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एनडीए से बगावत करते छोटे-छोटे सहयोगी दल

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2019-01-08T21:02:54+05:30
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बसंत कुमार

वर्ष 2019 उसने वाला है और इसी वर्ष देश में आम चुनाव होने वाले हैं और आम चुनाव की आहट होते ही दो घटनाएं तेजी से घट रही हैं। एक तो महागठबंधन को मजबूत करने हेतु नाराजगी और मनव्वल या सिलसिला रोज ही सुनने में आता है और दूसरा एनडीए में छोटे-छोटे सहयोगी दलों की बेचैनी और महगठबंधन की ओर लाभान्वित होते की घटनाएं। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की चार जनधन योजना, उज्जवला, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मेक इन इंडिया व स्टार्टअप इंडिया जैसी स्वर्णिम योजनाएं थी। और नरेंद्र मोदी सरकार की प्रतिस्पर्धा सिर्प अटल बिहारी बाजपेयी को नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के प्रदर्शन से ही की जा सकती है। परन्तु न जाने एनडीए के छोटे-छोटे सहयोगियों को इसमें खोट ही खोट नजर आने लगा है और वे सरकार की उपलब्धियों और सफलताओं के बल पर चुनाव लड़ने के बजाय जातीय आधार पर चुनाव लड़वा चाहते हैं।

जहां तक इस देश के लोकतांत्रिक इतिहास में दो बार विपक्षी पार्टियों द्वारा महागठबंधन बने थे। पहली बार 1977 में लोकनायक जयप्रकाश नारायन के नेतृत्व में बना। लेकिन यह गठबंधन आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों के विरोध में हुआ। यह सभी को याद है जब स्वर्गीय संजय गांधी के निर्देशन में अविवादित, नाबालिग बच्चों की नसबंधी कर दी गई और प्रेस और मीडिया की आजादी पर सेंसर लगा दिया था और 1977 का चुनाव लोकतंत्र की बहाली के मुद्दे पर लड़ा गया। दूसरा महागठबंधन सन 1989 में बोफोर्स तोप घोटाले के विरोध बना। सन 1989 के चुनाव में किसानों की समस्या, बढ़ती हुई महंगाई, बोफोर्स तोप सौदे में दलाली पर चुनाव लड़ गए और 1984 के चुनावों में 400 से अधिक सीटें पाने वाली कांग्रेस बुरी तरह हार गई। परन्तु इस समय जो गठबंधन बन रहा है उसमे न कोई मुद्दा है और न कोई आधार है। यह तो विभिन्न निराश विपक्षी दलो का जातीय गुणा भाग के द्वारा मुंगेरी लाल को हसीन सपने जैसा वर्ष 2019 में ऐसी सरकार बनाने का सपना, जिसमें हर दल अपने नेता को प्रधानमंत्री, देख रहा है।

महागठबंधन की दो बड़ी पार्टियों समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी के संबंधों व इतिहास जानना आवश्यक है। वर्ष 94-95 में सपा व बसपा के सहयोग से उप्र में सरकार बनी और श्री मुलायम सिंह यादव इस सरकार के मुख्यमंत्री बने। परन्तु मुलायम सिंह जी के तानाशाही पूर्वी व एससी विरोधी रवैये के कारण स्वर्गीय कांशीराम जी जैसा सुलझा हुआ व सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित व्यक्ति भी मुलायम सिंह जी की सरकार से समर्थन वापस लेने पर विवश हो गया और उसके पश्चात सपा के गुंडों द्वारा एससी की बेटी के साथ जो व्यवहार किया गया वह आज भी गेस्ट हाउस कांड के नाम से लोगों के जेहन में आज भी है। वर्ष 2012 के उप्र विधान सभा चुनावों के पश्चात श्री अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के पश्चात जिस प्रकार सपा कार्यकर्ताओं द्वारा जिस प्रकार से 200 एससी बस्तियों को आग के हवाले कर दिया गया उसे आज भी एससी समाज सहमा हुआ है। तो क्या आज बुआ और भतीजे के गठबंधन से एससी समाज सपा के गुंडों द्वारा लगातार किए गए अत्याचारों को भूल गया है। ऐसे में सपा प्रत्याशियों को एससी विशेषकर जाटवों का समर्थन मिलेगा ऐसा मुझे नहीं लगता। ये दोनों ही पार्टियां प्रतिदिन कांग्रेस का हाथ झटकने का बयान दे दिया करती हैं। एससी पर दायर मुकदमो को वापस लेने के सवाल पर बहन मायावती ने 15 दिन पूर्व बनी मध्यप्रदेश व राजस्थान की कांग्रेस सरकारो से समर्थन वापसी की धमकी दे दी है।

