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कांग्रेसः डगर कठिन परंतु असंभव नहीं

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:2 Jun 2019 3:27 PM GMT
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तनवीर जाफरी

लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतंत्र गठबंधन की शानदार वापसी के साथ ही कांग्रेस पार्टी के भी एक मृत पायः संगठन हो जाने के कयास लगाए जाने लगे थे। ऐसा महसूस किया जाने लगा था कि जहां देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों से जूझ पाने में कांग्रेस पमुख राहुल गांधी तथा यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी स्वयं को असहाय महसूस करते हुए संगठन से नाता तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं वहीं कांग्रेस विरोधी खेमों की भी यही पबल इच्छा थी कि नेहरू-गांधी परिवार किसी तरह अपनी पराजय से घबरा कर राजनीति विशेषकर कांग्रेस पार्टी को संरक्षण देना बंद कर दे। पूरे योजनाबद्ध तरीके से मीडिया तथा सोशल मीडिया के माध्यम से सोनिया व राहुल गांधी के मनोबल को गिराने का पयास भी किया गया। कांग्रेस से इत्तेफाक न रखने वाले अनेक राजनैतिक दलों के नेता भी यही सलाह देते सुनाई दिए कि अब कांग्रेस को नेहरू-गांधी परिवार के `शिकंजे' से बाहर निकलना चाहिए। ऐसे आलोचनाकार पार्टी में परिवारवाद हावी होने की दलीलें दे रहे थे। पूर्व आरजेडी पमुख लालू पसाद यादव एक अकेले ऐसे नेता थे जो राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से पराजय के बाद त्यागपत्र दिए जाने के किसी भी निर्णय के बिल्कुल खिलाफ थे। वे अपनी दूरदर्शी राजनीति की नजरों से यह देख रहे थे कि राहुल गांधी के मनोबल को गिराकर किसी भी तरह उनसे त्यागपत्र लिए जाने की साजिश रची जा रही है। वे यह भी समझ रहे थे कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा अच्छा पदर्शन न किए जाने को लेकर जहां राहुल गांधी भी सदमें में हैं वहीं कांग्रेस विरोधी भी उनके समक्ष अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने जैसा वातावरण बनाकर कांग्रेस को और अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।

परंतु चुनाव परिणाम आने के बाद पूरे एक सप्ताह तक चले चिंतन-मंथन के बाद कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी है। पिछले दिनों संसद भवन के पेंदीय कक्ष में जहां सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना गया वहीं कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाओं को जारी रखते हुए राहुल गांधी ने भी पार्टी के निराश होते जा रहे कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन करने की पूरी कोशिश की। पूरा का पूरा कांग्रेस संसदीय दल सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट नजर आया। सोनिया गांधी ने जनता के अधिकारों की लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लड़ने का आह्वान किया। उन्होंने देश के उन 12.5 करोड़ मतदाताओं का भी आभार व्यक्त किया जिन्होंने संसद में कांगेस के 52 सांसद जिताकर भेजे हैं। परंतु पश> यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी पत्येक स्तर पर भारतीय जनता पार्टी जैसे उस सत्ताधारी संगठन से मुकाबला कर सकती है जिसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित और भी कई हिंदूवादी कट्टरपंथी संगठन एकजुट होकर खड़े हुए हैं? क्या कांग्रेस पार्टी भारतीय जनता पार्टी के उन हथकंडों का मुकाबला कर सकती है जिनके तहत भाजपा कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी पचारित करने के षड्यंत्र में काफी हद तक सफल हो जाती है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी संगठन है? इतना ही नहीं वह कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने के लिए उस पर मुस्लिमों का तुष्टीकरण करने वाले राजनैतिक दल का लेबल भी चिपका देती है। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी संगठनों द्वारा 2014 के चुनाव के दौरान कांग्रेस के विरुद्ध सबसे मजबूती के साथ यही दुष्पचार किया गया था कि कांग्रेस पार्टी लक्षित हिंसा विरोधी बिल संसद में पास कराकर हिंदुओं के विरुद्ध साजिश रच रही है। इसके अतिरिक्त तत्कालीन पधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान का भी काफी पचार किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि देश की संपदा पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है।

