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छापामारी और गिरफ्तारी को लेकर महाराष्ट्र पुलिस का दावा स्तब्धकारी

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2018-09-02 15:05:50.0

छापामारी और गिरफ्तारी को लेकर महाराष्ट्र पुलिस का दावा स्तब्धकारी

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आदित्य नरेन्द्र

पिछले कई दशकों से जो लोग खुद को भारतीय लोकतंत्र के अगुवा और रक्षक के रूप में पेश करते आए हैं कम से कम उनके लिए 28 अगस्त को कुछ कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी स्तब्ध करने वाली होनी चाहिए। उनकी गिरफ्तारी की कोशिश के दौरान सुप्रीम कोर्ट का रुख और उसके बाद शुक्रवार को मीडिया के सामने महाराष्ट्र पुलिस के महानिदेशक द्वारा पेश किए गए सबूत आम आदमी को उलझाते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र पुलिस के पास आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत नहीं थे इसीलिए कोर्ट ने उनका ट्रांजिट रिमांड मंजूर करने की बजाय उन्हें एतिहातन घर में नजरबंद करने का आदेश दिया है। वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) परमवीर सिंह ने मीडिया के सामने जो खुलासे किए हैं वह बेहद चौंकाने वाले होने के साथ-साथ हमारे लोकतंत्र के लिए भी एक बड़ा खतरा दिखाई देते हैं। उल्लेखनीय है कि 28 अगस्त को महाराष्ट्र पुलिस ने कई राज्यों में कुछ कथित वामपंथी कार्यकर्ताओं के घरों पर छापा मारकर पांच लोगों को अरेस्ट किया था जिनमें वरवरा राव, वेरनन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखां जैसे बड़े नाम शामिल हैं। पिछले साल 31 दिसम्बर को यलगार परिषद के कार्यक्रम के बाद पुणे के समीप भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा की जांच के दौरान इनके घरों पर छापामारी की गई थी और इन्हें गिरफ्तार किया गया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद इनकी गिरफ्तारी 6 सितम्बर तक के लिए नजरबंदी में बदल गई। आगामी 6 सितम्बर को महाराष्ट्र पुलिस के सबूतों को देखकर कोर्ट फैसला करेगी कि आगे क्या किया जाना चाहिए। मीडिया से बात करते हुए महाराष्ट्र पुलिस के इस आला अधिकारी ने आरोपियों के घर छापामारी के दौरान कई अहम दस्तावेज बरामद करने का दावा किया। उन्होंने बताया कि गिरफ्तार कार्यकर्ताओं में से एक रोना विल्सन और एक अन्य माओवादी नेता के बीच एक ई-मेल में राजीव गांधी की हत्या जैसी घटना के जरिये मोदी राज खत्म करने के बारे में कहा गया है। यदि यह दावा सत्य है तो यह स्तब्धकारी है। इसलिए इस बात की भी जांच जल्द से जल्द होनी चाहिए कि इसमें कोई विदेशी लिंक तो शामिल नहीं है। श्री सिंह ने इस पत्र में ग्रेनेड लांचर, राइफल्स और चार लाख गोलियां खरीदने के लिए 8 करोड़ रुपए की जरूरत पड़ने का भी जिक्र किया है। यह खुलासा बेहद चौंकाने वाला है। हालांकि बिना ठोस सबूतों के इन कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से देश में कोई भी सहमत नहीं हो सकता। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यह मामला बेहद गंभीर है। देश को इसकी अंतिम तह तक जाना होगा। पुलिस द्वारा पेश तर्कों और सबूतों से ऐसा लगता है कि जातीय टकराव को बढ़ावा देकर माहौल बिगाड़ा जा रहा है ताकि सत्ता के खिलाफ तख्तापलट की साजिश को अंजाम दिया जा सके। बताया जाता है कि इसके लिए कुछ कार्यकर्ता मणिपुर और नेपाल के कुछ हथियार सप्लायरों के सम्पर्प में भी थे। अब यह दावे सुप्रीम कोर्ट के सामने अगली सुनवाई के दौरान तभी टिक पाएंगे जब इनमें कुछ दम होगा। महाराष्ट्र पुलिस का कहना है कि इस मामले में बेहद सावधानी से सबूत एकत्रित किए जा रहे हैं। एविडेंस को टेम्पर्ड नहीं किया गया और सारे सबूत फोरेंसिक लेबोरेटरी को भेजे गए हैं जिससे उनकी विश्वसनीयता प्रभावित न हो। उधर आरोपियों के पक्ष में कहा जा रहा है कि आपातकाल जैसे हालात पैदा किए जा रहे हैं। जो लोग हाशिये पर रह रहे लोगों के लिए काम करते हैं उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया है। बिना तथ्य और सबूत के पुणे पुलिस ने नागरिकों की स्वतंत्रता पर हमला किया है। अब इनमें से कौन-सा पक्ष सही है इसका फैसला अदालत करेगी। मामला अदालत में होने के चलते अभी इस पर कुछ भी टिप्पणी करना सही नहीं होगा। फिर भी यदि महाराष्ट्र पुलिस के पास इनके खिलाफ कुछ ठोस सबूत हैं तो इसे उनकी बड़ी कामयाबी मानने में संकोच नहीं होना चाहिए। मानवाधिकार का मुखौटा पहनकर नक्सलवाद को समर्थन देने के आरोपों की सच्चाई देश के सामने जितनी जल्दी आए यह उतना ही अच्छा होगा।

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