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आज होगी एग्जिट पोल की अग्निपरीक्षा

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:22 May 2019 5:57 PM GMT
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11 अप्रैल 2019 से 19 मई 2019 के बीच लोकसभा की 542 सीटों पर मतदान के लिए बड़ी तादाद में लोग अपने घरों से बाहर निकले। यह आम चुनाव सात चरणों में कराए गए ताकि तकरीबन 90 करोड़ वोटर अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकें।

अब यह तो आज मतगणना के बाद ही पता लगेगा कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सत्ता में वापसी कर रही है या फिर कांग्रेस साल 2014 के अपने चुनावी प्रदर्शन में सुधार कर पाती है या नहीं। कुछ राज्यों में मुकाबला मुख्यत क्षेत्रीय पार्टियों के बीच है। कुछ राज्यों में कांग्रेस और भाजपा मुकाबले से बाहर हैं। जैसे तमिलनाडु में लड़ाई द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच है। आंध्र प्रदेश में टीडीपी और वाईएसआर के बीच मुख्य मुकाबला है और तेलंगाना में क्षेत्रीय पार्टी टीआरएस सत्ता में है।

अब यदि बात हम अपने प्रदेश उत्तर प्रदेश की करे तो यूपी में सपा और बसपा का गठबंधन सत्तारूढ़ भाजपा को चुनौती दे रहा है। अब यह तो आज जनता का जनादेश देश के सामने आएगा लेकिन आखिरी चरण के मतदान और नतीजों की तारीख के बीच एक और दिन सामने आता है और वो था एग्जिट पोल का दिन। मतदान के आखिरी दिन वोटिंग की प्रक्रिया खत्म होने के आधे घंटे के भीतर तमाम न्यूज चैनलों पर एग्जिट पोल दिखाए जाने लगे थे। दरअसल यह एग्जिट पोल आने वाले चुनावी नतीजों का एक अनुमान होता है और बताता है कि मतदाताओं का रूझान किस पार्टी या गठगबंधन की ओर जा सकता है। न्यूज चैनल तमाम सर्वे एजेसियों के साथ मिलकर यह कराते हैं। यह सर्वे कई बार नतीजों से बिल्कुल मेल खाते हैं तो कभी उनके उलट भी होते हैं। ऐसे में इस लेख मे एग्जिट पोल की पूरी प्रक्रिया समझने की कोशिश की गई है। सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं कि एग्जिट पोल को लेकर जो धारणा है वो है यह कि मतदाता जो वोट देकर पोलिंग बूथ से बाहर निकलते हैं उनसे बात की जाती है। सर्वे में कई सवाल मतदाता से पूछे जाते हैं लेकिन उनमें सबसे अहम सवाल होता है कि आपने वोट किसे दिया है। हजारों वोटर्स से इंटरव्यू करके आंकड़े जुटाए जाते हैं। इन आंकड़ों का विश्लेषण करके यह वोटिंग का अनुमान निकालते हैं यानी यह पता लगाते हैं कि इस पार्टी को कितने प्रतिशत वोटरों ने वोट किया है। एग्जिट पोल करने आंकड़े जुटाने और उन आंकड़ों को आप तक ले आने में एक लंबी मेहनत और प्रक्रिया होती है। ऐसा नहीं है कि हर बार एग्जिट पोल सही ही साबित हुए हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण है 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव। 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनावों के बाद एग्जिट पोल में भाजपा के बंपर जीत का अनुमान लगाया गया था। पोलिंग एजेंसी चाणक्य ने भाजपा को 155 और महागठबंधन को महज 83 सीटों पर जीत की भविष्यवाणी की थी। वहीं नीलसन और सिसरो ने 100 सीटों पर भाजपा की जीत का अनुमान लगाया था लेकिन नतीजे बिल्कुल विपरीत रहे थे। जनता दल यूनाइटेड राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के महागठबंधन ने कुल 243 सीटों में से 178 पर जीत हासिल की थी। यह बड़ी जीत थी और एग्जिट पोल और असल नतीजों में काफी अंतर देखने को मिला था। आखिर एग्जिट पोल बड़े स्तर गलत कैसे हो जाते हैं? इस सवाल पर संजय कहते हैं कि एग्जिट पोल के फेल होने का सबसे बेहतर उदाहरण है 2004 का लोकसभा चुनाव। इस चुनाव में एग्जिट पोल के आंकड़े गलत साबित हुए। एग्जिट पोल में कहा जा रहा था कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनेगी और एनडीए सबसे बड़ा गठबंधन बनकर उभरेगा लेकिन नतीजे हम सबको पता हैं। कांग्रेस की सीटें अधिक आईं और यूपीए सबसे बड़ा गठबंधन साबित बना।

