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'संपर्क फार समर्थन' में साहित्यकार क्यों नहीं शामिल?

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:2018-06-24 15:09:47.0

संपर्क फार समर्थन में  साहित्यकार क्यों नहीं शामिल?

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सुधांशु गुप्त

घोषणा भले न हुई हो लेकिन हकीकत यही है कि देश अब एक तरह से चुनावी मोड में है। सभी राजनीतिक पार्टियां साल 2019 के लोकसभा चुनाव जीतने के लिए अपनी-अपनी तरफ से फूलप्रूफ रणनीतियां बनाने में जुटी हैं। सत्ता के लिहाज से फिलहाल देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा ने तो विधिवत सम्पर्क भी शुरु कर दिया है लेकिन यह संपर्क अभी सेलिब्रिटीज किस्म के लोगों के साथ ही है। अंतिम समय में उस मतदाता के साथ भी राजनेता संपर्क करेंगे, जिसे अंततः हार या जीत तय करना है। लेकिन अभी तो सिर्फ समाज के खास लोगों से ही मेल मुलाकात की जा रही है। सवाल है क्या इन खास लोगों में देश के साहित्यकारों को शामिल नहीं किया जा सकता? माना जाता है साहित्य समाज का दर्पण होता है तो जाहिर है साहित्यकार इस दर्पण के निर्माता होते हैं। ऐसे में सियासी पार्टियां समाज के इतने महत्वपूर्ण तबके को आखिर क्यों इग्नोर करके किसी तरह के घाटे में नहीं रहतीं?

साल 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी ने संपर्क फार समर्थन अभियान की शुरूआत कर दी है । इसके तहत भाजपा समाज के फ्रतिष्"ित लोगों, बिजनेसमैन और अलग-अलग समुदायों के क्षत्रपों से मिल रही है, मिलेगी। इस अभियान की शुरूआत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने फिल्म अभिनेत्री माधुरी दीक्षित से मुलाकात करके की। उनके साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस भी थे। पता चला है कि वह मिलने वालों से पार्टी की चार साल की उपलब्धियां बता रहे हैं। जाहिर है वह अपनी पार्टी के लिए समर्थन भी मांगेगे।

दरअसल पार्टियों द्वारा समर्थन मांगना कोई नया रिवाज नहीं है। चुनाव में खड़े होने वाले लोग हमेशा ही लोगों से वोट और समर्थन मांगते रहे हैं। बिना इस बात की परवाह किए कि कौन उनके पक्ष का है और कौन विरोधी ? लेकिन भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह ने इसे व्यवस्थित ढंग से शुरू किया है। यह समर्थन एक स्तर पर निजी रूप से मांगा जाएगा और दूसरे स्तर पर विभिन्न क्षेत्रीय दलों से। यह भी कतई जरूरी नहीं है कि जो दल भाजपा को समर्थन देंगे या दे रहे हैं, वे चुनाव के बाद सरकार बनाने में उसके साथ ही रहें। वे किसी और दल के साथ भी जा सकते हैं यानी चुनावों से पहले आप जिसका समर्थन कर रहे हैं, यह जरूरी नहीं है कि चुनाव परिणामों के बाद भी आप उसी का समर्थन करने के लिए अभिशप्त हैं।

एक तरफ अमित शाह का काफिला संपर्क फार समर्थन में जुटा है तो दूसरी तरफ उत्तर फ्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी संपर्क अभियान शुरू कर दिया है। उन्होंने लखनऊ में संघ की विचारधारा के समर्थक लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के जरिये राष्ट्रवाद के ऐजेंडे को आगे ले जाने का अभियान शुरू किया है। उनके इस पहले अभियान में दक्षिणपंथी लेखक और पत्रकारों ने शिरकत की। लेकिन यह देख और जानकर थोड़ा अजीब लगा कि भाजपा उन्हीं लोगों या फ्रतिष्"ित शख्सियतों से संपर्क कर रही है जो या तो पहले से ही संघ और भाजपा के समर्थक हैं या जिनकी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं है।

