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चुनावी ऊंट किसी करवट बै"s, मुश्किलें कुकर्मियों की बढ़ेंगी

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:18 May 2019 5:28 PM GMT
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17वीं लोकसभा की 542 में से 59 शेष सीटों के लिए सातवां और अंतिम चरण का चुनाव आज सम्पन्न हो जाएगा। चार दिन बाद, 23 मई के बाद जल्द ही कुछ दिग्गज अपार गर्मजोशी में झूमते नजर आएंगे तो कुछ महारथियों की भ्रांतियां धराशायी होंगी, खुशफहमियां ढहेंगी। जिंदगी हमें बार-बार सिखाती है, जितनी ज्यादा खुशफहमियां पालेंगे, उसी अनुपात में दुखी रहेंगे। किंतु कुछ बेचारों को ताउम्र गलतफहमियों में जीना रास आता है, उनकी सोच वैसी ही ढल चुकी होती है, उनसे बाहर निकलना उनके लिए दुस्साध्य होता है। अपेक्षा-निराशा, खुशफहमी-हताशा का सदा अटूट, गहरा नाता रहा है। इंसान है कि देखकर भी नहीं समझता। गौर फरमाएं, पिछले लोकसभा चुनाव में मंत्री रहते कुछ बनावटी सूरमा और चौधराइनें अपनी जमानत नहीं बचा पाईं, इस बारगी भी वे मैदान में हैं! रस्सी जल गई पर ऐं"न न गई, कमाल का दुस्साहस है!

कौन विजयी होगा यह यक्षप्रश्न है, इसलिए कि निर्णय तो बहुसंख्यों के क्षणविशेष की चाल पर निर्भर करेगा। और बहुसंख्यक हैं कि उनकी वरीयतों जरा सी बात पर ढुलमुलाने में नहीं चूकतीं। मतदान से एक रोज पहले एक बोतल या एक अदद कंबल से इधर का उधर या उधर का इधर हो जाने की अनेक मिसालें हैं। पिछली दफा `आप' पार्टी चुनावी नतीजे से स्वयं भौंचक्की रह गई होगी कि उसे इतना पचंड बहुमत कैसे मिला! अपना तो कहना है, कोई चुनावी प्रत्याशी तरीके से मतदाताओं को इस पकार झू"ामू"ा ऐलान कर दे-उसने स्वप्न में देखा कि जिन्होंने उसके पक्ष में वोट नहीं डाला उनका अनिष्ट हो गया तो उसके वारे न्यारे हो जाएंगे। मतदान किसे दिया, इस बाबत कई लोग इस पकार की धारणा व्यक्त करते रहे हैं, `मेरे पिता ने, पिता के भी पिता ने फलां पार्टी को वोट दिया, हमारा वोट कहीं और कैसे जा सकता है?' अथवा `पार्प के नुक्कड़ पर पोस्टर में उस महिला प्रत्याशी का चेहरा इतना हसीन और मनभावन था और मैंने उसी को वोट दिया'। महिलाई मुखौटों की खूबसूरती ने नदियों के रुख, मुल्कों के नक्शे, अन्य कई तरीकों से इतिहास बदल डाले हैं, एक वोट की क्या बिसात है? भारतीयों का मत डालने का कभी निश्चित पैटर्न नहीं रहा।

एक अहम सवाल उस पार्टी या शख्सियत की पहचान का, और उसका साथ थामने का है जो हालातों के मुताबिक देश को सही दिशा पदान करने में सक्षम रहेगा। इससे पहले हमें समझना होगा, हमारे बुनियादी मुद्दे क्या हैं जिनसे रूबरू हुए बिना विकास और खुशहाली का मार्ग नहीं खुलने वाला।

सद्बुद्धि आती है, बदलाव आता है, तरक्की के दरवाजे खुलते हैं तो अंदरूनी कारणों से। सफलता के नामी लेखक स्टीफेन कोवे कहते हैं, `बेहतरी के द्वार भीतर से बाहर की ओर खुलते हैं, बाहर से अंदर की ओर नहीं।' दूसरे की मंशा के बिना उसकी बेहतरी संभव नहीं। बदलाव की पहल उसे स्वयं करनी होगी, आप उद्धार या कल्याण कर सकते हैं तो केवल अपना।

