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आज के नेता पर्रिकर से सबक लेंगे?

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:9 April 2019 3:40 PM GMT
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श्याम कुमार

मैंने गत 14 मार्च को अपने 'वातायन' स्तम्भ में 'मंत्रियों के सोलह गुण माने जाते हैं' शीर्षक आलेख लिखा था कि जिस प्रकार महिलाओं का सोलह श्रं=गार मशहूर है, वैसे ही आज के समय में नेताओं के भी 'सोलह श्रृंगार' मशहूर हो गए हैं। ये 'सोलह श्रृंगार' अहंकार, झू", फरेब, तिकड़म, झांसा, धोखा, स्वार्थ, भ्रष्टाचार, एक्टिंग, ऐश आदि सोलह कलाओं से युक्त होते हैं।

अधिकांश नेता इन कलाओं में निष्णात होते हैं। ऐसी बात नहीं कि श्रेष्" चरित्र वाले नेताओं का पूर्णतः अभाव हो गया है, किन्तु बहुतायत 'सोलह कलाओं' वाले नेताओं की हो गई है। अपने पद के रुतबे की वजह से वे 'कला सम्पन्न' नेता भले ही चरण-वंदना एवं प्रशंसाओं का जमकर सुख भोगते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि वे लोगों के दिलों में श्रद्धा के पात्र कदापि नहीं बन पाते हैं। अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल में एक ऐसे ही तिकड़मी नेता थे, जिन्हें मैं काफी समय से अच्छी तरह जानता था। पांच कालिदास मार्ग पर एक आयोजन चल रहा था, तभी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को उन मंत्री की जो बीमार चल रहे थे, मृत्यु का समाचार मिला। खबर मिलते ही उक्त आयोजन शोकसभा में बदल गया और वक्ताओं ने उन मृत नेता की प्रशंसा करते हुए उनके तमाम अदृश्य गुणों के बखान की झड़ी लगाते हुए उन्हें महान विभूति बताया। मैं वह वृत्तांत सुनकर आश्चर्य में पड़ गया, क्योंकि मैं जानता था कि वह नेता इन गुणों के सर्वथा विपरीत थे।

गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में दिवंगत हुए मनोहर पर्रिकर उपर्युक्त 'सोलह कलाओं' से पूरी तरह विहीन एवं बहुत सीधे-सादे इंसान थे। उनका चरित्र व स्वभाव राजनीति के वर्तमान रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह था। आज के समय में वैसे नेताओं की प्रजाति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। जबकि पुराने समय में ऐसी ही प्रजाति के नेता हुआ करते थे तथा 'सोलह कलाओं' वाले नेता कम पाए जाते थे। लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, राजर्षि टंडन, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. अंबेडकर, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख, डॉ. लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, रफी अहमद किदवई आदि अनगिनत महान नेताओं की बहुतायत थी, जिनके बीच मोतीलाल नेहरू व जवाहर लाल नेहरू जैसे गिने-चुने तिकड़मी नेता अस्तित्व में आ गए थे। देश का दुर्भाग्य हो गया कि नेहरू वंश ने देश में आदर्श राजनीति को पीछे कर तिकड़मी राजनीति की शुरुआत की, जो धीरे-धीरे ऐसी हावी हो गई कि अब वह मुख्यधारा बन गई है। आदर्श राजनीति पीछे चली गई है। स्थिति यह हो गई है कि सशक्त रूप धारण कर चुकी तिकड़मी राजनीति का मुकाबला अब 'लोहा लोहे से कटता है' वाले मुहावरे द्वारा ही संभव हो सकता है। नरेंद्र मोदी इसी का अनुसरण करते हुए अभिमन्यु की तरह कौरव सेना का डटकर मुकाबला कर रहे हैं तथा कौरव सेना के हथियारों से उसे चित कर रहे हैं।

