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जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन : जरूरी या मजबूरी

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:2018-06-24 18:30:39.0

जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन : जरूरी या मजबूरी

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आदित्य नरेन्द्र

जम्मू-कश्मीर के दो सत्ताधारी दलों के नजरिये में इतनी दूरियां बढ़ गईं कि आखिरकार वहां उनका एक साथ रहना मुश्किल हो गया और भाजपा ने सरकार से समर्थन वापसी का फैसला कर राज्यपाल शासन के लिए रास्ता साफ कर दिया। घाटी के हालात को देखते हुए इसे एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना गया। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे जरूरी कदम बताया तो वहीं कुछ अन्य राजनीतिक विश्लेषकों का कहना था कि यह मजबूरी में उठाया गया कदम है क्योंकि पीडीपी सरकार की नीतियों के चलते भाजपा के जनाधार को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ती जा रही थी। जो 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान पार्टी का देशभर में नुकसान कर सकती थी। लेकिन मेरा मानना यह है कि भाजपा के रणनीतिकारों द्वारा समर्थन वापसी का फैसला मजबूरी में उठाया गया जरूरी कदम था। क्योंकि पीडीपी प्रमुख भाजपा को घाटी में जरा-सा भी स्पेस नहीं देना चाहती थी। आतंकी बुरहानी वानी के बचाव से लेकर पत्थरबाजों के मुकदमों की वापसी तक ऐसे कई फैसले हैं जिन्होंने राजनीतिक रूप से घाटी में महबूबा मुफ्ती की जमीन तो मजबूत की लेकिन जम्मू में भाजपा के नीचे की जमीन खिसकानी शुरू कर दी। अच्छे-खासे चल रहे आपरेशन ऑल आउट को रमजान के दौरान रोक दिया गया। हैरानी की बात तो यह रही कि यह सीजफायर एकतरफा होकर रह गया क्योंकि घाटी के अलगाववादियों और आतंकियों ने इसे नहीं माना। ऐसे में मुख्यमंत्री की इच्छानुसार सीजफायर को बढ़ाना भाजपा और केंद्र सरकार की राजनीति के लिए घातक हो सकता था। अब भाजपा को इसका जवाब तो देना ही था और वह उसने राज्य सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करके दे दिया। प्रदेश में राज्यपाल शासन लागू होने के बाद अब हालात नए मोड़ लेने लगे हैं। एक ओर जहां राज्यपाल और उनकी टीम के कंधों पर प्रदेश के हालात सुधारने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है तो वहीं राज्य के राजनीतिक दल अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन को ढूंढने और बचाने में लग गए हैं। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और सैफुद्दीन सोज के बयानों को इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए। यह अलग बात है कि राज्य और खासतौर पर घाटी के हालात देखकर ऐसे बयानों से बचा जाना चाहिए था। कश्मीर को इस समय राज्यपाल के नेतृत्व में एक मजबूत पारदर्शी और लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत है। हमें ध्यान रखना होगा कि घाटी में बड़ी संख्या में ऐसे कश्मीरी भी हैं जो खुद को भारतीय मानते हैं और आतंकवादी गतिविधियों को पसंद नहीं करते। सेना के आपरेशन ऑल आउट को मिली कामयाबी के पीछे इन्हीं लोगों द्वारा दी गईं खुफिया सूचनाएं हैं। जब तक जम्मू-कश्मीर की कोई भी सरकार और उसका प्रशासन इन्हें नजरअंदाज करता रहेगा और अलगाववादियों और आतंकियों को एकतरफा सीजफायर जैसी छूट देता रहेगा तब तक कश्मीर में शांति दूर की कौड़ी बनी रहेगी। यह भी सही है कि सेना का आपरेशन इस समस्या से निपटने का एकमात्र हल नहीं है। यह हल की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। सूफीवाद को मानने वाले कश्म्1ााrरियों में धार्मिक कट्टरता का बढ़ना अकारण नहीं है। राज्य में यह धार्मिक कट्टरता कैसे और क्यों बढ़ी इस पर भी विचार करना होगा। युवाओं के हाथ में पत्थर घाटी की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करते। कुछ लोग इसे बेरोजगारी से भी जोड़ देते हैं। यदि यह तर्प सही है तो इसे पूरे भारत या पूरी दुनिया पर लागू होना चाहिए लेकिन ऐसा है नहीं। राज्यपाल शासन में यदि चीजें सही दिशा में चलीं तो कश्मीर समस्या के लिए यह एक सुअवसर भी साबित हो सकता है। बेशक राज्यपाल शासन मजबूरी में उठाया गया जरूरी कदम हो सकता है लेकिन सही दिशा और समर्थ नेतृत्व मिलने पर कश्मीर घाटी को फिर से जन्नत बनते देर नहीं लगेगी।

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