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ईवीएम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का सराहनीय फैसला

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:12 May 2019 3:37 PM GMT
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संतोष कुमार भार्गव

सुफ्रीम कोर्ट ने ईवीएम-वीवीपैट मुद्दे पर 21 राजनीतिक दलों द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। लगातार ईवीएम को लेकर विवाद पैदा कर रहे विपक्षी दलों को एक तरह से यह बड़ा झटका ही है। इस पुनर्विचार याचिका पर सुफ्रीम कोर्ट का कहना था कि अदालत अपने पुराने फैसले को बदलना नहीं चाहती। आखिर एक ही मामले को कितनी बार सुना जाए। इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश का यह भी कहना था कि कोर्ट इस मामले में दखल नहीं देना चाहती। दरअसल आ" अफ्रैल को दिए अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने 21 दलों की मांग पर एक विधानसभा क्षेत्र के एक मतदान केंद्र पर वीवीपैट के जरिये मतदान करने की पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए एक विधानसभा क्षेत्र के पांच मतदान केंद्रों पर ईवीएम में दर्ज वोटों का मिलान वीवीपैट से कराने की व्यवस्था का आदेश दिया था। अदालत ने स्वीकारा था कि पचास फीसदी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट के साथ मतदान करा पाना संभव नहीं है। चुनाव आयोग भी कह चुका था कि इसके अनुपालन में कई तरह की अड़चने हैं। व्यावहारिक दिक्कतों को कोर्ट ने भी महसूस किया था कि चुनाव फ्रक्रिया में पहले ही कई तरह की बाधों हैं और नई व्यवस्था के क्रियान्वयन में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को लगाने की जरूरत होगी।

लोकसभा चुनाव के बीच आंध्र फ्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और कांग्रेस सहित कुल 21 विपक्षी दलों ने अपनी पुनर्विचार याचिका में कहा था कि ईवीएम से वीवीपैट का मिलान एक के बजाए पांच ईवीएम फ्रति विधानसभा करने से यह मात्र दो फीसद ही बढ़ा है। सिर्फ दो फीसद बढ़ने से कोई असर नहीं होगा। उनके हक में फैसला आने के बावजूद उनकी शिकायत खत्म नहीं हुई है। एक "ाrक"ाक संख्या में ईवीएम का वीवीपैट पर्ची से मिलान होना चाहिए ताकि चुनावी फ्रक्रिया में लोगों का भरोसा कायम रहे। इसके लिए पचास फीसद ईवीएम का वीवीपैट पर्चियों से मिलान होना चाहिए।

चुनाव आयोग ने सुफ्रीम कोर्ट द्वारा मांगे जवाब के लिए तर्क दिया था कि मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त है और यदि पचास फीसदी वीवीपैट की पर्चियों के मिलान की मांग को पूरा किया जाता है तो हर विधानसभा क्षेत्र में मतदान के बाद पचास फीसदी वीवीपैट पर्चियों के मिलान की वजह से परिणाम आने में पांच से छह दिन का विलंब हो सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव फ्रक्रिया विश्वसनीय और पारदर्शी होनी चाहिए। मगर महज विरोध के लिए बनी-बनाई चुनाव फ्रक्रिया के फ्रति मतदाताओं के मन में अविश्वास पैदा करना अनुचित ही कहा जाएगा। इससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की फ्रतिष्"ा को भी आंच आती है।

हालांकि पिछली बार ही चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों की मांग का विरोध किया था। आयोग का कहना था कि चुनाव फ्रक्रिया शुरू हो चुकी है ऐसे में मांग के अनुरूप पचास फीसद वीवीपैट का मिलान करना संभव नहीं होगा। इससे चुनाव परिणाम घोषित होने में छह से नौ दिनों का वक्त लग सकता है साथ ही बहुत सारे कर्मचारी और चाहिए होंगे। इसके बाद ही कोर्ट ने हर विधानसभा क्षेत्र में पांच का वीवीपैट से मिलान कराए जाने का आदेश दिया था और कहा था कि इससे अतिरिक्त दबाव नहीं आएगा। कोर्ट ने यह भी कहा था कि वीवीपैट के मिलान के लिए ईवीएम का चुनाव औचक होगा।

ईवीएम का ये विवाद देखा जाए तो नया नहीं है। इससे पहले गाहेबगाहे विभिन्न चुनावी मौकों पर राजनैतिक दल और नेता, इसके जरिये फर्जी मतदान की आशंका जता चुके हैं। ऐसे में सवल है कि क्या वास्तव में ईवीएम ऐसी बला है जो मनचाहे नतीजे निकाल सकती है या ये राजनैतिक दलों की सिर्फ हार की कुं"ा है ? 2014 में भी ये आशंका जताई गई थी और उससे पहले 2009 में विपक्षी दल बीजेपी ने लोकसभा चुनावों में ईवीएम के जरिये गड़बड़ी के आरोप लगाए थे। और तमिलनाडु में एआईएडीएमके ने चुनाव आयोग से पेपर बैलट बहाल करने की मांग की थी। अतीत में कैप्टन अमरिंदर सिंह भी ईवीएम पर आशंकित रह चुके हैं। पहली बार 1982 में केरल की उत्तरी परावुर विधासनभा सीट पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था। पराजित कांग्रेस उम्मीदवार एसी बोस ने केरल हाईकोर्ट की नाकाम शरण ली थी। नवंबर 1998 में मध्यफ्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की 16 विधानसभा सीटों पर फिर से ईवीएम उतारी गई। 2004 लोकसभा चुनावों में पहली बार देशव्यापी स्तर पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ। इसके साथ भी विवादों की शुरुआत भी हुई। 2009 में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनावों में ईवीएम से धांधली के आरोपों ने जोर पकड़ा।