मनोहर पर्रिकर से मेरी पहली भेंट वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के समय हुई थी। लखनऊ में हजरतगंज में राजनाथ सिंह का चुनाव-कार्यालय था, जहां एक दिन पता लगा कि गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर आए हुए हैं। उस समय वह अपनी योग्यता, ईमानदारी एवं सादगी के कारण चर्चा में आ गए थे। पता लगा कि ऊपर के एक कक्ष में वह मौजूद हैं। मैं वहां गया तो एक मीटिंग हो रही थी तथा सामने मनोहर पर्रिकर बै"s हुए थे। मैं आगे बढ़कर उनके पास जाने लगा तो किसी ने मुझे रोका। मनोहर पर्रिकर ने इशारे से उसे मुझे आने देने के लिए कहा। मैंने मनोहर पर्रिकर को अपना परिचयकार्ड दिया तो उन्होंने मीटिंग के बाद मुझे मिलने को कहा। बाद में मिलने पर उनसे काफी बातें हुईं तथा उन्होंने उत्तर प्रदेश एवं हिन्दी के प्रति अपना प्रेम जताया। उन्होंने कहा कि वह राजनीति को नेतागिरी के बजाय सेवागिरी मानते हैं। उन्हें आडंबर नहीं अच्छे लगते तथा आम जनता के बीच आम व्यक्ति की तरह रहने में सुख मिलता है। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वह माओ, लेनिन व होचीमिन्न की सादगी से प्रभावित हैं तो उन्होंने कहा कि प्रभावित होने के लिए उतनी दूर जाने की जरूरत नहीं, अपने देश का प्राचीन इतिहास व संस्कृति जानना ही पर्याप्त है। हमारे यहां राजा जनता का स्वामी नहीं, बल्कि सेवक है, यह अवधारणा रही है। मनोहर पर्रिकर ने मुझे गोवा घूमने के लिए आमंत्रित किया और कहा कि जब मैं गोवा आऊं तो उन्हें पहले से सूचित कर दूं। दुर्भाग्यवश समयाभाव के कारण मैं गोवा नहीं जा सका।

मनोहर पर्रिकर के बारे में यह सुनकर लोग आश्चर्य करते थे कि वह मुख्यमंत्री के रूप में तामझाम से दूर रहते हैं तथा मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में रहने के बजाय छोटे-से घर में रहते हैं। वह स्कूटी से स्वयं बाजार से सब्जी आदि लेने चले जाते हैं। साधारण होटल में आम लोगों के साथ बै"कर भोजन करने लगते हैं। विमान में साधारण श्रेणी में यात्रा करते हैं। आम जनता को बड़ी आसानी से उपलब्ध रहते हैं, आदि-आदि। उनकी मुस्कान मशहूर थी तथा रोचक चुटकुले सुनाया करते थे। उनकी ओर देश का ध्यान उस समय केंद्रित हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें गोवा के मुख्यमंत्री पद से दिल्ली लाकर देश के रक्षामंत्री का अतिमहत्वपूर्ण दायित्व सौंपा। वह मोदी मंत्रिमंडल के सर्वश्रेष्" मंत्री सिद्ध हुए। आजादी के बाद बेहद कमजोर बना दी गई हमारी सेना को मजबूत करने का उन्होंने बीड़ा उ"ाया और उस कार्य में जुट गए। मनमोहन सिंह/सोनिया गांधी की सरकार द्वारा चौपट कर दिए गए अपने विभाग के शुद्धिकरण का अथक प्रयास करने लगे। उन्होंने सेना का मनोबल बहुत ऊंचा किया तथा उनके समय में हमारी सेना ने पाकिस्तानी आतंकी शिविरों पर लक्ष्यभेदी प्रहार (सर्जिकल स्ट्राइक) कर बड़ी कुशलता से उन शिविरों को नष्ट किया।

नवनियुक्त रक्षामंत्री के रूप में जब वह लखनऊ आए थे तो प्रदेश भाजपा मुख्यालय में उनकी पत्रकार वार्ता हुई थी। उसमें उन्होंने अहसास करा दिया था कि वह अब तक के योग्यतम रक्षामंत्री सिद्ध होंगे। उनकी सादगी एवं हंसमुख स्वभाव की भी झलक पत्रकार वार्ता में मिली थी। मोदी ने उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में भेजा तो वह खुश होकर बोले थे कि अब तो यह प्रदेश भी उनका घर हो गया है। उस समय उन्होंने कहा था कि वह हिन्दी में अधिक से अधिक प्रवीण होने का प्रयास करेंगे। रजत शर्मा के 'आपकी अदालत' कार्यक्रम में वह आए थे तो वह कार्यक्रम यादगार बन गया था। उन्होंने बताया था कि विभाग को पहले जो क्षति पहुंची है, उसे "ाrक करने के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। उस कार्यक्रम में मनोहर पर्रिकर ने अपने सहपा"ाr का एक रोचक संस्मरण भी सुनाया था। मनोहर पर्रिकर अपने जीवन से आज के नेताओं को सादगी, ईमानदारी एवं आम जनता से निकटता से जुड़े रहने का बहुत बड़ा संदेश दे गए हैं तथा उसके अनुसरण से ही हमारे यहां लोकतंत्र का सच्चा रूप स्थापित होगा।

लेकिन 'यक्ष प्रश्न' यह है कि क्या हमारे नेतागण मनोहर पर्रिकर के आदर्श जीवन से सीख लेंगे? कारण कि जब व्यक्ति या समाज पतन की ढलान पर फिसलने लगता है तो उस फिसलन से उसका संभल पाना बड़ा क"िन होता है। कुछ भी हो, हमारा देश मनोहर पर्रिकर को कभी नहीं भूल सकेगा।

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