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यूपी में मुस्लिम वोटरों के सहारे महागठबधन

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:10 April 2019 3:28 PM GMT
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राजेश माहेश्वरी

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव पूरे उफान पर है। पहले चरण की वोटिंग होने वाली है, ऐसे में भाजपा, कांग्रेस और महाग"बंधन वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिये सारी कोशिशें कर रहा है। सपा-बसपा ग"बंधन का पूरा जोर मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने का है। पिछले दिनों सहारनपुर के देवबंद में महाग"बंधन की संयुक्त रैली में बसपा प्रमुख मायावती ने मुस्लिम वोटरों को एकजुट होकर वोट देने की पुरजोर अपील की। मायावती ने बिना लाग लपेट मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहाकि, वे भावनाओं में न बहें, रिश्ते-नाते और यार-दोस्तों के चक्कर में न आएं और एक-एक वोट ग"बंधन के उम्मीदवार को दें। यदि आप भाजपा को हराना चाहते हैं, तो लामबंद होकर सपा, बसपा, रालोद के साझा उम्मीदवार को वोट दें। बसपा सुप्रीमो ने साफ तौर पर सांफ्रदायिक कार्ड खेला है। अगर ये कहा जाए कि यूपी में महाग"बंधन मुस्लिम वोटों के सहारे है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। जानकारों के अनुसार पश्चिम उत्तर फ्रदेश में सपा-बसपा-आरएलडी ग"बंधन को मुस्लिम वोटों में बिखराव का डर सता रहा है। दरअसल 35 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां 20 फीसदी से ज्यादा मुसलमान और 20 फीसदी से ज्यादा दलित वोटर हैं। लोकसभा की पांच सीटें ऐसी हैं, जहां 40 फीसदी से अधिक दलित मतदाता हैं। यूपी में मुस्लिम वोटरों की लगभग 19.5 फीसदी आबादी हैं। ग"बंधन से पहले मुस्लिम वोट सपा और बसपा में बंट जाता था और इसका फायदा बीजेपी को मिलता था। 2014 के लोकसभा चुनाव में इसका असर भी दिखा था। फिलवक्त मुस्लिम बहुल इलाके में एंटी बीजेपी साफ तौर पर देखी जा सकती है।

उत्तर फ्रदेश की सियासत में मुस्लिम फैक्टर हमेशा से ही निर्णायक भूमिका निभाता चला आ रहा है। जब तक मुसलमान कांग्रेस के साथ रहे, फ्रदेश में पार्टी की पकड़ मजबूत रही लेकिन नब्बे के दशक में कमंडल की राजनीति के चलते मुसलमानों का कांग्रेस पर से विश्वास उ"ने लगा। मुसलमानों में कांग्रेस से नाराजगी की वजह अयोध्या विवाद था। वर्तमान में मुस्लिम वोटर सपा का वोट बैंक माना जाता है। ंबीते ढाई दशक में मुस्लिम मतदाता अधिकतर मुलायम सिंह यादव पर ही भरोसा जताते रहे हैं। इस बार स्थिति दूसरी है और सपा की कमान उनके बेटे अखिलेश यादव के हाथों में है। अखिलेश ने मायावती के साथ ग"बंधन कर मुसलमानों को सशक्त विकल्प देने की कोशिश की है। जिससे मुसलमानों की दुविधा खत्म हो सके। सपा-बसपा ग"बंधन की रणनीति भी यही है कि मुसलमानों का एकमुश्त वोट उसे मिले और वो उत्तर फ्रदेश की लोकसभा की 80 सीटों में से ज्यादा से ज्यादा पर जीत हासिल कर सके।

पश्चिम यूपी की कई लोकसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में है। यही वजह है कि बसपा ने कई लोकसभा सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव लगाया है। इनमें पश्चिम यूपी की सहारनपुर, मेर" और अमरोहा में बसपा ने मुस्लिम फ्रत्याशी उतारा है। वहीं, सपा ने कैराना, मुरादाबाद, संभल और रामपुर सीट पर मुस्लिम कैंडिडेट उतारा है। सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेर", बिजनौर, अमरोहा, बुलंदशहर और मुरादाबाद वो जिले हैं, जहां मुसलमान मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका में है। ऐसे में ग"बंधन के मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में हैं, जहां दलित मुस्लिम वोटर एकसाथ आते हैं वहां बीजेपी की जीत का समीकरण गड़बड़ा सकता है। कैराना सीट पर 26, मेर" सीट पर 31, बागपत सीट पर 20, मुजफ्फरनगर सीट पर 31, सहारनपुर सीट पर 38, गाजियाबाद सीट पर 19 और बिजनौर सीट पर करीब 38 फीसदी मुसलमान हैं। जबकि गौतमबुद्धनगर सीट पर 14 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इससे साफ जाहिर है कि पहले चरण की सभी सीटों पर मुसलमान वोट अहम भूमिका में है, जहां सहारनपुर में सबसे ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव 2017 में बसपा ने बड़ी संख्या में मुस्लिम फ्रत्याशी उतारे थे। ऐसे में सपा और कांग्रेस ने भी मुस्लिमों पर दांव लगाया था। ऐसे में मुस्लिम मतदाता तीनों पार्टियों के बीच बंट गया था, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला था। यही वजह है कि मायावती इस बार मुस्लिम मतों को सचेत कर रही हैं।

