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एससी/एसटी एक्ट पर विस्फोटक स्थिति

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:6 Sep 2018 3:29 PM GMT
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राजनाथ सिंह `सूर्य

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति जनजाति उत्पीड़न निवारण कानून के पावधान पाथिमिकी दर्ज होने के साथ ही गिरफ्तारी को संशोधित कर जांच के बाद गिरफ्तारी किए जाने को संसद ने सर्वसम्मति से रद्द कर पूर्ववत स्थिति जारी रखने का इस बार जो किया है उससे देश में विस्फोटक स्थिति बनती जा रही है। जिस पकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद पूरे देश में संसद और संसद के बाहर दलित समर्थक उग्रतायुक्त होकर सड़क पर उतर आये थे संभवतः उसने सभी राजनीतिक दलों को भयभीत कर दिया था। यथास्थिति बनाए रखने का संशोधन सर्वसम्मति से इसलिए किया गया टकराव और बिखराव को टाला जा सके तथा दलित वर्ग को बरगलाने वालें की साजिश को नाकाम किया जा सके। दलित वर्ग इस संशोधन से खुश जरूर हुआ है लेकिन संतुष्ट नजर नहीं आ रहा है। इस कानून के अंतर्गत दायर वादों की समीक्षा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि लगभग 75 पतिशत मामले फर्जी हैं। अतः संसद द्वारा किया गया संशोधन तुष्टिकरण न हो यह नहीं कहा जा सकता। सवर्ण और पिछड़ा वर्ग के लोग इसके विरोध में सड़कों पर उतर आये हैं। पहली बार अपने उत्पीड़न वाले कानून के विरोध में इतने लोगों में दलित आंदोलन के समान उसने हिंसात्मक रुख नहीं अपनाया है और आंदोलन अनुशासित दिखाई पड़ रहा है लेकिन जिस पकार आक्रोश पकट हो रहा है इस आंदोलन के हिंसात्मक हो जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यद्यपि संसद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को सर्वसम्मति से संशोधित किया है लेकिन मुख्य रूप से इसके लिए भारतीय जनता पार्टी को दोषी "हराया जा रहा है। संसद में किसी एक भी सदस्य ने इस संशोधन के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। यह स्थिति अटल बिहारी वाजपेयी के पधानमंत्रित्वकाल के पोन्नति को गैर-कानूनी घोषित किए जाने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को अपभावी बनाने वाले उस संशोधन के समान हो रहा है जिसे सदन में सर्वसम्मति से पारित किया गया था। लेकिन उसका परिणाम भाजपा को भुगतना पड़ा था। वाजपेयी जी के व्यक्तित्व और लोक कल्याण की पतिबद्धतायुक्त सरकार के निर्णयों से होने वाले सुशासन को पभावित होने के बावजूद मध्यम वर्ग इस से अलग होकर हार का कारण बना था। यही मध्यम वर्ग इस बार भी मुखरित हो गया है। 2004 में उसने मौन होकर वोट के माध्यम से अपना रोष पकट किया था। इस बार वह सड़कों पर भी उतर आया है। पधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे लोकपिय नेता हैं और आर्थिक सुधारों की मजबूती और लोक कल्याणकारी योजनाओं का वंचितों को सीधे मिलने वाले लाभ के बावजूद तथा मध्यम वर्ग नोटबंदी व सेवा एवं वस्तुकर की क"िनाइयों को झेलते हुए जिस पकार उनके पति आस्थावान बना रहा है। वैसा ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने वाले संशोधन के बाद भी रह सकेगा। यह एक बड़ा प्रश्न है क्योंकि अभी पोन्नति में आरक्षण का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और जानकार यह संभावना व्यक्त कर रहे हैं कि न्यायालय पूर्व के समान इस व्यवस्था में बदलाव का निर्णय कर सकता है।

