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क्या चुनाव के बाद `राजनीतिक महाभारत' देखेगा भारत?

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:12 May 2019 6:11 PM GMT
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2019 के लोकसभा चुनावों के छह चरण समाप्त हो चुके हैं और अंतिम चरण बाकी है जो 19 मई को होगा। लेकिन इससे पहले ही जनता के मूड का अनुमान लगाते हुए विभिन्न दलों के नेता अपनी-अपनी राजनीति के हिसाब से अपनी-अपनी गोटियां बिठाने में लग गए हैं। अभी तक जो अनुमान या सर्वे सामने आ रहे हैं उनके अनुसार भाजपा गठबंधन सबसे बड़े गठबंधन के रूप में सामने आ रहा है। चूंकि छठे और सातवें चरण का चुनाव अधिकांश ऐसे राज्यों में होना है जहां से भाजपा को पिछले चुनाव में शानदार सफलता मिली थी, ऐसे में इन राज्यों में भाजपा पिछली सफलता को दोहरा पाएगी यह तो भाजपा नेता भी नहीं कहते। उनका कहना है कि इन राज्यों में उन्हें जो नुकसान होगा उसकी भरपाई वह उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और नॉर्थ ईस्ट के राज्यों से करेंगे। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि भाजपा गठबंधन 250 सीटों के आसपास पहुंचने में सक्षम है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो भाजपा गठबंधन को केंद्र में सरकार बनाने के लिए लगभग दो दर्जन सीटों की आवश्यकता पड़ेगी। अब जब पूरे देश की राजनीति मोदी के पक्ष में या विपक्ष में बंट गई हो तो भाजपा नेतृत्व के लिए एक-एक सीट जुटाना भी आसान नहीं होगा। दो दर्जन सीटों का इंतजाम करना तो बहुत बड़ी बात है। लेकिन इस समय जो भाजपा नेतृत्व है वह देखो और इंतजार करो की नीति पर चलने वाला नहीं है। चुनाव शुरू होते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भांप लिया था कि कई सीटों के भाजपा उम्मीदवारों से स्थानीय लोग खुश नहीं हैं लेकिन वह लोग उन्हें (मोदी को) पसंद करते हैं। इसके बाद मोदी ने अपनी रैलियों में आए मतदाताओं से कहना शुरू कर दिया कि भाजपा को दिया गया उनका वोट सीधा मेरे (मोदी के) खाते में आएगा। चुनाव के पांचवें चरण तक पहुंचने के बाद उन्होंने दो संकेत और भी दिए। इसमें पहला संकेत था उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ फानी तूफान से तबाह क्षेत्रों के हवाई सर्वेक्षण के दौरान पटनायक की तारीफ और दूसरा संकेत था मायावती के लिए नरम रुख दिखाना। यह दोनों संकेत विपक्ष के उन नेताओं की मुश्किलों में इजाफा करने वाले हैं जो पिछले कई महीनों से मोदी को हटाने के लिए कमर कस रहे थे। विपक्ष की राजनीति मुख्यत दो खेमों में बंटी हुई है। पहला खेमा कांग्रेस का है जिसमें जेडीएस, डीएमके, एनसीपी और आरजेडी जैसी पार्टियां शामिल हैं। वहीं दूसरा खेमा क्षेत्रीय दलों का है जो इस सच्चाई को जानते हैं कि भाजपा और कांग्रेस की मजबूती से उन्हें नुकसान होगा। इन क्षेत्रीय दलों में टीआरएस, टीडीपी और टीएमसी जैसी पार्टियों को गिना जा सकता है। प्रधानमंत्री पद के लिए यह पार्टियां भी अपने क्षेत्रीय नेताओं का दावा ठोंकने का प्रयास कर रही है। हालांकि बीजेडी और वाईआरएस कांग्रेस जैसी पार्टियां भी हैं जिन्होंने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अब सवाल यह है कि जो क्षेत्रीय दल अभी तक मोदी विरोध के नाम पर इकट्ठा थे वह दल चुनाव परिणाम आने के बाद अपने पहले के रुख पर कायम रहते हैं या नहीं। इस समय विपक्ष में जितनी भी पार्टियां हैं उनमें कांग्रेस का सियासी कद सबसे बड़ा है। कई दलों का उसे समर्थन भी हासिल है। ऐसे में क्या सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस के पीछे आएंगे। अभी तो लगता है कि ऐसा होना मुश्किल है। दो उदाहरण हमारे सामने हैं। पहला उदाहरण उत्तर प्रदेश का है जहां सपा, बसपा और आरएलडी ने अपने महागठबंधन से कांग्रेस को बाहर रखकर यह जता दिया कि वह कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में पैर जमाने का मौका नहीं देंगे। दूसरा उदाहरण ममता की कोलकाता में विपक्षी नेताओं की रैली का है। जो एकजुटता उस रैली में दिखाई गई थी वह आज जमीन पर कहीं भी दिखाई नहीं देती। उत्तर प्रदेश में यदि सपा-बसपा को छोड़ दिया जाए तो विपक्षी नेता संयुक्त रैलियों से भी बचते हुए दिखाई दिए। विपक्ष की प्रमुख पार्टी होने के नाते कांग्रेस ने भी क्षेत्रीय दलों को वह तवज्जो नहीं दी जिसके वह हकदार थे। क्या अब कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने के बदले उसका समर्थन करने वाले क्षेत्रीय दलों को विधानसभा चुनाव में खुला मैदान देगी यह भी बड़ा सवाल है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के नेताओं के बीच एक-दूसरे को लेकर जो अविश्वास का वातावरण है उसके चलते सिर्प मोदी विरोध के नाम पर वह एकजुट हो जाएंगे इसमें संदेह है। इसलिए यदि त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति आती है तो हो सकता है कि देश को एक बार फिर राजनीतिक महाभारत देखने का मौका मिले।

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