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भाजपा को भारी पड़ सकते हैं मूल मुद्दोsं से जुड़े सवाल

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:17 Sep 2018 2:58 PM GMT

भाजपा को भारी पड़ सकते हैं मूल मुद्दोsं से जुड़े सवाल

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तुषार कोठारी

019 के लोकसभा चुनाव को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है और देश के अधिकांश राजनैतिक विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं कि नरेन्द मोदी का दोबारा पधानमंत्री बनना तय है। मतभिन्नता है तो सीटों की संख्या और एनडीए के घटक दलों को लेकर है, लेकिन अधिकांश लोगों का मानना है कि नरेन्द मोदी ही अगले पधानमंत्री होंगे। भाजपा के रणनीतिकारों का भी यही मानना है।

विश्लेषकों की यह मान्यता ठोस आधारों पर बनी है। मोदी सरकार का चार सालों का कार्यकाल और देश के अन्य राजनैतिक दलों की हालत इस मान्यता का आधार है। निश्चित रूप से मोदी सरकार ने पिछले चार सालों में जो उपलब्धियां अर्जित की हैं, वे ऐतिहासिक है। ठीक इसी के साथ कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों की वर्तमान स्थिति पिछले चुनाव की तुलना में बदतर हो चुकी है।

विपक्षी दलों की बात की जाए तो हिन्दीभाषी पदेशों में विपक्ष की हालत बेहद खस्ता है। उत्तर पदेश में जहां मुलायम सिंह बुजुर्ग होकर अपने ही पुत्र अखिलेश से अपमानित हो चुके हैं, वहीं बहन जी मायावती बुझी हुई राख में अंगारों को ढूंढक्वने की कोशिशें कर रही हैं। कांग्रेस यहां लगभग अस्तित्वहीन है। अब तीनों मिलकर भाजपा को चुनौती देने की योजना बना रहे हैं। बिहार में लालू जी भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बन्द होकर बुढक्वापे और बीमारियों से जूझ रहे हैं और अल्पशिक्षित तेजस्वी के हाथों में कमान है। दक्षिण भारत में अम्मा जयललिता स्वर्ग सिधार चुकी हैं और करुणानिधि भी स्वर्गवासी हो गए हैं। उनके पीछे उन जैसा चमत्कारिक व्यक्तित्व कहीं नजर नहीं आता। इस सबके बाद काल्पनिक महागठबंधन के नेता का यक्षपश्न सभी के सामने है। कुल मिलाकर विपक्षी चुनौती नदारद है और मोदी जी का चमत्कारिक व्यक्तित्व, भाजपा के लिए जीत की गारंटी नजर आ रहा है।

लेकिन राजनैतिक परिदृश्य इतने भर से ही स्पष्ट नहीं हो जाने वाला। कुछ सवाल है, जो जमी-जमाई कहानी को बिगाड़ने में सक्षम है। बेहद मजबूत किले बाहरी आकमणों से ध्वस्त नहीं हुए, वे अक्सर भीतरी कमजोरियों से नष्ट हुए हैं। भाजपा का मजबूत दुर्ग बाहरी आकमणों को झेलने में तो पूरी तरह सक्षम नजर आ रहा है, लेकिन भीतरी चुनौतियों का निपटारा कैसे होगा। यह पश्न अब तक अनुत्तरित है।

भीतरी चुनौतियां सिर्प पार्टी संगठन और नेताओं की ओर से नहीं है, बल्कि भाजपा के हिन्दुत्ववादी जनाधार की तरफ से भी है और यही शायद सबसे बड़ी चुनौती है। भाजपा का अपना स्वयं का हिन्दुत्ववादी या कहें राष्ट्रवादी मतदाताओं का जो जनाधार है, उसमें अब कहीं न कहीं निराशा या नाराजगी का माहौल बनने लगा है। हालांकि इस नाराजगी को पहचानना आसान नहीं है, लेकिन इस वर्ग की नाराजगी सारे खेल को बिगाड़ने में सक्षम है।

इस पहलू को समझने के लिए हमें पन्दह वर्ष या कहिये बीस वर्ष पीछे जाना होगा। याद कीजिये वर्ष 1999 जब भाजपा को केन्दीय सत्ता में जाने का मौका मिला था और अटल बिहारी वाजपेयी पधानमंत्री बने थे। वाजपेयी जी के कार्यकाल में पोखरण परमाणु परीक्षण, स्वर्णिम चतुर्भुज, नदी जोड़ो अभियान जैसी कई उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की गईं। उस समय भाजपा के नीति निर्धारक मानकर चल रहे थे कि शाइनिंग इण्डिया के नारे से दोबारा जीत पक्की है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विदेशी मूल की श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जीत हासिल कर ली।

