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बढ़ गया आडवाणी का कद

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:10 April 2019 3:27 PM GMT
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प्रेम शर्मा

पद और कद में बहुत बड़ा अन्तर है। कुल लोग पद के लिए अपना कद घटा लेते है तो कुछ लोग कद के लिए पद प्याग देते है। शायद ऐसा ही कुछ लालकृष्ण आडवाणी के साथ रहा। निश्चित तौर से भाजपा लालकृष्ण आडवाणी के संघर्ष का परित्याग नही कर सकती। कारण स्पष्ट है कि जहां एक ओर पार्टी की फ्रतिष्"ा और निष्"ा को त्यागकर बड़े-बड़े नेता सिर्फ एक टिकट के लिए घर बदलने में देर नही करते वही आडवानी ने बहुत बड़ा त्याग कर पार्टी में नहीं वरन राजनीतिक समाज में अपने कद का विस्तार किया है। लालकृष्ण आडवाणी ने ब्लॉग में पिछली पोस्ट पांच साल पहले (23 अफ्रैल, 2014) की है, जब उन्होंने वर्ष 2014 के चुनाव फ्रचार पर केंद्रित अपने विचार रखे थे। आज जब वह 2019 का चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, तब उन्होंने अपनी बात बेबाकी से रखी है। अंग्रेजी में लिखी गई अपनी पोस्ट में आडवाणी ने शीर्षक दिया है-पहले राष्ट्र, फिर पार्टी और अंत में व्यक्ति। फ्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना समय गंवाए अपने एक ट्वीट से आडवाणी का पुरजोर समर्थन किया है। यह एक अच्छा फ्रयास है, जब वर्तमान नेतृत्व पार्टी के वरिष्"तम नेता के समर्थन में है और मतभेद या मनभेद की स्थिति में कतई नहीं दिखना चाहता। भाजपा की आलोचना करने वाले कह सकते हैं कि आडवाणी का दिया शीर्षक ही अपने आप में वर्तमान पार्टी नेतृत्व पर कटाक्ष है, पर वर्तमान पार्टी नेतृत्व अपनी ओर से आलोचना के सिलसिले की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ेगा। निश्चित तौर पर देखा जाए तो 2014 में भाजपा को एक छत्र बहुमत मिलने के बाद से ही पार्टी के कई बड़े नेताओं को हाशियें पर डालनें का काम शुरू हो चुका था। 2019 में जब भाजपा मैदान में आई तो सबकुछ आइने की तरह साफ हो गया। कुछ ने रास्ता बदला तो कुछ ने विचार बदल दिये, लेकिन इस नाजुक दौर में भी लालकृष्ण आडवानी ने पार्टी का साथ नहीं छोड़ा बल्कि अपने 6 अफ्रैल को ब्लॉग में लिखा कि राष्ट्रवाद के भाजपा सिद्धांत में हमने कभी ऐसे लोगों को राष्ट्रविरोधी नहीं कहा, जो हमसे राजनीतिक मतभेद रखते थे। पार्टी निजी और राजनीतिक स्तर पर हमेशा हर नागरिक के चुनाव की स्वतंत्रता के लिए फ्रतिबद्ध रही। पार्टी के भीतर और राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं की सुरक्षा भाजपा की गौरवपूर्ण विशिष्टता रही है। 'भाजपा हमेशा से ही सभी लोकतांत्रिक संस्थानों की स्वतंत्रता, अखंडता, निष्पक्षता और मजबूती के लिए आवाज उ"ाने में सबसे आगे रही है। यह सच है कि चुनाव लोकतंत्र का उत्सव होते हैं। लेकिन, यह भारतीय लोकतंत्र के सभी भागीदारों के लिए ईमानदारी से आत्मावलोकन का अवसर भी हैं। 6 अफ्रैल को भाजपा अपने स्थापना दिवस का उत्सव मनाएगी। यह हम सभी के लिए अतीत और भविष्य में देखने के साथ-साथ अपने भीतर झांकने का महत्वपूर्ण अवसर है। ये वे पॉच वाक्य जिन्हें स्वंय फ्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही नहीं बल्कि विरोधियों भी सराहा।