एक ओर सरकार का यह दावा है कि गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या में भारी कमी हुई है दूसरी ओर वंचित रहने का दावा करने वालों की कतार लंबी होती जा रही है। संविधान बनते समय इस आरक्षण को वंचित लोगों के लिए संरक्षण के रूप में अल्पावधि के लिए अंगीकार किया गया था उसे अधिकार के रूप में चिरस्थाई बनाते जाने के कारण समाज का अब शायद ही कोई ऐसा वर्ग रह गया हो जो इस कतार में न खड़ा हो गया हो। संविधान के पस्तोता डॉ. भीमराव अम्बेडकर की सहमति सेवाआंs और शिक्षा संस्थाओं में आरक्षण के लिए नहीं थी। इसी लिए यह पाविधान 10 वर्ष के लिए किया गया था। पथम पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष काका साहेब कालेलकर ने अपना पतिवेदन पस्तुत करते समय राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र पसाद को जो अपना पत्र लिखा था उसमें चेतावनी दी गई थी कि यदि जाति आधारित आरक्षण की नीति अपनायी गई तो इसके आगे चलकर भयावह परिणाम होंगे। अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण जाति आधारित है और अब मुसलमान ईसाई सहित कुछ अन्य संप्रदाय भी मजहब आधारित आरक्षण के लिए जहां मुखरित हैं जिसे सर्वोच्च न्यायालय कई बार निरस्त कर चुका है। वहीं कुछ सम्पन्न जातियां आरक्षण के लिए देशभर में आंदोलित हैं। जाट गूजर पाटीदार उनमें पमुख हैं। आरक्षण संरक्षण के बजाय वोट बैंक की राजनीति का अंग बन गया है। जिसे जहां मौका मिलता है वह बिना संगत तर्प के वोट बैंक वालों के उकसावे में आकर भावनात्मक शोषण का शिकार बन रहा है।

हमारे संविधान में सभी नागरिकों में समानता की पतिबद्धता सुनिश्चित की गई है। एक व्यक्ति एक वोट जो राष्ट्रपति से लेकर गांव के चौकीदार तक लागू है हमारी अन्य व्यवस्थाओं का आधार नहीं बन रहा है। गरीबी या पिछड़ेपन में व्यक्ति को आधार बनाने के बजाय समूह को आधार बनाए जाने का परिणाम विभेदकारी साबित हो रहा है। वंचित और सिंचित की पहचान का यह स्वरूप जातीयता की जकड़न को बढ़ा रहा है। वे संग"न और नेता जो जातीयता को विशमता का विषवृक्ष मानते हैं उनमें जातियता की जकड़न का दुराग्रह कलह के रूप में पकट हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय और विचारवान लोगों ने कई बार सरकार से अपेक्षा पकट की कि वह वंचित की पहचान गरीबी के आधार पर करें। किन्तु वोट बैंक की राजनीति इस सिद्धांत को बाधित करने का काम कर रही है।

यद्यपि वर्तमान पधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबका साथ और सबका विकास की नीति पर अमल करते हुए गरीबी की पहचान को पाथमिकता पदान की है तथापि वोट बैंक की राजनीत के पभाव में आकर निर्णय लेने के लिए वह भी बाध्य हो रहे हैं। वंचित और सिंचित का जो संघर्ष इस समय जिन संशोधनों के कारण दिखाई पड़ रहा है वही वाजपेयी जी के पधानमंत्रित्व काल में भी पभावशाली बना था और इसके जो वाहक वाजपेयी मंत्रिमंडल के सदस्य बने थे वे नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में भी शामिल हुए।

2004 के पहले वे वाजपेयी जी का साथ छोड़ गए थे। नरेंद्र मोदी का भी साथ छोड़ेंगे या नहीं इस पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। देश का हित इस बात में निहित है कि वंचित और सिंचित की पहचान में व्यक्ति या परिवार को आधार बनाकर चला जाए। यदि एक ही समूह में वंचित और सिंचित दोनों रहेंगे और उन्हें वंचित माना जाएगा और दूसरे समूह में भी वंचित और सिंचित रहेंगे और उन्हें समूह के रूप में वंचित के लाभ से वंचित रखा जाएगा तो विद्वेष बढ़ता जाएगा। इसलिए यह आवश्यक है कि राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति करने की बजाय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और संविधान की मंशा एक देश एक जन की भावना के आधार पर वंचित और सिंचित का निर्णय करें अन्यथा देश विरोधी ताकतें समूहगत विद्वेष उभारकर अराजकता फैलाने के अपने पयास में सफल हो जाएंगी। इन शक्तियों द्वारा समूहों को भड़काने के पमाण की जरूरत नहीं है क्योंकि वह पत्यक्ष हैं।

(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं।)

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