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नतीजे से पहले मोदी की पुनर्वापसी

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:20 May 2019 5:50 PM GMT
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बीते 19 मई को सात चरणों में सम्पन्न 17वीं लोकसभा के ग"न को लेकर आयोजित चुनावी महाकुंभ फिलहाल इतिश्री को पाप्त कर चुका है। जैसा कि रिपेजेंटेशन ऑफ द पीपल एकट 1951 के धारा 126ए में स्पष्ट है कि चुनाव के आखिरी चरण के वोटिंग के खत्म होने के आधे घंटे बाद ही एक्जिट पोल दिखा सकते हैं। उक्त नियम का पालन करते हुए टीवी चैनलों पर ताबड़तोड़ शाम 6ः30 बजे एक्जिट पोल के नतीजे दिखने लगे। हालांकि आगामी 23 मई को वास्तविक परिणाम से सामना सभी का होगा पर एक्जिट पोल के नतीजे तो मोदी की पुनर्वापसी को पुख्ता कर दिया है। ज्यादातर एक्जिट पोल एनडीए को 300 से अधिक सीट जीतते हुए दिखा रहे हैं जिसमें न्यूज 24 चाणक्य सर्वाधिक 350 की बात कह रहा है। हालांकि इंडिया टुडे इससे दो कदम और आगे यह आंकड़ा 339 से 365 का पदर्शित कर रहा है। रिपब्लिक-सी-वोटर जहां 300 के अंदर 287 पर ही एनडीए को सिमटते हुए देख रहा है वहीं एबीपी-एसी निल्सन के आंकड़े तो उसे बहुमत से 5 सीट पीछे बता रहा है। कांग्रेस वाली यूपीए को 2014 की तुलना में ज्यादातर एक्जिट पोल दोगुनी सीट दे रहे हैं। कुछ इससे भी अधिक की बात कह रहे हैं। गौरतलब है कि कांग्रेस 2014 में 44 सीट पर सिमटी थी पर देश में सबसे बड़ा दल भी था मगर विपक्ष की योग्यता से बाहर रहा परन्तु इस बार ऐसा होता नहीं दिखाई दे रहा है।

एक्जिट पोल की पड़ताल बताती है कि यूपीए न्यूनतम 77 और अधिकतम 142 सीट जीत सकती है। जबकि अन्यों का आंकड़ा न्यूनतम 69 तो अधिकतम 148 बताया जा रहा है। यदि एक्जिट पोल के मौजूदा सर्वेक्षण को वास्तविकता के आसपास रखकर देखा जाय तो स्पष्ट है कि मोदी के आगे किसी की एक नहीं चली है। सवाल दो हैं पहला यह कि 5 साल की मोदी सरकार 2014 की तरह चुनावी फिजा में इतनी लहरदार नहीं दिख रही थी बावजूद इसके 300 पार की स्थिति कैसे बना लिया। दूसरा क्षेत्रीय दलों ने अपने राज्य विशेष में मोदी को घेरने के लिए कई रणनीति बनाए और राजनीतिक समझौते किए, आपस में ग"जोड़ किया साथ ही कांग्रेस ने भी ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया परन्तु मोदी का पीछे छोड़ने में नाकाम क्यों रहे।

सर्वे से विपक्षी एकजुटता की मुहिम को पूरी तरह झटका लगा। उत्तर पदेश में सपा और बसपा का ग"बंधन मोदी को पीछे छोड़ने में नाकाम दिखाई दे रहा है। एक्जिट पोल के हिसाब से ग"बंधन को 13 सीट भी मिल सकती है जो किसी दुर्दशा से कम नहीं है। हालांकि एक एक्जिट पोल एबीपी-एसी निल्सन सपा-बसपा ग"बंधन को 56 सीट भी दे रहा है। संभव है मायावती और अखिलेश को यह आंकड़ा रास आ रहा होगा। ताज्जुब इस बात का भी है कि राजस्थान, मध्यपदेश और छत्तीसगढ़ को बीते दिसम्बर में फतह करने वाली कांग्रेस की अपने सरकार वाले इन राज्यों में ही आशा के अनुरूप सीटें मिलते नहीं दिखाई दे रही हैं। बिहार में महाग"बंधन की हालत भी बहुत पतली है यहां मोदी और नीतीश की जोड़ी इनका सफाया करते हुए साफ दिख रही है। दक्षिण में यूपीए की स्थिति बेहतर पतीत होती है पर भाजपा ने भी व्यापक पैमाने पर ग"जोड़ करके स्थिति सुधारने का पयास किया है। पूर्वोत्तर में एनडीए की हालत अच्छी दिखाई दे रही है। उड़ीसा में भी 15 सीट मिलने के आसार दिख रहे हैं जबकि भाजपा को सबसे ज्यादा टक्कर देने वाला पश्चिम बंगाल उतनी बड़ी जीत शायद न दे पाए पर 2 से गई गुना आगे भाजपा रहेगी। यहां ममता बनर्जी का जादू कम होता नहीं दिख रहा है। गौरतलब है कि पधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उत्तर पदेश के बाद सर्वाधिक रैली पश्चिम बंगाल में ही हुई थी और सबसे जबरदस्त हिंसा के लिए भी इस चुनाव में इस पदेश को जाना जाएगा। एक्जिट पोल के नतीजे बेशक किसी को निराश तो किसी को सत्तासीन कर रहे हों पर ये संदेह से परे नहीं रहे हैं।

