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मतपत्रों से चुनाव कराने की दकियानूसी मांग

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2019-02-06T21:08:36+05:30
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संतोष कुमार भार्गव

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। इस बार विदेशी जमीन से दावे किए गए हैं कि भारत में ईवीएम को हैक किया जा सकता है। यह कैसी विडंबना है कि देश के 17 राजनीतिक दल चुनाव आयोग से मतपत्रों के माध्यम से चुनाव कराने की मांग करने जा रहे हैं। इसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के राजनीतिक दलों की फ्रतिगामी सोच ही माना जा सकता है। इस सोच के पीछे जो कारण बताया जा रहा है वह है इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से छेड़छाड़ की संभावनाएं। मजे की बात यह है कि जो दल हारता है वहीं इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की विश्वसनीयता पर फ्रश्न उ"ाता है। यदि आशानुकूल सीटें मिल जाती हैं तो उस राज्य या स्थान पर ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर कोई फ्रश्नचिन्ह नहीं उभारा जाता है। इसका सीधा-सीधा मतलब मी"ा-मी"ा गप्प, खट्टा-खट्टा थू वाली कहावत चरितार्थ होना है।

कुछ उदाहरण भी दिए गए हैं। मसलन 2014 के लोकसभा चुनाव में ईवीएम में धांधली की गई। सवाल है कि तब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार थी और धांधली के बावजूद कांग्रेस पार्टी बुरी तरह पराजित हो गई? 2015 के दिल्ली चुनाव हैक कराए गए। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस के हिस्से `शून्य' आया और भाजपा के भी मात्र 3 विधायक जीत कर आ पाए। सत्ता आम आदमी पार्टी (आप) के नौसीखिया संग"न को हासिल हुई। हालिया दावा यह किया गया है कि मफ्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान में ट्रांसमिशन को पकड़ा गया और डाटा को बदलने से रोका गया। नतीजतन ईवीएम हैक नहीं की जा सकी। सवाल है कि यह सब किसने किया और किसके निर्देश पर किया? यह भी दावा किया गया है कि रिलायंस जियो कंपनी डाटा को हैक कर सकती है। वह भाजपा की मदद करती है।

ये तमाम दावे साइबर एक्सपर्ट सैयद शुजा ने किए हैं, जो भारत को `फर्जी लोकतंत्र' करार देने की विदेशी साजिश का फ्रमुख सूत्रधार लगता है। उसने चेहरे पर कंबल-सा डाल कर गंभीर आरोप लगाए कि भाजपा, कांग्रेस ही नहीं, सपा-बसपा और `आप' भी ईवीएम हैकिंग कराती रही हैं। जिस आयोजन के दौरान ये संगीन आरोप भारत के चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए गए, उसमें भारत सरकार के पूर्व कानून मंत्री एवं मौजूदा राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल भी मौजूद थे और मुस्कराकर पूरे कार्यक्रम को देखते-सुनते रहे! उनकी मौजूदगी के मायने क्या हैं? सवाल इसलिए भी उ"ता है, क्योंकि यह आयोजन लंदन में आशीष रे की `इंडियन जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन' के सौजन्य से किया गया। आशीष कांग्रेसी अखबार `नेशनल हेराल्ड' में लिखते रहे हैं।

कानून एवं आईटी मंत्री रविशंकर फ्रसाद ने उन्हें `समर्पित कांग्रेसी' करार दिया है। यह फ्रकरण सामने आने के पहले विपक्ष के `ब्रिगेड समावेश' के दौरान डॉ. फारुक अब्दुल्ला ने ईवीएम को `चोर मशीन' करार दिया था और कई दलों ने आवाज उ"ाई थी कि 2019 के चुनाव मतपत्रों (बैलेट पेपर) के जरिये कराए जाने चाहिए। हालांकि चुनाव आयोग ने ईवीएम से जुड़े तमाम आरोपों को खारिज कर दिया है, लेकिन लंदन से आरोपों का जो झंझावात चला है, उसने हमारे लोकतंत्र को धूमिल करने का फ्रयास किया है। यह फ्रकरण राष्ट्रीय सरोकारों का है। सवाल यह है कि क्या विदेशी जमीन पर रची गई साजिश का हिस्सा कांग्रेस भी है? क्या भारत को विदेश में बदनाम करके चुनाव जीता जा सकता है? जो तथ्य सामने आए हैं, उनके मद्देनजर शुजा `फ्रॉड' लगता है। ईवीएम बनाने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी `इलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन ऑफ इंडिया' (ईसीआईएल) ने साफ कहा है कि 2009-14 के दौरान शुजा ने कंपनी में कोई भूमिका नहीं निभाई। उसने कंपनी में काम ही नहीं किया। तो वह किसी भी टीम का हिस्सा कैसे हो सकता था? हैदराबाद के शादान इंजीनियरिंग कॉलेज के फ्राचार्य ने भी कहा है कि शुजा उनके संस्थान का छात्र नहीं था। तो क्या हैकर शुजा भारतीय लोकतंत्र के लिए `सुपारीबाज' है? चुनाव आयोग ने दिल्ली पुलिस में फ्राथमिकी दर्ज कराने का उचित निर्णय लिया है। बल्कि भारत सरकार को शीर्ष स्तर पर जांच बि"ानी चाहिए।

