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फिलहाल राम मंदिर पर अध्यादेश नहीं

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2 Jan 2019 3:20 PM GMT
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सुशील कुमार सिंह

राम मंदिर पर कानूनी पक्रियाओं का ही पालन करेंगे यह बात नए वर्ष के आगाज के साथ पधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कर दी है। जाहिर है अध्यादेश के माध्यम से मंदिर की चाह रखने वालों को झटका लगा होगा। वृहद बातचीत में जिस पकार मोदी ने नोटबंदी, जीएसटी, विपक्ष के महाग"बंधन, कश्मीर में घुसपै", सर्जिकल स्ट्राइक व रिजर्व बैंक समेत दर्जनों विषयों पर अपने विचार रखें उसमें मंदिर से जुड़ा मामला भी था। जिसे लेकर यह कयास लगाए जा रहे थे कि सरकार अध्यादेश द्वारा इस दिशा में कदम बढ़ाएगी। इस बात का दबाव बीते कई महीनों से सरकार पर बनाया जा रहा था पर मोदी ने इस पर दो टूक बोलकर एक नए विमर्श को जन्म दे दिया है। गौरतलब है कि सुपीम कोर्ट राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मालिकाना विवाद मामले में याचिकाओं पर 4 जनवरी से सुनवाई करेगा। माना जा रहा है चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली तीन जजों वाली बेंच मामले की सुनवाई करेगी। इस समय संसद का शीत सत्र चल रहा है जो 8 जनवरी को समाप्त होगा। संविधान के निहित संदर्भों को देखें तो सत्र न चलने की स्थिति में अध्यादेश जारी किया जा सकता है। साधु-संतों समेत विश्व हिन्दू परिषद यहां तक कि आरएसएस व अन्य संग"न की यह चाहत थी कि मोदी सरकार मंदिर निर्माण हेतु अध्यादेश लाए पर इन सभी पर पानी फिर चुका है। यह मामला तब तेजी से उ"ा जब सुपीम कोर्ट ने नवम्बर महीने में इस मामले की सुनवाई से इंकार कर दिया और जनवरी के लिए तारीख टाल दी। मोदी के अध्यादेश न लाए जाने का दृष्टिकोण पर विश्व हिन्दू परिषद जैसी संस्थाओं ने अपनी पतिक्रिया देते हुए सरकार को चेताया है कि साढ़े चार वर्ष का वक्त पूरा हो गया है ऐसे में मंदिर निर्माण में अब देरी नहीं है।

खास यह भी है कि चुनाव आते ही राम मंदिर का मुद्दा गर्माने लगता है और इसे लेकर नेताओं के बयानों की बाढ़ भी आ जाती है। जिस तर्ज पर पधानमंत्री ने साफगोही से अध्यादेश लाने से अपने को अलग किया उससे साफ है कि वे अदालत के फैसले के अनुसार इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। हालांकि मोदी ने कहा है कि फैसले का उन्हें इंतजार है। हो सकता है उसके बाद कोई कदम उ"s। पड़ताल बताती है कि 30 नवम्बर 1992 को लाल कृष्ण आडवाणी ने मुरली मनोहर जोशी के साथ अयोध्या जाने का एलान किया था यही से यह मामला तूल पकड़ा। तात्कालीन गृहमंत्री द्वारा 5 दिसम्बर, 1992 को यह ऐलान भी था कि अयोध्या में कुछ नहीं होगा मगर 6 दिसम्बर को मस्जिद का ढांचा ढहा दिया गया जिसकी कीमत भाजपा ने उस समय के 4 राज्यों की सरकार को खोकर चुकाई थी। उत्तर पदेश की कल्याण सरकार तत्काल बर्खास्त कर दी गई जबकि बाकी तीन सरकारों को 15 दिसम्बर तक नेस्तनाबूद कर दिया गया। हालांकि मंदिर ध्वस्त करने के कुछ घंटे बाद ही कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया था। साल बीतते गए मंदिर निर्माण का मुद्दा जस का तस बना रहा। अब एक बार फिर मामला सुपीम कोर्ट में है जिसकी सुनवाई 4 जनवरी से होगी। गौरतलब है सुपीम कोर्ट की पी" अयोध्या विवाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 13 अपीलों पर सुनवाई कर रहा है। इस विवाद के तीन पक्षकार हैं जाहिर है देश की शीर्ष अदालत का फैसला इस संवेदनशील मुद्दों को दिशा देने का काम करेगी। खास यह भी है कि तीन दशक से इस पर राजनीति हो रही है और अभी भी उतनी ही जिताऊ राजनीति के रूप में मंदिर मसला देखा जा रहा है। मोदी सरकार को 2019 में 17वीं लोकसभा में अपनी सरकार को पुनर्स्थापित करने के लिए क"ाsर मेहनत करनी पड़ रही है। कइयों का मानना है कि यदि मोदी मंदिर निर्माण की दिशा में अध्यादेश लाते तो जीत भी सुनिश्चित थी और मोदी इसे न्यायालय के तहत देख रहे हैं जबकि आरएसएस पमुख मोहन भागवत पहले ही कह चुके हैं कि अयोध्या में राम मंदिर विवाद का मामला सुपीम कोर्ट की पाथमिकता में नहीं है तो मंदिर निर्माण के लिए सरकार को कानून लाना चाहिए।

