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मानेक शॉ की दुर्गति की गई थी

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2019-03-12T20:39:57+05:30
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श्याम कुमार

वर्ष 1971 में पूर्वी पाकिस्तान की भूमि पर हुए युद्ध में भारत की विजय एवं बंगलादेश के निर्माण में वास्तविक श्रेय के अधिकारी सेनाप्रमुख जनरल मानेक शॉ थे, जिन्हें प्यार से 'सैम' कहा जाता था। यह जनरल मानेक शॉ का ही कलेजा था कि तानाशाह की तरह आचरण करने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से एक अवसर पर उन्होंने कह दिया था कि जिस प्रकार वह शासन के मामले में अपनी टांग नहीं अड़ाते, उसी प्रकार सेना की कार्यप्रणाली में इंदिरा गांधी हस्तक्षेप न करें। लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा ने अपनी पुस्तक में मानेक शॉ के बारे में भावुक बातें लिखी हैं और उस विवरण से पता लगता है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उनके प्रति कितना घटिया रवैया अपनाया था। लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा की पुस्तक के कुछ उद्धरण इस प्रकार हैंःö

"एक जनवरी, 1973 को सैम को फील्डमार्शल बना दिया गया। पंद्रह दिन बाद उन्हें सेना प्रमुख का पद छोड़ना था। मैं उस समय एडजुटेंट जनरल के पद पर था और उस क्षमता में मैं चीफ ऑफ पर्सनल आर्मी स्टाफ था। उनके लिए वेतन, अधिकार व नयाचार निर्धारित करने का काम मुझ पर आ गया। हमारे देश में पहली बार एक फील्डमार्शल बना था और हमारे मार्गदर्शन के लिए कोई पूर्व-उदाहरण नहीं था। मैंने ब्रिटेन और यूरोप के अन्य देशों में प्रचलित प्रथा के आधार पर सैम का केस तैयार किया। अमेरिका में फील्डमार्शल नहीं होते, बल्कि इसके बजाय उनके यहां 'फाइव स्टार जनरल' होता है।

"सैन्य अधिकारियों के लिए विशेषाधिकारों और लाभों के संबंध में दिल्ली की नौकरशाही हमेशा की तरह सेनाविरोधी थी। मुझे फील्डमार्शल की छड़ी (बैटन) जुटाने के लिए अनुमोदन प्राप्त करने में बहुत क"िनाई हुई। नौकरशाहों को एक फील्डमार्शल की छड़ी (बैटन) पर कुछ हजार रुपए खर्च करना फिजूलखर्ची लग रही थी। उनका तर्क था कि भारत में फील्डमार्शल उक्त छड़ी के बिना काम चला सकता है। मैंने इतिहास से उदाहरण देते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि प्रशिया के फ्रेडरिक द ग्रेट के समय से छड़ी (बैटन) एक फील्डमार्शल का अनिवार्य साथी होता है। अंत में मैं 'बैटन' के मुद्दे पर कामयाबी पाने में सफल रहा। हमें राष्ट्रपति भवन में एक विशेष अभिषेक समारोह आयोजित करना था, जिसमें राष्ट्रपति द्वारा सैम को छड़ी (बैटन) दी जानी थी। अभिषेक समारोह के लिए नयाचार-संबंधी बात की गई। नौकरशाही फील्डमार्शल को सर्वेच्च लोकसेवक कैबिनेट सचिव से ऊंचा दर्जा नहीं देना चाहती थी। किसी प्रकार मैं कैबिनेट सचिव से अलग फील्डमार्शल के बै"ने की व्यवस्था कराने में सफल रहा। फील्डमार्शल कभी सेवानिवृत्त नहीं होता और जीवनपर्यंत उसे एक सेवारत अधिकारी के समान पूरा वेतन, सचिव संबंधी स्टाफ एवं दूसरी रियायतें मिलती हैं। यहां पर भी नौकरशाही कंजूसी पर उतर आई, जिससे फील्डमार्शल के लिए वेतन नहीं निर्धारित हो सका। सैम को एक जनरल की छोटी-सी पेंशन के अतिरिक्त मात्र चार सौ रुपए प्रतिमाह का विशेष वेतन दिया गया।

"सैद्धांतिक रूप से सेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद सैम एक सेवारत अधिकारी बने रहे। किन्तु वह कुन्नूर में बसकर एक व्यस्त सेवानिवृत्त जीवन बिताने लगे और सरकार का कोई काम हाथ में लेने से इनकार कर दिया। मैं जब भी कुन्नूर जाता था, यदि सैम शहर में मौजूद होते थे तो मैं उनसे मिलना नहीं भूलता था। उनके साथ मेरी आखिरी मुलाकात उनके निधन से कुछ महीने पहले हुई थी। सैम गंभीर रूप से बीमार थे और जीवन-रक्षक उपकरणों पर थे। वह विलिंग्टन के सैनिक अस्पताल में थे और सेना अपनी ओर से बेहतरीन देखभाल कर रही थी। कुछ महीने पहले डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सैनिक अस्पताल में सैम से मिलने आए थे और उनके हस्तक्षेप पर सरकार ने उनके रुके हुए वेतन के बारे में निर्णय किया तथा 35 सालों के बाद उनके वेतन की बकाया राशि का भुगतान किया गया।