दरअसल हारने वाले दलों को देश के आम मतदाता पर विश्वास है ही नहीं। उत्तर फ्रदेश में भाजपा की विजय के बाद ईवीएम को लेकर अधिक फ्रश्न उ"ाए गए। हालात यहां तक हुए कि चुनाव आयोग को ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उ"ाने वालों को खुली चुनौती देने को बाध्य होना पड़ा। परिणाम सबके सामने है। पिछले साल कर्नाटक और हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव चुनाव परिणामों को लेकर ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उस गर्मजोशी से नहीं उ"s जो पहले उ"ाए जाते रहे हैं। ऐसे में फ्रश्न यह उ"ता है कि राजनीतिक दलों की ईवीएम को लेकर इतनी बौखलाहट क्यों है? ऐसे में यह फ्रश्न भी उभरता है कि कुछ राजनीतिक दलों को अभी से ही लगने लगा है कि चुनावों में उनकी पराजय निश्चित है। ऐसे में ईवीएम या चुनाव आयोग के सिर पर "ाrकरा अभी से फोड़ने की कवायद शुरू हो गई है।

आज कांग्रेस समेत कई दल ईवीएम पर छेड़छाड़ का आरोप लगा रहे हैं। इतिहास में झांके तो 2009 में हार के बाद भाजपा (एनडीए) ने बाकायदा इसके खिलाफ अभियान चलाया था। चुनावों के नतीजे सामने आते ही वरिष्" भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ईवीएम के जरिये चुनावों में धांधली का आरोप लगाया। देश में ये पहला मौका था जब ईवीएम विवादों में आई थी। दूसरी बार गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान स्वामी ने कांग्रेस पर ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप लगाए थे। चुनावों के दौरान भाजपा गुजरात में पहले नम्बर की पार्टी बनी थी, लेकिन स्वामी का कहना था कि अगर कांग्रेस पार्टी ने ईवीएम के साथ छेड़छाड़ नहीं की होती तो भाजपा को गुजरात में 35 सीट और मिल जातीं। इस दौरान स्वामी अपनी शिकायत लेकर सुफ्रीम कोर्ट भी चले गए।

ईवीएम पर बार-बार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। ऐsसे में चुनाव आयोग को भी ईवीएम मशीन से चुनाव को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए आगे आना चाहिए। देश भर में गैर सरकारी संग"नों के सहयोग से जागरुकता और अवेयरनेस अभियान चलाकर आम लोगों को अवगत कराना चाहिए। किसी के भी द्वारा कहीं कोई सुधार की बात की जाती है तो उसे यदि व्यावहारिक व सकारात्मक है तो निःसंकोच स्वीकारना भी चाहिए। जिस तरह से आज मतदाता मतदान केंद्र पर जाते समय पहचान के लिए किसी राजनीतिक दल की परची पर निर्भर नहीं है उसी तरह से मतदान फ्रक्रिया में राजनीतिक दलों की पहुंच व फ्रभाव को पूरी तरह से समाप्त किया जाना चाहिए। राजनीतिक दल अपने पक्ष में मतदान के लिए कैंपेन चलाएं, अपनी बात रखें पर मतदान फ्रक्रिया को फ्रभावित नहीं कर सकें इस दिशा में और फ्रयास होने चाहिए। दरअसल होना तो यह चाहिए कि ईवीएम में किसी तरह की खामी है तो उसे दूर करने के उपायों पर विचार मंथन हो। उसे दूर कराने के फ्रयास हों। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव आयोग ने अनवरत फ्रयासों से मतपत्रों से मतदान की फ्रक्रिया से आगे बढ़ते हुए निरंतर सुधार के फ्रयास करते हुए ईवीएम की यात्रा तय की है और अब तो फ्रायोगिक तौर पर चुनिंदा केंद्रों पर वीवीपीएटी का फ्रयोग शुरू कर दिया गया है, उसकी सराहना ही की जानी चाहिए। हमारी चुनाव फ्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यफ्रणाली का ही परिणाम है कि टीएन शेषन आज दुनियाभर में जाने जाते हैं।

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