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मोदी से मुकाबले के लिए आमने-सामने आ सकते हैं राहुल और ममता

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2019-02-10T23:44:14+05:30

मोदी से मुकाबले के लिए आमने-सामने आ सकते हैं राहुल और ममता

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आदित्य नरेन्द्र

पिछले कुछ दिनों से देश में राष्ट्रीय स्तर पर जो राजनीति चल रही है उससे क्षेत्रीय दलों की बांछें खिली हुई हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि आने वाले समय में केंद्र में सरकार बनाने के आकांक्षी दलों को समर्थन देने के लिए वह बेहतर मोलभाव करने की स्थिति में होंगे। उधर प्रधानमंत्री पद के लिए गोलबंदी करने में जुटे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी के सामने एक साथ दो मोर्चे खोलने के हालात नजर आ रहे हैं। एक मोर्चे पर तो मोदी इन दोनों नेताओं के घोषित चिर-प्रतिद्वंद्वी हैं जबकि दूसरा मोर्चा इन दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ अघोषित रूप से खोल रखा है। दिलचस्प बात यह है कि यह दोनों नेता ऐसा करते हुए सार्वजनिक रूप से अलग दिखना भी नहीं चाहते क्योंकि आम चुनावों में अभी दो-तीन महीने की देरी है और राजनीतिक हवा किसके पक्ष में हो सकती है इसका अंदाजा लगाना फिलहाल मुश्किल है। ऐसे में दोनों नेता अपनी छवि मोदी के निकटतम प्रतिद्वंद्वी के रूप में बनाने में लगे हैं।

मोदी को सत्ता से हटाने और अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए राहुल गांधी पिछले कई महीनों से भरसक प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने कर्जमाफी से लेकर सॉफ्ट हिन्दुत्व का सहारा तक लेने में कोई संकोच नहीं किया। इसका फायदा उन्हें राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मिला जिसके चलते आज वहां कांग्रेस की सरकारें हैं। देश में सबसे बड़े आधार वाले दो राजनीतिक दलöभाजपा और कांग्रेस हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि विपक्ष की ओर से राहुल गांधी अगले प्रधानमंत्री पद के दावेदार होते। कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता तो उन्हें अगले प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानते हैं। राहुल इसके लिए कड़ी मेहनत भी कर रहे हैं। राफेल का मुद्दा मजबूती से संसद के अंदर और बाहर उठाकर उन्होंने विपक्ष को अपने पीछे लामबंद करने का प्रयास भी किया है। लेकिन तृणमूल अध्यक्ष ममता बनर्जी उनका शीराजा बिखेरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही हैं। उनकी कोशिश है कि उन्हें विपक्ष के मजबूत नेता के रूप में पहचान मिले। इसी लक्ष्य के तहत उन्होंने कोलकाता में सियासी जमावड़ा किया था जिसमें कांग्रेस, सपा और बसपा की ओर से राहुल, अखिलेश और मायावती जैसे बड़े नेता तो नहीं पहुंचे थे लेकिन उन्होंने अपने प्रतिनिधियों को भेज दिया था। इन तीन बड़े नेताओं के न पहुंचने से इस गठबंधन के बनाने में आने वाली दूरियां देश के सामने स्पष्ट रूप से आई थीं। कांग्रेस के लिए चुनाव से पहले किसी और दल के नेता को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मानना बेहद कठिन है क्योंकि यह बिना लड़े हथियार डालने जैसी स्थिति होगी। उधर अखिलेश के लिए भी मुश्किलें कम नहीं हैं। मायावती से चुनावी समझौता होने के बाद उनके लिए यह आसान नहीं है कि वह इसके लिए राहुल या ममता में से किसी एक का समर्थन कर सकें। फिर सवाल उठता है कि जब कांग्रेस, सपा और बसपा को ममता विपक्ष की सर्वमान्य नेता के तौर पर मंजूर नहीं हैं तो उनकी बुलाई रैली में उनके प्रतिनिधि क्या करने गए थे। दरअसल कांग्रेस भविष्य की चुनावी संभावनाओं के मद्देनजर मेलजोल बनाए रखना चाहती हैं। क्योंकि वह जानती है कि सरकार बनाने के लिए उसे क्षेत्रीय दलों की मदद लेनी होगी लेकिन वह कर्नाटक जैसा हाल नहीं चाहती जहां उसने ज्यादा संख्या होते हुए भी महज 37 सीटें जीतने वाले जनता दल (एस) को समर्थन दिया था।

जिसके परिणामस्वरूप कुमार स्वामी मुख्यमंत्री बने। उधर ममता के नेतृत्व में कई क्षेत्रीय दलों की रणनीति है कि भविष्य में केंद्र में सरकार बनाने का मौका आने पर कांग्रेस को उन्हें समर्थन देने के लिए यह कहते हुए मजबूर किया जाए कि सांप्रदायिक दलों को केंद्र की सत्ता में आने से रोकना है। सार्वजनिक रूप से यह दल कुछ भी कहें लेकिन अंदरखाने यह क्षेत्रीय दल दोनों राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस को अपने लिए खतरा मानते हैं। यह स्थिति दोनों गठबंधनों में है। राजग में शिवसेना और ओपी राजभर की पार्टी का रवैया किसी से छिपा नहीं है। दूसरी तरफ सपा-बसपा ने अपने समझौते से कांग्रेस को बाहर रखा जबकि राजद उसे बिहार में उतनी सीटें देने को तैयार नहीं है जितनी कांग्रेस चाहती है। यही वजह है कि कांग्रेस ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए प्रियंका गांधी को मैदान में उतार दिया। कांग्रेस को यह भी उम्मीद है कि वक्त आने पर लेफ्ट, सपा, बसपा और डीएमके उसके साथ खड़ी दिखाई देगी। उधर कई क्षेत्रीय दल ममता के पीछे खड़े हैं इसलिए अपना दावा मजबूत करने और कांग्रेस के खेल को खराब करने के लिए ममता बनर्जी कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से सीबीआई की पूछताछ मामले को तूल देते हुए धरने पर बैठ गईं।

आने वाले समय में हो सकता है कि राहुल और ममता को मोदी के खिलाफ कम और एक-दूसरे के खिलाफ ज्यादा पसीना बहाना पड़े। राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जल्दी मरती नहीं हैं बल्कि सही वक्त का इंतजार करती हैं। पश्चिम बंगाल में यदि तृणमूल कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया तो ममता कांग्रेस के लिए स्थायी सिरदर्द साबित होंगी।

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