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अयोध्या की अविवादित भूमि वापस हो

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2019-02-07T20:59:53+05:30
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राजनाथ सिंह `सूर्य'

अयोध्या में राम जन्मभूमि विवादित परिसर की दो एकड़ जमीन के अतिरिक्त राम जन्मभूमि न्यास द्वारा खरीदी गई या दान में पाप्त कुल लगभग 67 एकड़ भूमि को भारत सरकार ने 1993 में बाबरी ढांचा गिरने के बाद अधिग्रहित कर लिया था। अधिग्रहित करने का उद्देश्य इस अविवादित भूमि पर होने वाले निर्माण से शांति व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया था। वर्तमान में नरेंद्र मोदी सरकार ने न्यायालय से अविवादित भूभाग को राम जन्मभूमि न्यास को लौटाने की उसी पकार अपील की है जैसा फैजाबाद के तत्कालीन न्यायाधीश की अदालत ने जिलाधिकारी ने परिसर का ताला खोलने की स्थिति में शांति व्यवस्था के लिए कोई खतरा न होने का आकलन पस्तुत करने के बाद किया गया था। अदालत ने ताला खोल दिया और निर्बाध दर्शन होना शुरू हो गया था। राम जन्मभूमि न्यास ने जिस भूमि को दान में पाप्त किया या खरीदा उस पर दक्षिण दिशा में लक्ष्मण मंदिर बनना शुरू हो गया था जो छह दिसम्बर की घटना के बाद भूमि अधिग्रहण किए जाने के कारण अधूरा पड़ा है और निर्मित स्वरूप निरंतर गिरता जा रहा है। न्यास के स्वामित्व वाले इसी भूभाग पर राजीव गांधी के ही पधानमंत्रित्वकाल में शिलान्यास भी हुआ था।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जिस भूभाग में तीन भागों में बांटने का निर्णय दिया है। ढाई एकड़ का वह भूभाग है जिसमें राम चबूतरा, विवादित ढांचा और सीता रसोई थी। अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य स्वरूप खड़ा हो इसके लिए हिन्दू समाज सौ वर्ष से अधिक कानूनी पेंच की उलझन को सुलझाए जाने की पतीक्षा कर रहा है। समय-समय पर समाज की उद्विग्नता को शमन करने के लिए परिसर का ताला खोलने और शिलान्यास कराने के लिए अनिच्छा पूर्वक ही सही केंद्रीय सरकार को पहल करनी पड़ी थी। समाज की उद्विग्नता देखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पधानमंत्रित्वकाल में सर्वोच्च न्यायालय से इस सन्दर्भ में निर्णय की अपील की थी जिस पर सुनवाई करने से न्यायालय ने इंकार कर दिया था।

न्यास द्वारा क्रय की गई भूमि तीन छोटे मंदिर लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के मंदिर बनाना उस योजना में शामिल है। इसके साथ ही न्यास अहर्निस चलने वाली सीता रसोई का भी निर्माण करना चाहती थी जिसमें आने वाले दर्शनार्थियों को भोजन मिलता। इस समय सर्वोच्च न्यायाल में लंबित इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध दाखिल याचिकाओं पर विचार पिछले 10 वर्ष से लंबित है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने 28 दिसम्बर से पतिदिन सुनवाई किए जाने का जो कार्यक्रम निर्धारित किया था उसे वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने अनिश्चित बना दिया है। उनके द्वारा यह कहे जाने के बाद कि यह मसला हमारी पाथमिकता में नहीं है। हिन्दू समाज में रोष व्याप्त हो गया है और वह पहले के समान पतिबंधों की उपेक्षा कर निर्णायक भूमिका की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। भारत सरकार के सामने न्यायालय के रुख और समाज की आकांक्षा के बीच व्यवस्था बनाए रखने के लिए उपाय की आवश्यकता महसूस करना स्वाभाविक है। इसका एकमात्र रास्ता जो सरकार की समझ में आया कि अविवादित भूमि सरकार को लौटा दी जाय। यह पयास संभवतः उसी पकार का है जैसा इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाद लंबित रहते हुए भी परिसर का ताला खुलवाने और शिलान्यास के लिए सहमति दी थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय 1993 में आया। यदि वह निर्णय पहले आ गया होता जिसका पयास किया जा रहा था तो शायद ढांचा गिरने से बच जाता। 06 दिसम्बर 1992 में जिस दिन ढांचा गिरा उस दिन जो लाखों कारसेवक अयोध्या में एकत्रित थे वे अनुशासनबद्ध होकर सरयू में स्नान के बाद वहां का जल और बालू लेकर अविवादित भूभाग पर डालते थे और एक जेसीबी मशीन उसे समतल कर रही थी। अविवादित परिसर और विवादित परिसर के बीच कंटीले लोहे के तार की बाड़ खड़ी थी और घेराबंदी कर कारसेवक भी खड़े थे। परन्तु पानी और बालू डालने की औपचारिकता से कुपित होकर कुछ कारसेवक सारी बाधाओं को तोड़ते हुए विवादित ढांचे पर चढ़ गए और उसे गिरा दिया।

सर्वोच्च न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध दाखिल याचिका पर विचार कर रहा है जो मात्र लगभग ढाई एकड़ भूमि के स्वामित्व तक सीमित है। शेष लगभग 65 एकड़ भूमि के संबंध में कोई विवाद नहीं हैं लेकिन इस मसले में वर्तमान सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का रुख देखते हुए यह कहना क"िन है कि वह भारत सरकार के निवेदन को स्वीकार करेगा। एक ओर सर्वोच्च न्यायालय के रुख में अनिश्चितता है तो दूसरी ओर साधु-संत और हिन्दू समाज कुछ भी हो राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने के लिए और अधिक पतीक्षा करने के मूड़ में नहीं है। सरकार के सामने इस दोनों स्थितियों का सामना करने के लिए अविवादित भूमि को अधिग्रहण से मुक्त कराकर स्थिति को संभालने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। 1993 में जब भूमि अधिग्रहित की गई थी उस समय ढांचा गिरने के कारण मंदिर पक्ष दब गया था और सरकारें भी अनुकूल नहीं थीं। वर्तमान समय में जब न्यायालय कोई निर्णय नहीं कर रहा है और समाज उद्वेलित है अविवादित भूमि को न्यास को सौंप देने के लिए भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से किया गया निवेदन सर्वथा सार्थक पतीत होता है। क्या उच्च न्यायालय परिस्थिति की नाजुकता को समझते हुए इस सन्दर्भ में कोई निर्णय करेगा या फिर मूलवाद के साथ संबद्ध कर उसे टाल देगा। यह ऊहापोह बना हुआ है।

(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं।)

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