पड़ताल बताती है कि एक्जिट पोल कभी-कभी तो बहुत गलत सिद्ध हुए। पिछले 5 चुनावों के आंकलन को ध्यान में रखते हुए इसकी विवेचना और समीक्षा करें तो पता चलता है कि 1998 के आम चुनाव में भाजपा को सबसे ज्यादा सीट तो दी गई थी मगर एक एक्जिट पोल में पूरे 50 सीटों का अंतर आ रहा था तब एनडीए 252, यूपीए 166 और अन्य 199 पर सिमटे थे। "ाrक एक साल बाद 1999 के आम चुनाव में एक्जिट पोल के आंकड़े भी गलत सिद्ध हुए। सभी एक्जिट पोल एनडीए की अपत्याशित जीत का अनुमान लगा रहे थे और 300 से अधिक सीट दे रहे थे पर यह वास्तविक आंकड़ा 292 का था और जिन अन्य पार्टियों को मात्र 39 सीट दी गई थी असल में वे 113 पर जीत दर्ज की थी। 2004 के आम चुनाव के बाद हुए एक्जिट पोल में तो कुछ ने भाजपा को 290 सीट दे दी थी लेकिन नतीजा इसके उलट था।

कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, सरकार बनाने में कामयाब रही और सभी एजेंसियों के आंकड़े गलत सिद्ध हुए थे। गौरतलब है कि एनडीए के साइन इंडिया की चमक एक्जिट पोल में तो दिखी पर वास्तव में यह स्याह हो गई। इसी तरह 2009 में भी एक्जिट पोल को धता बताते हुए एक बार फिर यूपीए की सरकार बनी। खास यह है कि किसी भी एक्जिट पोल ने दोबारा यूपीए की जीत का अनुमन नहीं लगाया था तब यूपीए को 262 सीट मिली थी। अब बारी थी 2014 के उस 16वीं लोकसभा के चुनाव की थी जहां भाजपा की सुनामी के आगे कोई टिक नहीं पाया था। इस दौरान का किया गया एक्जिट पोल सबसे ज्यादा सटीक सिद्ध हुआ था। एक्जिट पोलों में भी कांग्रेस और यूपीए की इतनी बुरी हार नहीं देखी गई थी। एनडीए को भी बड़ी जीत का अंदाजा नहीं था। भाजपा 282 और एनडीए 336 सीट पर जीत दर्ज करके इतिहास ही रच दिया था। उक्त से यह कह सकते हैं कि एक्जिट पोल के दावे कमोबेश कम ही सही बै"s हैं। 2019 में यह किस करवट बै"sगा यह 23 मई के नतीजे में स्पष्ट हो जाएगा।

चुनाव से पहले मोदी मुहिम को हर कोई संदेह की दृष्टि से देख रहा था पर एक्जिट पोल के नतीजे यह बता रहे हैं कि मोदी कहीं गए नहीं हैं और शायद भारतीय राजनीति में उनकी विदाई वर्तमान रणनीति से संभव भी नहीं है। सवाल कई हैं जिसमें एक यह कि एक्जिट पोल जिस तरह मोदी को बढ़त दे रहे हैं उससे विरोधी फिलहाल अपनी रणनीति को लेकर विचार मंथन में जरूर फंसे होंगे हालांकि उन्हें आशा है कि सर्वे झू"s सिद्ध होंगे और मोदी की विदाई हो जाएगी। पुलवामा हमले के बाद केंद्र ने जिस तरह सख्त कदम उ"ाया हो न हो इससे मतदाताओं का रूझान मोदी के पति बढ़ा है। शायद इसे विरोधियों ने हल्के में लिया। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा जिस पकार भाजपा ने देश में परोसा वह भी उसे बढ़त दिलाने में मदद करता पतीत होता है। विरोधी शायद इस भुलावे में थे कि युवाओं के रोजगार व किसानों की समस्या समेत अनेक बुनियादी तथ्यों पर सरकार हाशिये पर है जिसका सीधा फायदा उन्हें मिलेगा पर एक्जिट पोल को देखकर तो यही लगता है कि विरोधियों की सोच कुछ और मतदाता कुछ और सोच रहा था। एक बड़ा तथ्य यह भी है कि मौजूदा दौर मोदी के विकल्प का उपलब्ध न होना भी इस जीत की एक बड़ी वजह है। फिलहाल अंतिम परिणाम आना अभी बाकी है 23 मई शाम तक यह सुनिश्चित हो जाएगा कि मोदी केंद्र में काबिज रहेंगे या विदा होंगे।

(लेखक प्रयास आईएएस स्टडी सर्पिल, देहरादून के निदेशक हैं।)

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