अब बात करे यदि 2015 के बिहार चुनाव की तो इसमें ज्यादातर एग्जिट पोल के अनुमान गलत हुए थे। आप देखेंगे कि ज्यादातर वहीं एग्जिट पोल फेल हुए हैं जिनमें भाजपा की जीत का अनुमान लगाया जाता है। एग्जिट पोल में हम पोलिंग बूथ से निकल कर बाहर आए मतदाताओं से बात करते है। ऐसे में जो मतदाता मुखर होता है वो ज्यादा बातें करता है। आप देखेंगे कि भाजपा का मतदाता ज्यादातर शहरी ऊंचे तबके का पढ़ा-लिखा युवा होता हैं। आप देखेंगे कि सोशल कॉन्फिडेंस वाले लोग खुद आकर अपनी बात रखते हैं। वहीं गरीब अनपढ़ और कम अत्मविश्वास वाला मतदाता चुपचाप वोट देकर चला जाता है। उसका सर्वे करने वालों तक खुद जाने की संभावना कम होती है ऐसे में सर्वे करने वालों को यह ख्याल रखना जरूरी होता है कि वह हर तबके के मतदाताओं से बात करे। यह बात हम सब जानते है कि मतदान को गुप्तदान कहा जाता है। ऐसे में मतदाताओं से यह जान पाना कि वो किसे वोट देंगे यह भी एक चुनौती होती है। कई बार वो सच बता रहे हैं या नहीं इस पर भी संशय होता है। लेकिन संजय इससे इत्तेफाक नहीं रखते वो कहते हैं कि ज्यादातर मतदाता सच बोलते हैं। यह हो सकता है कि कोई मतदाता झूठ बोल दे मजाक कर दे लेकिन मैं नहीं मानता कि जब किसी वोटर से हम जाकर बात करते हैं तो उसे झूठ बोलने में कोई आनंद आता है। मतदाता ने सच बोला या झूठ इसका फैसला चुनाव नतीजों के बाद साफ हो जाता है। अगर आप पिछले 10-15 सालों के एग्जिट पोल को देखेंगे तो करीब-करीब सभी एग्जिट पोल के अनुमान नतीजों के आगे-पीछे ही आए।

मध्यप्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दिसंबर 2018 में चुनाव नतीजे आए। तीनों राज्यों में कांग्रेस ने सरकार बनाई। तीन प्रमुख न्यूज चैनल्स इंडिया टुडे आज तक रिपब्लिक टीवी और एबीपी के अपने-अपने एग्जिट पोल में कांग्रेस को मध्यप्रदेश में जीतता दिखाया गया। छत्तीसगढ़ के एग्जिट पोल के आकलन उलझे हुए दिखाए गए। ज्यादातर चैनलों के एग्जिट पोल मान रहे थे कि चुनाव नतीजे से छत्तीसगढ़ में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति सामने आएगी। सिर्प एबीपी न्यूज और इंडिया टीवी के सर्वेक्षण बता रहे थे कि छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार चौथी बार सत्ता में आएगी और उसे कामचलाऊ बहुमत मिल जाएगा पर इंडिया टुडे-आज तक और रिपब्लिक टीवी जैसे चैनल छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की बढ़त की भविष्यवाणी की थी।

2017 गुजरात विधानसभा चुनाव में भी नतीजे एग्जिट पोल के रूझान एक जैसे ही थे। हालांकि कांग्रेस और भाजपा की सीटों का अंतर बेहद कम था लेकिन राज्य में भाजपा की ही सरकार बनी। साल 2016 में पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए थे। इस चुनाव के असल नतीजे एग्जिट पोल के काफी करीब रहे थे। कुल मिलाकर अब यदि बात करें तो 2019 के इस ऐतिहासिक लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल की सत्यता की स्थिति क्या रहेगी यह तो आज पूर्ण रूप से नतीजे आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।

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