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मूर्तियों की नहीं, मुद्दों पर बात जरूरी

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2018-12-02 15:13:52.0

मूर्तियों की नहीं, मुद्दों पर बात जरूरी

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आदित्य नरेन्द्र

लगभग एक महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात में देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया तो मन सहर्ष ही गर्व से भर गया क्योंकि यह एक उपलब्धि भारत के खाते में दर्ज हो गई थी। वह एक ऐतिहासिक क्षण था जिसे हर भारतीय ने महसूस किया होगा। लेकिन इसके साथ-साथ जिस तरह की बातें की जा रही हैं या जिस तरह से राजनेताओं के बयान आ रहे हैं उससे बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनाने की एक अंधी दौड़ के शुरू होने का खतरा पैदा होता दिख रहा है। यह स्थिति उस समय और भी खतरनाक महसूस होती है जब इसे धर्म, जाति, क्षेत्र या वर्ग से जोड़ने का प्रयास करते हुए ऐसी प्रतिमाओं की वकालत की जा रही हो।

दरअसल मूर्तियों पर पहली बार उस समय जोरशोर से चर्चा हुई थी जब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बसपा नेत्री मायावती ने कुछ मूर्तियां लगवाई थीं। इनमें उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की झलक भी दिखाई दी थी। उस समय उनके विरोधियों ने इसे सार्वजनिक धन की बर्बादी तक करार दे दिया था। लेकिन सरदार पटेल की मूर्ति के सामने आते ही एक बार फिर यह चर्चा गरम होने लगी है। महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी और उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम की ऐसी बड़ी और भव्य मूर्तियां बनाने की चर्चा की जा रही है जो सरदार पटेल की मूर्ति की ऊंचाई और उसकी भव्यता को भी पीछे छोड़ दें। इन दोनों प्रोजेक्टों के पीछे तो स्थानीय राज्य सरकारें हैं लेकिन कई अन्य स्तरों पर भी अन्य भव्य मूर्तियों की चर्चा की जा रही है। इनमें इटावा, उत्तर प्रदेश और दक्षिण भारत में बनाई जाने वाली मूर्तियों की चर्चा स्थानीय स्तर पर स्थानीय राजनेताओं द्वारा की जा रही है। जाहिर है यह उनकी स्थानीय राजनीति का हिस्सा है। ऐसा नहीं है कि यह बातें अपने-अपने राजनीतिक स्तर पर अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए ही की जा रही हों। राजनीतिक नेताओं एवं कार्यकर्ताओं से इतर भी मूर्तियों को लेकर कुछ अन्य प्रयास चल रहे हैं। इसमें राजस्थान के नाथद्वारा में बन रही 351 फुट ऊंची शिव की प्रतिमा भी शामिल है। बताया जा रहा है कि शिव की सबसे ऊंची यह प्रतिमा सीमेंट व कंक्रीट से बनाई जा रही है जो दुनिया की चौथी और भारत की दूसरी सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। इसका 85 फीसदी निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और मार्च 2019 तक इसके पूरा हो जाने की संभावना है। सरदार पटेल की प्रतिमा के उद्घाटन अवसर पर कहा गया था कि इससे इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। पिछले एक महीने में यह बात सही साबित हुई है क्योंकि लाखों की संख्या में पर्यटक विश्व की इस सबसे ऊंची प्रतिमा को देखने के लिए पहुंचे हैं। इसमें देसी-विदेशी दोनों तरह के पर्यटक शामिल हैं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इसके साथ विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा का टैग लगा हुआ है। अब जरा सोचिए कि अयोध्या में जब भगवान श्रीराम की मूर्ति इससे भी अधिक ऊंची बनाई जाएगी तो जिन लोगों को विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति का दीदार करना होगा तो वो गुजरात जाएंगे या अयोध्या जाएंगे। यकीनन वह लोग अयोध्या जाएंगे। लेकिन बात सिर्प इतनी सी नहीं है। असल बात यह है कि इन मूर्तियों को लेकर चल रही चर्चा में कई दूसरे जरूरी मुद्दों के खो जाने का खतरा पैदा हो गया है। आज देश के सामने बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, बेरोजगारी और महंगाई जैसे अहम मुद्दे मुंह बाएं खड़े हैं। चूंकि भारत एक विकासशील देश है इसलिए जरूरी है कि यहां की केंद्र और राज्य सरकारें बेहद सावधानी के साथ जरूरी मुद्दों को प्राथमिकता दें। भारत विविधताओं से भरा देश है। यहां अलग-अलग संस्कृति, धर्म, जाति, वर्ग व क्षेत्र के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं। सबकी अपनी-अपनी प्रेरणाएं व मान्यताएं हैं। ऐसे में यहां भविष्य में अनगिनत मूर्तियां बनाने की मांग उठ सकती है। यदि ऐसा हुआ तो इनके लिए बजट कहां से आएगा। क्या यह उचित नहीं होगा कि मूर्तियों की बजाय मुद्दों पर बात की जाए ताकि हम सरदार पटेल की मूर्ति की तरह विकास के मामले में भी विश्व में नम्बर एक बन सकें।

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