क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि भाजपा अपने विरोधी लोगों को भी इस संपर्क सूची में रखे और उनसे समर्थन मांगे ? उन्हें यह समझाए कि पिछले चार साल में भाजपा सरकार ने किस तरह देश के लिए जी तोड़ काम किया है, देश को विश्व मानचित्र पर कहां से कहां पहुंचा दिया है? गुम हो रहा राष्ट्रवाद किस तरह दोबारा सतह पर आ गया है । बेहतर तो यह होगा कि भाजपा उन बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों से समर्थन के लिए संपर्क करे जो धुर भाजपा विरोधी हैं। इससे एक स्वस्थ बहस शुरू होगी और उन बहुत से साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के चेहरों पर पड़ा नकाब भी हट जाएगा जो दबे-छिपे खुद को वामपंथी कहते हैं। इससे समाज का भी भला होगा। उन्हें यह पता चलेगा कि कौन कहां खड़ा है और किसकी फ्रतिबद्धताएं किसके साथ जुड़ी हैं ?

संपर्क फार समर्थन के इस पूरे खेल को समझने के लिए हमें महाभारत की तरफ लौटना होगा। इस महत्वपूर्ण ग्रंथ में महाभारत के युद्ध से पहले कौरवों और पांडवों-दोनों के पास यह सुविधा थी कि वे राजाओं और वीरों के पास अपनी तरफ से युद्ध लड़ने का फ्रस्ताव लेकर जाएं। एक बार निर्णय हो जाने के बाद पाला बदलने की छूट नहीं थी। भगवान कृष्ण के पास भी समर्थन मांगने के लिए अर्जुन और दुर्योधन दोनों गये थे। किसे क्या मिला और किसने किसका समर्थन किया, यह दीगर बात है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उस विशाल युद्ध से पहले इतनी ईमानदारी बरती गयी थी कि आपको अपना पक्ष चुनने की स्वतंत्रता थी।

अपना पक्ष चुनने की यह स्वतंत्रता धीरे धीरे लुप्त होती चली गयी। आज के इस आधुनिक और कथित लोकतांत्रिक दुनिया में चुनावों को ही युद्ध माना जा सकता है। यह एक ऐसा युद्ध है जिसमें राजनीतिक पार्टियां एक साथ या अलग-अलग "हस्तिनापुर' की गद्दी के लिए चुनाव लड़ती हैं। इसमें देश की जनता भी मतदान के जरिये शिरकत करती है। लेकिन इतने बड़े देश में इतना विशाल चुनाव होने के बावजूद जनता आजतक नहीं समझ पाई है कि नेताओं की फ्रतिबद्धताएं क्या और किसके साथ हैं ? वह बहुत से साहित्यकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के सरोकारों से भी अनभिज्ञ ही रहती है। फ्रतिबद्धताओं को फ्रदर्शित करने के लिए किसी खास दिशा से किसी खास पार्टी के विरोध या समर्थन में एक स्वर उभरता है और फिर थम जाता है। जनता यह नहीं जान पाती कि कौन किस खेमे का है।

दरअसल भारतीय समाज "न काहू से दोस्ती न काहू से बैर' वाले ट्रैक पर सदियों से चल रहा है। माना भी जाता है कि इंडियन सोसायटी हिप्पेट है। "न काहू से दोस्ती न काहू से बैर' दर्शन का मूल यह है कि दोस्ती किसी से इसलिए मत करो कि वह आपसे कुछ मांग न ले, और बैर इसलिए मत करो कि कहीं आपको कुछ मिलना हो तो वह मिलने से आप वंचित न रह जाए। हमारे समाज की यह विडंबना ही है कि हम तटस्थ बने रहना पसंद करते हैं। जब जो हमारे हित में नजर आता है, हमारा पलड़ा उसी की तरफ झुक जाता है। यह स्थिति राजनीति से लेकर कार्यालयों और घरों तक में देखी जा सकती है।

इसलिए भाजपा के पास संपर्क फार समर्थन के बहाने बहुत से लोगों को एक्सपोज करने का मौका भी है। आखिर साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के खेमे तो इस बहाने स्पष्ट होंगे। उनकी फ्रतिबद्धताएं तो आम लोगों को पता चलेगी। और यह भी पता चलेगा कि दिन रात किसी एक पार्टी का विरोध या समर्थन करने वाले किसी के साथ हैं भी या नहीं ?

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