कोई शक नहीं कि ईवीएम ने समाज, राजनीति और आबादी के लिहाज से अत्यंत जटिल तानेबाने वाले भारत में चुनाव फ्रक्रिया को काफी सहज और सटीक बनाया है। ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उ"ाने वाले राजनीतिक दलों को ध्यान रखना चाहिए कि ईवीएम तकनीक के जरिये मतदान कराने से जहां समय की भारी बचत हुई है, वहीं मतपत्र लूटने के हिंसक दौर का अंत हुआ, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोग हर आम चुनाव में मार दिए जाते थे। ऐसे ही बैलेट के जरिये मतदान की मांग औचित्यहीन ही नजर आती है। यह कुछ ऐसा ही है जैसे कि किसी अत्याधुनिक वाहन में कोई खामी के चलते हम बैलगाड़ी से सफर करने की वकालत करने लगें। फिर आधे-अधूरे तथ्यों व अफवाहों के चलते ईवीएम की विश्वसनीयता को संदेह के कठघरे में खड़ा करना भी तार्किक नजर नहीं आता।

शीर्ष अदालत में चुनाव आयोग ने कहा था कि इसमें छेडछाड़ संभव नहीं, ये त्रुटिहीन और संचालन में आसान है। लेकिन ईवीएम शुरू करने की फ्रक्रिया इतनी आसान नहीं थी। इसे नेताओं की ओर से भी विरोध का सामना करना पड़ा। 1984 में सुफ्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मनमानी के लिए फटकार लगाई। जिसके जवाब में आयोग ने कहा कि ये एक फ्रक्रियात्मक बदलाव है। चीजें आसान होंगी लेकिन कोर्ट नहीं माना, उसकी दलील थी कि बैलट का मतलब बैलट होता है जो कागज पर ही दर्ज होना चाहिए। लेकिन आयोग ने बताया कि फ्रत्येक लोकसभा सीट पर ईवीएम के इस्तेमाल से तीन लाख रुपए से अधिक की बचत होती है। मतदाताओं की बढ़ती संख्या के लिहाज से इसका इस्तेमाल वक्त की मांग है। औसतन एक लोकसभा क्षेत्र के लिए 12 हजार रुपए फ्रति टन के हिसाब से तीन मीट्रिक टन कागज का इसेतमाल होता है। कागज की कटाई और छपाई का खर्च अलग।

बहुत संभव है कि ईवीएम को सही ढंग से न चला पाने और मौसमी दबाव के चलते कोई तकनीकी त्रुटि सामने आ जाए। लेकिन इसको लेकर पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। साथ ही इसे ईवीएम मशीन में छेड़छाड़ करार नहीं दिया जा सकता। वैसे भी जब चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को ईवीएम हैक करने की चुनौती दी थी तो कोई व्यक्ति ऐसा करने में सफल नहीं हो पाया था। पिछले दिनों लंदन से भी एक हैकर ने ईवीएम मशीन हैक करने का दावा किया था। बाद में पता चला कि वह व्यक्ति अमेरिका में राजनीतिक शरण पाने के मकसद से खुद को पीड़ित बताने का फ्रपंच रच रहा था।

देश की सर्वोच्च अदालत भी पचास फीसदी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट के जरिये मतदान कराने की व्यावहारिक दिक्कतों का उल्लेख कर चुकी है। ऐसे में अपनी सुविधा के लिए ईवीएम चुनाव फ्रक्रिया की विश्वसनीयता को सवालों के घेरे में खड़ा करना समझ से परे ही है। यदि भविष्य में लोकतंत्र की विश्वसनीयता के क्रियान्वयन के लिए जरूरत हो भी तो चुनाव आयोग को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। मगर अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार महज विरोध के लिए विरोध नहीं किया जाना चाहिए। ईवीएम को लेकर संदेह और आरोप फ्रमाणित नहीं हैं, लेकिन इनका स्थायी और निर्णायक हल जरूरी है, वरना समय व अपनी सहूलियत के हिसाब से कोई न कोई दल इस तरह से सुधारों की कोशिशों पर ही सवाल उ"ाता रहेगा और चुनाव आयोग सत्ता राजनीति के इन्हीं चक्करों में उलझा रह जाएगा। ईवीएम पर सर्वोच्च अदालत का फैसला प्रशंसनीय व सराहनीय है। सभी दलों को इस सर्वोच्च फैसले का सम्मान करना चाहिए।

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