दशकों पुराना राम मंदिर का मुद्दा बेशक 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर गूंजेगा पर समझने वाली बात यह है कि सियासी तौर पर इसके नफे-नुकसान को लेकर जो विमर्श हैं उससे देश का क्या भला होने वाला है। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर इन दिनों कई संग"न आवाज बुलंद कर रहे हैं। इसमें कोई दुविधा नहीं कि राम मंदिर पर राजनीति खूब हुई है पर गंभीर मसला यह है कि इस राजनीति से किसको फायदा हुआ है। बेशक भाजपा इसके सहारे सत्ता हथियाने का इरादा रखती है पर यही भाजपा 2014 की लोकसभा में मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार और अपने तथाकथित वादे-इरादे के चलते बहुमत की सरकार हासिल की थी जबकि मंदिर निर्माण इतना बड़ा मुद्दा नहीं था। हालांकि इसके पहले कई बार मंदिर मुद्दा रहा पर किसी भी सरकार ने इस बात पर जोर नहीं दिया कि अध्यादेश के सहारे इसको अंजाम दिया जाय। मोदी जानते हैं कि यदि अध्यादेश के सहारे मंदिर निर्माण की पक्रिया में वे आते हैं तो विविधता से युक्त भारत में कइयों की संवेदनशीलता खतरे में रहेगी। समाज एकाएक बंट जाएगा और सरकार पर मनमानी का न केवल आरोप लगेगा बल्कि वर्ग-विशेष स्वयं को असुरक्षित भी समझने लगेंगे। इतना ही नहीं दुनिया के मुस्लिम देशों समेत अन्यों में यह संदेश भी जा सकता है कि मोदी ने अपने देश के अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय किया है और पक्षपातपूर्ण निर्णय करने के लिए जाने जाएंगे। बीते साढ़े चार सालों में मोदी ने विदेश में बहुत नाम कमाया है। भारत को समरसता के अंतर्गत न केवल दुनिया में परोसा है बल्कि अल्पसंख्यकों के चिंतक के तौर पर स्वयं को ढाला भी है। उक्त संदर्भों को देखते हुए अध्यादेश से मंदिर मार्ग का रास्ता लेना मोदी को शायद ही भाता इसलिए उन्होंने अपने मन की बात कह दी। जाहिर है इस पर सियासत होगी, संग"न नाराज होंगे पर संविधान के रास्ते मंदिर निर्माण की चाह रखने के लिए मोदी को कई महत्व भी देंगे और सराहेंगे भी। हालांकि इसका एक सियासी कारण भी हो सकता है एनडीए में कई घटक ऐसे हैं जो मंदिर निर्माण को अदालत के अलावा रास्ता अख्तियार करने पर नाराज हो सकते हैं। सरकार यहां भी उन्हें यह संदेश दे रही है कि जो कानून सम्मत है उसी पर वे चलेंगे बेवजह की ताकत लगाने से वे दूर रहेंगे।

फिलहाल मंदिर मसले को लेकर अब गेंद सुपीम कोर्ट के पाले में है। 1992 के बाद 2019 एक ऐसा वर्ष होगा जब एक बार फिर अयोध्या किले में तब्दील होगी। योगी सरकार फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या कर चुकी हैं और जितना बन पड़ रहा है वे अयोध्या के लिए कर भी रहे हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद मंदिर विवाद का हल तीन दशकों से नहीं निकल पाया हलांकि यह मामला सबसे पहले 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अदालत में गया था और आजादी के बाद से इस पर न्याय की कई गुहार लगाई गई। अब शायद अंतिम क्षण में है। मंदिर और मस्जिद दोनों की चाह रखने वाले बरसों से जद्दोजहद और मुकदमे में फंसे लोग कई इस दुनिया से जा चुके हैं और कई अभी भी न्याय की बाट जोह रहे हैं। खास यह भी है कि मंदिर आस्था का विषय है जिस पर राजनीति करने से रोका जाता है पर दो टूक यह है कि इसी पर बरसों से जमकर राजनीति भी हो रही है।

(लेखक प्रयास आईएएस स्टडी सर्पिल, देहरादून के निदेशक हैं।)

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