किसानों की लागत कम आती है।

बेहतर मानसून रहने से मंहगाई काबू में रहती है और खुशहाली की उम्मीदें उफान मारती हैं जिससे शेयर बाजार जैसी सेकेंडरी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है जिससे फ्राथमिक अर्थव्यवस्था में चार चांद लगते हैं। यह अकारण नहीं है कि बेहतर मानसून की भविष्यवाणी के साथ ही पिछले एक सप्ताह से लगातार शेयर बाजार से उछाल की खबरें आ रही हैं विशेषकर रूरल-एग्रो सेक्टर और ऑटोमोबाइल्स क्षेत्र के शेयरों में यह तेजी देखी जा सकती है जो कि बेहतर मानसून की उम्मीदों का नतीजा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले दिनों में एनबीएफसी, एफएमसीजी क्षेत्र के स्टॉक्स में भी तेजी देखी जायेगी। कुल मिलाकर कहने की बात यह है कि अगर मानसून बेहतर रहता है तो पूंजी और शेयर बाजार में भी रौनक रहती है। सबसे बड़ी बात यह होती है कि बेहतर मानसून से देश की, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की ाढयशक्ति में उछाल देखने को मिलता है। यह उछाल दो वजहों से आती है। एक तो बेहतर पैदावार से और दूसरी बेहतर पैदावार की उम्मीद से। जब देश के ग्रामीण इलाकों में लोगों की खरीद शक्ति बढ़ती है तो उपभोक्ता कम्पनियों के अच्छे दिन आ जाते हैं। बेहतर मानसून से देश की नदियों और जलाशयों में पानी का स्तर लबालब रहता है, जिससे न सिर्फ पीने के पानी की किल्लत खत्म हो जाती है बल्कि बिजली उत्पादन भी अच्छा रहता है जिस कारण देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में भी उछाल आता है; क्योंकि उत्पादन बढ़ चुका होता है।

यदि बारिश कम हो और जलाशयों में जलस्तर भी कम हो तो बिजली का उत्पादन फ्रभावित होता है। बिजली के उत्पादन में गिरावट से देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था फ्रभावित होती है। बेहतर मानसून से तालाबों में पर्याप्त पानी हो जाता है जिस कारण भूजल अच्छी तरह से रिचार्ज होता है। भू-जल का स्तर बढ़ने से वैसे ही फायदे होते हैं जैसे कि बेहतर बारिश से होते हैं। इससे कुओं और ट्यूबवेलों से पानी हासिल करने में कोई क"िनाई नहीं होती और खेती से लेकर पीने के पानी तक की समस्या का आसानी से हल हो जाता है।

आमतौर पर कृषि पैदावार का ज्यादा बोझ रवि की फसल यानी गेंहू वाली फसल पर होता है, लेकिन जब बेहतर मानसून होता है तो खरीफ की फसलों में भी अच्छी पैदावार हो जाती है। इससे तिलहन और दालों का संकट दूर होता है। हाल के सालों में दालों की मंहगाई ने आम आदमी को बहुत परेशान किया है। बेहतर मानसून होने से तिलहन की पैदावार बढ़ जाती है, जिससे महंगाई काबू में रहती है। बेहतर खरीफ फसलों से खानेपीने की चीजों के विकल्पों में वृद्धि होती है। क्योंकि धान, ज्वार, बाजरा, कपास, मक्का, सोयाबीन आदि की फसलें भरपूर होती हैं। ये फसलें वास्तव में बेहतर मानसून पर ही निर्भर होती हैं। इस साल इसीलिए खरीफ की फसल में खाद्यान्न की पैदावार में बढ़ोतरी होने की संभावना है।

अच्छी बारिश होने के पूर्वानुमान से उन किसानों की खुशी में इजाफा होता है जो कपास, गन्ने और ग्वार की खेती में अपना काफी निवेश करते हैं। दरअसल बेहतर मानसून से गन्ने की पैदावार में दोगुने तक की वृद्धि हो जाती है इससे किसानों की आय तो बढ़ती ही है, चीनी के दाम भी काबू में रहते हैं। कुल मिलाकर मौसम विभाग की तरफ से बेहतर मानसून रहने की जो भविष्यवाणी की गयी है, उससे किसानों को तो अच्छे दिनों की उम्मीद बनी ही है मोदी सरकार को भी अपने अच्छे दिनों की आस बढ़ गयी है।

बॉक्स- मौसम विभाग की भविष्यवाणी

वर्ष भविष्यवाणी वास्तविक बारिश

2005 98 प्रतिशत 99 प्रतिशत

2006 93 प्रतिशत 100 प्रतिशत

2007 95 प्रतिशत 106 प्रतिशत

2008 99 प्रतिशत 98 प्रतिशत

2009 96 प्रतिशत 78 प्रतिशत

2010 98 प्रतिशत 102 प्रतिशत

2011 98 प्रतिशत 102 प्रतिशत

2012 99 प्रतिशत 93 प्रतिशत

2013 98 प्रतिशत 106 प्रतिशत

2014 93 प्रतिशत 89 प्रतिशत

2015 93 प्रतिशत 86 प्रतिशत

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