"यह वास्तव में सरकार के बहुत खराब रवैये का उदाहरण था। रक्षा सचिव ने विलिंग्टन जाकर सैम की बकाया राशि के रूप में 1.2 करोड़ रुपए का चेक सौंपा, जिसे प्रेस में काफी प्रचारित किया गया। जब मैं अस्पताल में सैम से मिला तो मुझे लगा कि यह हमारी आखिरी मुलाकात हो सकती है। जीवनरक्षक उपकरणों पर निर्भर होते हुए भी सैम बहादुरी से अपनी बीमारी से लड़ रहे थे और उनमें पूरा जोश था। वह मुझे देखकर मुस्कुराए तथा चुटकुले सुनाए। मैंने बकाया मिलने पर उन्हें बधाई दी। सेना में कैबिनेट सचिव को 'बड़ा बाबू' एवं सचिवों को 'बाबू' कहा जाता है। सैम ने मेरे कथन पर कहा कि मैं उनका वेतन 1973 में नहीं निर्धारित करा पाया था, पर एक 'बाबू' ने दिल्ली से आकर उन्हें 1.2 करोड़ रुपए का चेक बकाए वेतन के रूप में दिया। उस चेक को उन्होंने अपने बैंक में भिजवा तो दिया है, लेकिन पता नहीं वह चेक भुनेगा या नहीं।

"27 जून, 2008 को फील्डमार्शल मानेक शॉ का निधन हो गया। सैम के निधन के बाद भी एक देशभक्त के रूप में हम उन्हें उचित सम्मान नहीं दे पाए। उनके अंतिम संस्कार में भारत सरकार के एक राज्यमंत्री, उपसेनाप्रमुख तथा दो स्टार रैंक वाले अधिकारी नौसेना एवं वायुसेना का प्रतिनिधित्व करते हुए शामिल हुए। नौकरशाही का तर्क था कि फील्डमार्शल का दर्जा कैबिनेट सचिव से कम है। ब्रिटेन में जब वहां के पहले फील्डमार्शल ड्यूक ऑफ वेलिंग्टन का, जो वाटरलू लड़ाई के विजेता थे, निधन हुआ था तो उनके अंतिम संस्कार में कई राज्य प्रमुख, सरकार के प्रमुख एवं गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए थे। भारत में हमने अपने पहले फील्डमार्शल एवं बंगलादेश लड़ाई के विजेता के साथ बहुत गलत व्यवहार किया तथा इससे लोगों में असंतोष उत्पन्न हुआ।

"मैं सैम को लगभग सा" सालों से जानता था। सबसे पहले 1946 में उनसे मेरा सम्पर्क हुआ था और उसके बाद विभिन्न रूपों में मैंने उनके नीचे काम किया। भारत के आजाद होने के अगले वर्ष सैम ने ब्रिगेडियर के रैंक में निदेशक का पद संभाला। तब तक मैं मेजर बन चुका था। मुझे अपने सेना के कैरियर में सैम के नीचे काम करने के कई अन्य अवसर मिले। जब सैम ब्रिगेडियर के रूप में सेना के महू स्कूल में, जिसे अब 'आर्मी वार कॉलेज' नाम दिया गया है, प्रमुख थे तथा मैं वहां मेजर के रूप में प्रशिक्षक पद पर था। जब वह सेना प्रमुख बने तो मैंने पहले ब्रिगेडियर तथा उसके बाद मेजर जनरल के रूप में उनके स्टाफ में काम किया। सैम के निधन के बाद दिल्ली छावनी में एक स्मृति सभा का आयोजन किया गया। सैम से मेरे पुराने संबंध को देखते हुए मुझे उक्त स्मृति सभा में मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया। उक्त आयोजन की अध्यक्षता रक्षामंत्री एंटनी ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में सैम का लंबे समय से बकाया वेतन जारी के जाने का श्रेय खुद ले लिया। समारोह के बाद रक्षामंत्री एंटनी ने मेरी यह सराहना करते हुए कि मेरे पास कम्प्यूटर का दिमाग है, मुझसे कहा कि वह मुझे आमंत्रित करेंगे और कई विषयों पर चर्चा करना चाहेंगे। लेकिन एंटनी या उनके स्टाफ की ओर से मुझे कभी बुलावा नहीं आया। उनके पास शायद कश्मीर पर विचार करने के लिए कश्मीर के एक पूर्व-राज्यपाल से परामर्श का समय नहीं था।''

लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा के विवरण से स्पष्ट होता है कि कांग्रेस सरकार देशभक्तों के सम्मान के प्रति कितनी अधिक उदासीन रहती थी। सच्चाई यह है कि कांग्रेस पार्टी पर जब से नेहरू वंश का आधिपत्य हुआ, उस वंश ने नेहरू वंश के लोगों के अलावा अन्य किसी को देश के लिए त्याग करने वाला माना ही नहीं। जबकि सच्चाई यह है कि नेहरू वंश के लोगों ने आधी शताब्दी तक देश की सत्ता पर काबिज रहकर देश के लिए कोई त्याग नहीं किया और जमकर अधिकतम ऐश की एवं भ्रष्टाचार से अपने को मालामाल किया।

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