2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने सबसे ज्यादा करीब सौ मुस्लिम फ्रत्याशी मैदान में उतारे थे। जबकि सपा ने 64 मुस्लिम फ्रत्याशियों को टिकट दिया था। इस बार की विधानसभा में कुल 25 मुस्लिम विधायक हैं जो कि पिछले 25 सालों में बनी फ्रदेश की विधानसभाओं में सबसे कम बताए जाते हैं। इससे पूर्व 1991 में कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में यूपी की विधानसभा में 23 मुस्लिम विधायक थे। फ्रदेश की मौजूदा विधानसभा में सबसे ज्यादा 18 मुस्लिम विधायक सपा के हैं, जबकि बसपा के पांच और कांग्रेस के दो मुस्लिम विधायक हैं।

मुस्लिम मतदाताओं से एकजुट रहने का आह्वान करते हुए बसपा फ्रमुख भूल गईं कि इसी आधार पर चुनाव रद्द किया जा सकता है। मताधिकार छिन सकता है और चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिया जा सकता है। चुनाव आयोग ने त्वरित संज्ञान लिया और जांच के आदेश देते हुए सहारनपुर फ्रशासन से पूरी रपट तलब की है। कार्रवाई आयोग का विशेषाधिकार है, लेकिन यह तय है कि धर्म, मत, संफ्रदाय, भाषा और लिंग के आधार पर वोट मांगना 'असंवैधानिक' है। हालांकि इन्हीं आधारों पर वोट मांगे जाते रहे हैं। जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति लगातार जारी रही है। बहरहाल मुद्दा मुस्लिम वोट बैंक का है। मायावती ने लगभग वैसी ही सियासत खेलने की कोशिश की है, जैसी मुहम्मद अली जिन्ना ने 'मुस्लिम लीग' के जरिए खेली थी। रणनीति यह थी कि मुस्लिम वोट न बंटें, वे एकमुश्त ही किसी पक्ष में जाएं और अन्य समुदायों, जातियों के वोट बांटे जाएं। मायावती भी चाहती होंगी कि हिंदू वोट बांट दिए जाएं।

मायावती और अखिलेश यादव में ग"बंधन हो जाने पर राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि दोनों के एक साथ चुनाव लड़ने से वोटों का बंटवारा नहीं होगा और ग"बंधन का फ्रत्याशी जीत हासिल कर लेगा। सपा-बसपा का उम्मीदवार सशक्त दिखने पर मुस्लिम वोटर उसके नाम पर बटन दबा सकता हैं। यूपी में सख्त जमीनी हकीकत यह भी है कि सूबे में मुसलमानों की बड़ी आबादी होने के बावजूद 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम संसद नहीं पहुंच सका। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2014 में सपा-बसपा और कांग्रेस के बीच मुसलमान वोटों के बंटवारे की वजह से राजनीतिक नुकसान हुआ। लेकिन अब इस बार यूपी के दो मजबूत पार्टियां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के ग"बंधन से मुस्लिम वोट पहले की तुलना में कम बंटेगा और ग"बंधन के उम्मीदवार को इसका निर्णायक मदद भी मिलेगा। उत्तर फ्रदेश के 38 जिलो की 27 लोकसभा की सीटों पर मुसलमान निर्णायक भूमिका में है। वहीं, बीजेपी ने 2014 जैसे नतीजे दोहराने और सपा-बसपा-आरएलडी के समीकरण को ध्वस्त करने के लिए नई रणनीति अपना रही है. इसके तहत बीजेपी सूबे में ग"बंधन के उम्मीदवार को टारगेट करने के बजाय कांग्रेस के मुस्लिम फ्रत्याशियों के खिलाफ ज्यादा आक्रमक रुख अपना रही है।

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इस रणनीति का बड़ा सियासी फायदा मिला था। राजनीतिक विशलेषकों के मुताबिक, ग"बंधन के राजनीतिक समीकरण को देखें तो बसपा का दलित, सपा का यादव और आरएलडी के जाट मतदाता के साथ-साथ मुस्लिम वोटर एक साथ आते हैं तो बीजेपी के लिए जीत की राह कांटों भरी नजर आती है। हालांकि ग"बंधन के सामने अपने वोटबैंक को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती है।

लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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