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आपदा के समय भरोसेमंद दोस्त 'रेडक्रॉस'

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:7 May 2019 3:11 PM GMT
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योगेश कुमार गोयल

'रेडक्रॉस' एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था है, जो लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के अलावा आकस्मिक दुर्घटनाओं में घायलों, रोगियों, आपातकाल तथा युद्ध कालीन बंदियों की देखरेख करती है। रेडक्रॉस की स्थापना वर्ष 1863 में हुई थी, जिसका मुख्यालय जिनेवा में है। रेडक्रॉस की स्थापना महान मानवता प्रेमी जीन हेनरी डयूनेंट द्वारा की गई थी, इसीलिए उनके जन्मदिन के अवसर पर ही प्रतिवर्ष विश्वभर में 8 मई का दिन 'अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस दिवस' के रूप में मनाया जाता है और संस्था की गतिविधियों से आम आदमी को अवगत कराने के प्रयास किए जाते हैं। जिनेवा में 8 मई 1828 को जन्मे डयूनेंट एक स्विस व्यापारी तथा समाजसेवक थे, जो 1859 में हुई सालफिरोनो (इटली) की लड़ाई में घायल सैनिकों की दुर्दशा देख बहुत आहत हुए क्योंकि युद्धभूमि में पड़े इन घायल सैनिकों के उपचार के लिए कोई चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। युद्ध मैदान में घायल पड़े इन्हीं सैनिकों के दर्दनाक हालातों पर अपने कड़वे अनुभवों के आधार पर उन्होंने 'मेमोरी और सालफिरोनो' नामक एक पुस्तक भी लिखी और 1863 में रेडक्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति 'आईसीआरआई' का गठन किया। हेनरी डयूनेंट ने 30 अक्तूबर 1910 को हैदन में 82 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली।

हेनरी डयूनेंट के सतत प्रयासों की बदौलत ही 1864 में जिनेवा समझौते के तहत 'अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस मूवमेंट' की स्थापना हुई। डयूनेंट ने इटली में युद्ध के दौरान रक्तपात का ऐसा भयानक मंजर देखा था, जब चिकित्सकीय सहायता के अभाव में युद्धक्षेत्र में अनेक घायल सैनिक हृदयविदारक कष्टों से तड़प रहे थे। ऐसे घायलों की सहायता के लिए उन्होंने स्थायी समितियों के निर्माण की आवश्यकता को लेकर आवाज बुलंद की, जिसका असर भी दिखा। युद्ध में आहतों की स्थिति के सुधार के साधनों का अध्ययन करने के लिए उसके बाद एक आयोग का गठन किया गया, जिसके सदस्य जनरल डूफोर, स्विस सेना के सेनापति गस्टवे मोइनिए, हेनरी डयूनेंट, डा. लुई एपिया तथा डा. थियोडोर मोनोइ थे। 26 से 29 अक्तूबर 1863 तक जिनेवा में एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक हुई, जिसमें रेडक्रॉस के आधारभूत सिद्धांत निर्धारित किए गए तथा रेडक्रॉस आंदोलन का विकास करते हुए आहत सैनिकों और युद्ध पीडितों की सहायता संगठित करने हेतु दुनियाभर के सभी देशों में राष्ट्रीय समितियां बनाने पर जोर दिया गया। नेपोलियन तृतीय के हस्तक्षेप के चलते अंतर्राष्ट्रीय समिति 'स्विस फेडरल काउंसिल' को 8 अगस्त 1864 को जिनेवा में सम्मेलन बुलाने के लिए राजी करने में सफल हुई, जिसमें 26 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इस सम्मेलन के चलते जिनेवा अधिवेशन हुआ, जिसमें सुरक्षा के प्रतीक रेडक्रॉस वाले सफेद झंडे पर स्वीकृति की मोहर लगाई गई, जो आज समस्त विश्व में रेडक्रॉस का प्रतीक चिन्ह बना हुआ है। जिनेवा अधिवेशन में कुछ ऐसे सिद्धांतों पर भी मोहर लगी, जिन्हें आज भी समस्त देश स्वीकारते हैं। मसलन, युद्ध में आहतों का सम्मान होना चाहिए, सैनिक तटस्थ समझे जाने चाहिएं, चिकित्सा सेवाओं की सामग्रियों तथा कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान की जाए।