अंदरूनी मजबूती के लिए उन आधार स्तंभों का रुख करना होगा जो सदा से मनुष्य को जीवंतता और जीने का अर्थ पदान करते आए हैं, जो क"िन लमहों में झट उसे जादुई ताकत, पेरणा और संबल सुलभ कराते हैं। वे आधार स्तंभ हैं हमारी संस्कृति, माता-पिता से मिला अगाध निस्स्वार्थ पेम, और उनके साथसाथ उन सभी संस्थाओं, परिवेश के परिजनों-मित्रों के पति कृतज्ञता भाव जिनकी बदौलत वह सब आपको मिला जो आपके पास है। इतिहास साक्षी है जिन्होंने अपने देश, संस्कृति, समाज का अहसान माना, समझा और उस ऋण को बट्टेखाते डालना पाप समझा बल्कि सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार उसकी समृद्धि में योगदान दिया, वे भौतिक, आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से फलीभूत होते चले गए। सबसे बड़ी बात, अहसान मानने वाले जीवन की संध्या में मन-चित्त से शांत, सुखी रहे, उस ऊहापोह से पूर्णतया अछूते जो अहसानफरामोशों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ाए रखती है, जिन्हें सूझता ही नहीं कि अपनी बाहरी जरूरतों की आपूर्ति से इतर भी जीवन में कुछ है। यहां इशारा उन संस्कारों और मूल्यों को संजोने, पुनर्पतिष्"ित करने की ओर है जो जापानियों, जर्मनवासियों आदि को कर्म" और देशभक्त बनाए रखता है; इशारा चीनियों की ओर भी है जो भारत सरीखे अपने वजूद को बिसरते मुल्कों की ओर भी है जहां के बच्चों को थमाने के लिए चीनी लोग मोबाइल बनाते हैं और अपने बच्चों को छुनछुने से खिलाते हैं, पहाड़े रटाते हैं-दस और पांच जोड़ने के लिए कैल्कुलेटर का आदी नहीं बनने देते।

संस्कृति की भांति भाषा भी व्यक्ति की अस्मिता से आदिकाल से जुड़ी है और उसके दिली सरोकारों की अभिव्यक्ति का पभावी साधन है। निज भाषा से पेम होना परंपरा बल्कि अपनी अस्मिता से पेम है और हमारे व्यक्तित्व को संपूर्णता पदान करता है। अपने जज्बात आप बेहतरीन तरीके से पस्तुत कर सकते हैं तो अपनी भाषा में ही। पिछले दौर की नामी कथा लेखिका, अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी की पोफेसर रह चुकी उषा पियम्वदा की `मेरी पिय कहानियां' के आमुख मैं लिखी पंक्तियों पर गौर फरमाएंः `सुदीर्घ अवधि तक विदेशों में अंग्रेजी पढ़ाने के बावजूद मुझे अहसास रहा कि मुझ से कुछ सार्थक लिखा जाएगा तो हिंदी में।' हमारे किन नेताओं को हिंदी से पगाढ़ पेम है, कौन है जिनके कं" से वही जवां अमूनन पवाहित होती है, कौन है जो जज्बात और केवल जज्बात बोलते हैं, यानि ईमानदारी से बोलते हैं, जिन्हें सैकेटरी का तैयार किया गया पर्चा देख-देखकर नहीं पढ़ना पड़ता?

कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के एक अग्रणी मैनेजमेंट संस्थान (एपीजे इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट) में एक अधिवेशन के दौरान, जहां कुछ विदेशी एक्सपर्ट भी मौजूद थे, संस्थान के निदेशक आलोक सकलानी के चालीस मिनट के अभिभाषण में पच्चीस मिनट हिंदी में थे, शेष पंद्रह मिनट अंग्रेजी में। वहीं की तद्कालीन छात्रा, मेरी बेटी ने मुझे बताया तो निदेशक को बधाई देते मैंने कहा-बहुत साहस चाहिए ऐसे परिवेश में हिंदी में आख्यान देने के लिए।

पड़ताल करनी होगी, कौन हैं जो आपको आप स्वयं से जुड़े रहते हुए आगे बढ़ाते रहने का बीड़ा उ"ाए हैं, और कौन हैं जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के पति तटस्थता तो दूर, इसे हेय करार करने, इसके पति दुराव और घृणा का पचार करने पर तुले हैं। ऐसा तो नहीं, तुच्छ स्वार्थों के चलते इन्होंने अपने तार उन सशक्त माफियाओं से जोड़ रखे हैं जिनके मंसूबे संदेहास्पद हैं? चुनावी दंगल के प्रत्याशी किसी भी पार्टी के हों, नतीजे आने पर मुश्किलें उनकी बढ़ेंगी जिन्हें लोकजीवन के बुनियादी मुद्दों से सरोकार नहीं रहा। जो लोककल्याण की दिशा में निष्ठा से कार्यरत रहे, नहीं जीते जाने पर वे गमगीनता में नहीं डूबेंगे न ही अपना संतुलन खोएंगे।

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