पराजय के वास्तविक कारणों को भाजपा नेतृत्व ने कभी उजागर नहीं किया। उस वक्त संसद पर हमले के बाद सीमाओं पर लम्बे समय तक सेना तैनात करने और पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी बयानबाजी करने के बावजूद कोई ठोस कार्यवाही नहीं होने से राष्ट्रवादी सोच वाले मतदाता अटल जी से बुरी तरह निराश हो चुके थे। पाकिस्तान संबंधी अटल जी की नीति ने हिन्दुत्ववादी सोच वाले मतदाताओं को बुरी तरह नाराज कर दिया था। भाजपा का जो मूल जनाधार है, वह आरएसएस की विचारधारा को मानने वाले लोगों का जनाधार है। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले लोगों की देश में एक बड़ी संख्या है। ये ही वे मतदाता हैं, जो भाजपा की जीत में पमुख भूमिका निभाते हैं। हिन्दुत्ववादी और राष्ट्रवादी सोच रखने वाले ये मतदाता विकास को पूरा महत्व देते हैं, लेकिन उनके लिए राष्ट्र के सम्मान से जुड़े मसलों का महत्व विकास से कम नहीं है, बल्कि वे इसी को पाथमिकता देते हैं। चूंकि अटल जी के समय संसद हमले के बाद भारत की नीति शर्मसार कर देने वाली थी, इसलिए भाजपा का मूल जनाधार बुरी तरह नाराज था और इसी का नतीजा था कि उस समय भाजपा दोबारा सत्ता में नहीं आ पाई।

वर्तमान समय को देखें। मोदी जी ने देश की सॉफ्ट स्टेट की छबि को सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम उठाकर सुधारने का काम किया और पूरे देश ने इसका भरपूर समर्थन भी किया, लेकिन हिन्दुत्ववादी सोच रखने वाले मतदाताओं के सर्वाधिक महत्व के मुद्दों पर अब तक स्थितियां स्पष्ट नहीं हुई है। राम जन्मभूमि मंदिर का मुद्दा न्यायालय के भरोसे छोड़ दिया गया है। इसी तरह जम्मू-कश्मीर का मामला भी न्यायालय के जिम्मे डाल दिया गया है। भाजपा के राष्ट्रवादी मतदाता दशकों से कांग्रेस को देश की सुरक्षा और आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं कर पाने के लिए कोसते रहे हैं और उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा की राष्ट्रवादी सरकार आएगी तो पाकिस्तान को सबक सिखाएगी, लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद पाकिस्तान काबू में नहीं आ सका और न ही पाकिस्तान की हरकतें सुधरीं।

ये और इस तरह के राष्ट्र से जुड़े मुद्दों पर भाजपा के मूल जनाधार को संतोषजनक काम नजर नहीं आया है। राम जन्मभूमि मंदिर के लिए आन्दोलन करने वाले लाखों लोग टकटकी लगाकर भाजपा की तरफ देख रहे हैं। भाजपा के नेता पहले स्पष्ट बहुमत नहीं होने का हवाला देकर बच निकलते थे, लेकिन जब स्पष्ट बहुमत आ गया, तब भी नेता न्यायालय की ही दुहाई देते रहेंगे, यह इन मतदाताओं के गले नहीं उतर रहा है। उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा कानून बनाकर मंदिर निर्माण का मार्ग पशस्त करेगी। इसी तरह राष्ट्रवादी लोगों को उम्मीद थी कि पाकिस्तान सुधरे न सुधरे, कश्मीर की धारा 370 समाप्त करने का वादा भाजपा जरूर निभाएगी, लेकिन यह भी नहीं हुआ।

भाजपा का यह मूल जनाधार संघ की सोच से जुड़ा हुआ है। ये वो मतदाता हैं, जो खुलकर अपनी नाराजगी का इजहार नहीं करते, लेकिन इनकी नाराजगी और उदासीनता की कीमत अटल जी तक को चुकानी पड़ी थी। भाजपा के नीति निर्धारकों को इस पहलू पर गंभीरता से विचार कर लेना चाहिए। शाइनिंग इण्डिया जैसा हश्र दोबारा न देखना पड़े, इसके लिए जरूरी है कि देश की सुरक्षा और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों पर ठोस काम किया जाए, जो नजर भी आए।

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