दरअसल कांग्रेस की ओर से जो भी इस पकार के बयान दिए जाते हैं या नीतियां बनाई जाती रही हैं उनका मकसद किसी धर्म विशेष का तुष्टीकरण नहीं बल्कि यह रहता था कि देश के सर्व समाज में इस बात का एहसास कायम रह सके कि वे सभी इस देश के सम्मानित नागरिक हैं और उनका भी देश पर वैसा ही अधिकार है जैसा कि देश के बहुसंख्य समाज का। दरअसल यह धारणा कांग्रेस पार्टी की नहीं बल्कि महात्मा गांधी के दर्शन से पाप्त होने वाली धारणा है। परंतु दुर्भाग्यवश गांधी दर्शन की जगह गत् कुछ वर्षों से `गोडसे दर्शन' लेने लगा है। देश के विभिन्न भागों से धर्म आधारित हिंसा के समाचार पाप्त होते रहते हैं। गांधी जी किसी भी पकार की सांपदायिक हिंसा के घोर विरोधी थे। अपने जीवनकाल में वे कई बार हिंदुओं के मध्य जाकर मुसलमानों की रक्षा करने तथा मुसलमानों के मध्य जाकर हिंदुओं की रक्षा किए जाने के उपदेश देते रहते थे। अपने इसी उद्देश्य को लेकर धर्म आधारित हिंसा के विरुद्ध उन्हें अनशन भी करना पड़ा। परंतु मानवता के दुश्मन मुस्लिम परस्त तथा हिंदुवादी दल सभी की नजरों में गांधीजी महज इसलिए खटकते रहे कि वे धार्मिक उन्माद के उस विभाजनकारी वातावरण में पेम व सद्भाव के बीज क्यों बो रहे हैं? ईश्वर अल्लाह एक ही नाम का संदेश क्यों दे रहे हैं? और आखिरकार घोर हिंदूवादी विचारधारा में डूबे एक गिरोह ने सांपदायिक विचारधारा के एक पतिनिधि नाथू राम गोडसे के हाथों गांधी की हत्या करवा ही डाली।

यहां यह बताना भी जरूरी है कि सर्वधर्म संभाव की धारणा की शुरुआत महात्मा गांधी द्वारा नहीं की गई थी बल्कि महात्मा गांधी स्वयं उस भारतीय दर्शन के हिमायती थे जो न केवल सर्वधर्म संभाव बल्कि विश्व बंधुत्व तथा सर्वे भवंतु सुखिनः की शिक्षा सस्त्राब्दियों से देता आ रहा है। गांधी जी हिंदुत्व की उस परिभाषा को भारतीयों के जन-जन में बसाना चाहते थे जो हमें वसुधैव कुटंबकम की शिक्षा देता है। परंतु नाथू राम गोडसे व उसके सभी साथी जो गांधी जी की हत्या में शामिल थे वे सबके सब कट्टरपंथी हिंदूवादी राजनीति के पैरोकार थे। और इसी विचारधारा ने महात्मा गांधी को हिंदुओं का दुश्मन मानकर उनकी हत्या कर डाली। गांधी जी के मुंह से अंतिम समय में निकले शब्द `हे राम' स्वयं इस बात का सुबूत हैं कि महात्मा गांधी वास्तविक रामभक्त थे न कि राम के नाम का सहारा लेकर अपनी राजनैतिक मजबूती की कोशिश करने वाले नेता। ठीक इसके विपरीत वर्तमान सत्ताधारी दल की पूरी की पूरी बुनियाद ही भगवान राम के सहारे पर खड़ी की गई है। दूसरी ओर इसी के साथ-साथ गोडसेवादी विचारधारा का सिर उठाना भी जारी है। इतना ही नहीं बल्कि गोडसे का जबरदस्त तरीके से महिमामंडन भी किया जाने लगा है। गांधी के उस हत्यारे की पतिमाएं बनने की खबरें आती रहती हैं। गांधी की हत्या का चित्रण करते हुए वीडियो दिखाई देते हैं। यहां तक की पिछले दिनों हिंदू महासभा ने भारतीय मुद्रा पर पकाशित गांधी के चित्र को हटाकर गोडसे का चित्र पकाशित करने की मांग तक कर डाली।

ऐसे पदूषित राजनैतिक वातावरण में जबकि सत्ताधारी दल दर्जनों हिंदूवादी संगठनों को साथ लेकर सत्ता पर काबिज होने के साथ-साथ कांग्रेस पर भी हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाता रहता है निश्चित रूप से कांग्रेस के समक्ष एक बड़ी व कठिन चुनौती के समान है। परंतु चूंकि हमारा यह देश पीर-फकीरों, संतों व ऋषियों-मुनियों के दौर से ही सर्वधर्म संभाव का पालन करने वाला एक धर्मनिरपेक्ष देश रहा है और धर्मनिरपेक्षता भारतीयों के डीएनए में शामिल है। लिहाजा कांग्रेस पार्टी को गांधी के उन सौहार्दपूर्ण विचारों को लेकर जनता के मध्य जाना और सफलता हासिल करना मुश्किल तो हो सकता है परंतु असंभव नहीं।

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