अब प्रश्न है कि एनडीए में शामिल छोटे-छोटे सहयोगी दल एनडीए का साथ क्यों छोड़ रहे हैं। ये दल चुनाव के समय दबाव बनाकर अपने दल के लिए अधिक सीटें प्राप्त कर अपनी ताकत बढ़ाए ये इनका अधिकार है परन्तु जब ये अपने सैद्धांतिक आरोपियों से संबंध बना ले यह बहुत ही कष्टदायक होता है और साथ ही साथ उनके अपने समर्थकों को ही पीड़ा होती है। उनके एक सहयोगी श्री उपेन्द्र कुशवाहा तीन सांसदों के बल पर 41/2 वर्ष तक केंद्र में मंत्री बने रहने के पश्चात मात्र सीट बंटवारे पर त्यागपत्र दे दिया। जो कुशवाहा जो बिहार में लालू राज को गुंडाराज व उनको अति पिछड़ा वर्ग का विरोधी कहते थे आज उन्ही उपेन्द्र जी को लालूजी की राष्ट्रीय जनता दल व उनके महागठबंधन में सुशासन व सामाजिक न्याय की आशा बंधने लगी है। उनके यह पता होना चाहिए था कि बिहार की सबसे बड़ी पार्टी जेडीयू, एनडीए के सबसे बड़े सहयोगी के रूप में काम कर रही है उन्हें लोकसभा में एकाध सीटें कम होने की परवाह किए बिना अपने कुशवाहा समाज के हितों को ध्यान में रखना चाहिए था जो वर्षों से उपेक्षित था और एनडीए सरकार में केंद्र व प्रदेश में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी पा रहा है। आज उप्र में केशव प्रसाद मौर्य के रूप में उप मुख्यमंत्री और स्वामी प्रसाद मौर्य के रूप में महत्वपूर्ण मंत्री है। परन्तु उपेन्द्र जी की व्यक्तिगत महात्वाकांक्षी के आगे कुशवाहा (कोहरी) समाज की सत्ता में हिस्सेदारी उन्हें रास न आई।

एनडीए के दूसरे सहयोगी सुहेल देव पार्टी के अध्यक्ष श्री ओम प्रकाश राजभर उप्र सरकार में मंत्री पद लेकर सारे लाभ उठाते रहे और सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत का उल्लंघन करके अपनी ही सरकार के खिलाफ अनाप-शनाप आरोप लगाते रहे। वे महागठबंधन के जातिवादी जादुई तिलस्म में ऐसे पंसे है कि वह फूल गए है कि राजभर समाज का भला कहा है।

एनडीए का तीसरा सहयोगी अपना दल है। इसकी नेता श्रीमती अनुप्रिया पटेल केंद्र सरकार में स्वास्थ्य राज्यमंत्री है स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त है व विकासवाद की राजनीति में विश्वास करती है। उनके विषय में कहा जाता है कि एक सांसद के रूप में उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र मिर्जापुर में जो विकास के काम किए है वह उनसे पहले किसी सांसद ने नहीं किया। परन्तु कुछ दिन पूर्व ही उनकी पार्टी के अध्यक्ष ने एनडीए सरकार में अपना दल की उपेक्षा का प्रश्न उठाया और प्रदेश में मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सरकार की प्रशंसा की। यही लोग पहले प्रदेश में बसपा सरकार को प्रदेश की भ्रष्टतम सरकार कहते थे। यह बात जानना आवश्यक है कि अपना दल के संस्थापक स्वर्गीय सोने लाल पटेल बसपा बसपा के संस्थापक सदस्य थे और श्री कांशीराम के बहुत प्रिय थे बाद में बहन मायावती को उपेक्षा से कुपित होकर उन्होंने अपना दल बनाया है। संभवत अपना दल भी महागठबंधन के जातीय गुणा भाग से प्रभावित लगता है और यह मान बैठा है कि वर्ष 2019 के आम चुनाव जातीय आंकड़ों पर लड़े जाएंगे।

जबकि वास्तविकता यह है कि ये चुनाव विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य के ही मुद्दे पर लड़े जाएंगे और मोदी सरकार ने इन क्षेत्रों में प्रशंसनीय काम किया है। उनका प्रदर्शन देश की पिछले सरकारों से बेहतर है। एनडीए के छोटे-छोटे सहयोगी दलों की बेचैनी भाजपा नेतृत्व के प्रति असंतोष नहीं है बल्कि यह बेचैनी जातीय गुणा-भाग के आधार पर अपनी शक्ति बढ़ाने हेतु उनकी दबाव की राजनीति है इसी कारण वे जातीय आधार बन रहे महागठबंधन की ओर लालायित हो रहे हैं परन्तु आश्चर्य नहीं जब ये 2019 के चुनावों के पश्चात पुन एनडीए में शामिल होने की जुगत भिड़ाएं।

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