जो कम बोलता है, उसके बोलने की चर्चा ज्यादा होती है और लोग न केवल उसके बोलने का इंतजार करते हैं, बल्कि उसे ध्यान से सुनते भी हैं। भारतीय समकालीन राजनीति में अब लालकृष्ण आडवाणी ऐसे ही कम बोलने वाले नेता हैं। अपने ब्लॉग में लिखी जिनकी बातों की व्यापक समाज में चर्चा है। छह अफ्रैल को भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस है और इसके "ाrक दो दिन पहले लालकृष्ण आडवाणी ने देश और पार्टी को लेकर जो बातें लिखी हैं, उनसे काफी कुछ समझा और सीखा जा सकता है। भाजपा को खड़ा करने और सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में आडवाणी का जो योगदान है, उसकी फ्रशंसा फ्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी करते रहे हैं। आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर जो लिखा है, उसे फ्रधानमंत्री ने भारतीय जनता पार्टी की भावना का सार बताया है, तो कोई आश्चर्य नहीं। आडवाणी के उद्गार की विभिन्न संदर्भों में विवेचना संभव है। हर संदर्भ का अपना निष्कर्ष निकल सकता है। आडवाणी ने यह महत्वपूर्ण पक्ष भी स्पष्ट किया है कि जो लोग राजनीतिक रूप से पार्टी से असहमत हैं, उन्हें भाजपा ने कभी राष्ट्र विरोधी या शत्रु नहीं समझा है। आडवाणी का यह लिखना वास्तव में भाजपा को मजबूती ही फ्रदान करेगा। कोई तो है सत्ताधारी पार्टी में, जो यह कह रहा है, यह उल्लेखनीय है। बहुत वर्षों बाद देश में एक पार्टी बहुमत के साथ सरकार बनाने के लिए सक्षम हुई, तो उसकी ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। आडवाणी ने अपनी इस टिप्पणी से मार्गदर्शन का वह जरूरी काम किया है, जिसकी उम्मीद केवल भाजपा को ही नहीं, बल्कि देश को भी लंबे समय से रही है। भारतीय राजनीति में साफ-सफाई और अच्छी विमर्श-परंपरा के लिए आडवाणी को इसी तरह से लिखते रहना चाहिए, ताकि देश न केवल उनके विचार से लाभान्वित हो, बल्कि कार्यकर्ता भी बीच-बीच में पार्टी के आईने में अपना चेहरा देख सकें। केवल भाजपा ही क्यों, सभी राजनीतिक पार्टियों के वर्तमान नेतृत्व को किसी भी अच्छी टिप्पणी या अच्छी सलाह पर इसी तरह की परिपक्व शालीनता का परिचय देना चाहिए, जैसी शालीनता वर्तमान संदर्भ में भाजपा में दिखाई पड़ी है। आडवाणी का रजनीतिक जीवन संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन वो फ्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए। आखिर उनकी राजनीति कहां चूक गई ? एक जमाने में भारतीय जनता पार्टी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण आडवाणी की पूरे भारत में तूती बोला करती थी और उन्हें फ्रधानमंत्री पद का फ्रबल दावेदार माना जाता था। ये वही आडवाणी हैं जिन्होंने 1984 में दो सीटों पर सिमट गई भारतीय जनता पार्टी को रसातल से निकाल कर पहले भारतीय राजनीति के केंद्र में पहुंचाया और फिर 1998 में पहली बार सत्ता का स्वाद चखाया। उस समय जो बीज उन्होंने बोए थे, कायदे से उसकी फसल काटने का समय अब था। लेकिन फसल काटना तो दूर लाल कृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति तो क्या भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में आफ्रासंगिक से हो गए हैं। भाजपा में 2004 और 2009 की लगातार दो चुनाव की हार के बाद " लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न्स " का सिद्धांत आडवाणी पर भी लागू हुआ और एक जमाने में उनकी छत्रछाया में पलने वाले नरेंद्र मोदी ने उनकी जगह ले ली। बीजेपी को नजदीक से देखने वालों का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का समर्थन पाने के लिए आपका हार्डलाइनर होना जरूरी होता है, लेकिन वही शख्स फ्रधानमंत्री पद की होड़ में शामिल होता है तो वो अपनी छवि को मुलायम करने की कोशिश करता है ताकि उसकी अखिल भारतीय स्वीकार्यता बढ़ सके। यह परेशानी बीजेपी के साथ हमेशा रही है। इसका कारण ये है कि भारतीय जनता पार्टी या इससे पहले भारतीय जनसंघ या आरएसएस हिंदू राष्ट्र की विचारधारा की बुनियाद पर खड़े हैं। ह"धर्मिता और कड़ापन उनकी विचारधारा का हिस्सा है। दिक्कत ये होती है कि जब आप संवैधानिक पद की होड़ में होते हैं तो आपको इससे बाहर निकलना होता है। लेकिन जब ये नेता मुख्यमंत्री या फ्रधानमंत्री या मंत्री बनते हैं, उनके लिए इस तरह का सामंजस्य बै"ाना बहुत क"िन हो जाता है। ये दिक्कत आडवाणी के साथ भी थी और अटल के साथ भी थी। लेकिन अटल की बोलने की क्षमता और हिंदी हार्टलैंड की उनकी समझ उनको इस परेशानी से उबार लेती थी. आडवाणी ऐसा नहीं कर पाते थे, इसलिए वो अपनी इमेज में फंस कर रह जाते थे। शायद भारतीय राजनीति में स्वीकार्य होने की उनकी दबी इच्छा की वजह से उन्होंने पाकिस्तान जाकर मुहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करने का अपनी समझ में एक मास्टरस्ट्रोक खेला था। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित हुआ। कराची से दिल्ली आने के बाद आडवाणी का जो विकास हुआ है, उसमें वो अटल बिहारी वाजपेयी के पूरक के रूप उभर कर सामने आए थे। निश्चित तौर लालकृष्ण आडवाणी एक नाम लेकिन 38 साल की हो चुकी बीजेपी के इतिहास के पन्नों में अलग-अलग भूमिकाओं का किरदार। कभी लौहपुरुष, कभी सारथी, कभी कर्णधार, कभी भीष्म पितामह और अब मार्गदर्शक। राजनीति में उम्र का तजुर्बा ही वरिष्"ता का आधार होता है। लेकिन अब सियासत भी 75 साल से ऊपर की उम्र वालों के लिये रिटायरमेंट का अहसास कराने लगी है। आडवाणी ने अपनी आत्मकथा लिखी थी ' माई कंट्री माई लाइफ' बहुत कुछ लिख डाला है। लगभग 92 वर्ष के हो रहे लालकृष्ण आडवानी का गांधी नगर से चुनाव में न उतरने के बाद जो ब्लॉग लिखा उस ब्लॉग के शब्दों ने लालकृष्ण आडवानी के कद को फ्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कई गुना बड़ा कर दिया है। यह तय है कि पद कभी भी जा सकता है, लेकिन कद आपके न रहने के बाद भी याद किया जाता है।

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