मानव सेवा के लिए हेनरी डयूनेंट को वर्ष 1901 में पहला नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। मानवीय सेवा को समर्पित रेडक्रॉस के उल्लेखनीय कार्यों की बदौलत इस संस्था को भी वर्ष 1917 में पहला नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। रेडक्रॉस को अब तक कुल तीन बार 1917, 1944 तथा 1963 में शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। रेडक्रॉस ने प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अनेक घायल सैनिकों तथा नागरिकों की सहायता कर अनुकरणीय उदाहरण पेश किया था। 1914 के प्रथम विश्वयुद्ध के समय ही रेडक्रॉस के करीब दो हजार स्वयंसेवकों ने न केवल विभिन्न सेनाओं तथा जहाजी बेड़ों के हजारों लापता सैनिकों का पता लगाया गया बल्कि 500 विभिन्न बंदी-शिविरों की नियमित देखरेख करते हुए हजारों युद्धबंदियों को सहायता भी मुहैया कराई। अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस सोसाइटी दुनिया के सभी देशों में रेडक्रॉस आंदोलन का प्रसार करने के साथ-साथ रेडक्रॉस के आधारभूत सिद्धांतों के संरक्षक के रूप में भी कार्य कर रही है। हालांकि शुरुआती दौर में रेडक्रॉस की भूमिका युद्ध के दौरान बीमार और घायल सैनिकों, युद्ध करने वालों और युद्धबंदियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना तथा उन्हें उचित उपचार सुविधाएं उपलब्ध कराने तक ही सीमित थी किन्तु अब इस संस्था के दायित्वों का दायरा लगातार विस्तृत होता जा रहा है। दुनिया के किसी भी भाग में जब भूकंप, बाढ़, भूस्खलन या अन्य किसी भी प्रकार की प्राकृतिक अथवा मानवीय आपदा सामने आती है तो सबसे पहले 'अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस सोसाइटी' की टीमें वहां पहुंचकर राहत कार्यों में जुट जाती हैं। कहना गलत न होगा कि शांति और सौहार्द के प्रतीक के रूप में जानी जाने वाली इस संस्था ने अपने कर्मठ, समर्पित और कर्त्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवकों के माध्यम से न केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस सोसाइटी की ही एक रिपोर्ट में बताया गया है कि किस प्रकार रेडक्रॉस ने अमेरिका में कैटरीना तूफान के दौरान तथा एशिया के कुछ देशों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान आई भयंकर बाढ़ और सुनामी लहरों के तांडव के समय में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यही कारण है कि वर्तमान समय की विकट परिस्थितियों के साथ-साथ आपदा के समय भी भरोसेमंद दोस्त की तरह मदद का हाथ बढ़ाती 'रेडक्रॉस' जैसी संस्था समूचे विश्व की जरूरत बन गई है। फिलहाल 190 से भी अधिक देशों में 'रेडक्रॉस' संस्था सक्रिय है। भारत में 'भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी अधिनियम' के तहत वर्ष 1920 में रेडक्रॉस सोसाइटी का गठन हुआ था और स्थापना के नौ वर्ष बाद इसकी सराहनीय गतिविधियों को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस सोसाइटी ने 'भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी' को मान्यता प्रदान की। स्थापना के शुरुआती वर्षों में देश में रेडक्रॉस सोसाइटी के अध्यक्ष भारत के उपराष्ट्रपति होते थे किन्तु वर्ष 1994 में रेडक्रॉस एक्ट में संशोधन करते हुए सोसाइटी का पदेन अध्यक्ष महामहिम राष्ट्रपति को तथा सचिव केन्द्राrय स्वास्थ्य मंत्री को बनाया गया। वर्तमान समय में भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी की देशभर में 750 से अधिक शाखाएं मानवता की सेवा में जीजान से जुटी हैं।

रेडक्रॉस एक ऐसी स्वयंसेवी संस्था है, जो देश के किसी भी हिस्से में प्राकृतिक अथवा मानवीय आपदा के शिकार लोगों को बचाने व राहत पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और इसमें शामिल होने वाले कर्मठ स्वयंसेवकों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। विश्वभर में रेडक्रॉस के करीब एक करोड़ सत्तर लाख स्वयं सेवक हैं। यही कारण है कि रेडक्रॉस दिवस को 'अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस' भी कहा जाता है। यह संस्था लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करती है और अपनी विभिन्न शाखाओं के जरिये देशभर में जगह-जगह रक्तदान शिविर लगाकर प्रतिवर्ष बहुत बड़ी मात्रा में रक्त एकत्रित करती है। देश में रक्त एकत्रित करने तथा वही रक्त जरूरतमंद लोगों के लिए सही समय पर उपलब्ध कराने का कार्य यह संस्था कई दशकों से लगातार कर रही है। वास्तव में रक्त इकट्ठा करने वाली यह विश्व की एकमात्र सबसे बड़ी संस्था है, जिससे कैंसर, थैलेसीमिया, एनीमिया जैसी प्राणघातक बीमारियों से जूझ रहे हजारों लोगों की भी जान बचाई जाती हैं। रेडक्रॉस की पहल पर दुनिया का पहला ब्लड बैंक अमेरिका में 1937 में स्थापित हुआ था और वर्तमान में दुनियाभर के अधिकांश ब्लड बैंकों की देखरेख रेडक्रॉस तथा उसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा ही की जाती है। रेडक्रॉस देश के किसी भी भाग में मानवीय या प्राकृतिक आपदा के शिकार लोगों को बचाने तथा उन्हें राहत पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।

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